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Sunday, April 25, 2010

"तू जाग सके तो जाग" (चर्चा मंच-132) मनोज कुमार

महानता की ऊँचाई पर हम अकेले हैं, सबकी पैनी दृष्टि है हम पर — बहुत लोग इस स्थिति को पचा नहीं पाते हैं और सामान्य जीवन जीने गिर पड़ते हैं। महानता पाना कठिन है और सहेज कर रख पाना उससे भी कठिन। ये बातें समझा रहे हैं महानता के मानक पोस्ट के ज़रिए प्रवीण पाण्डेय समझा रहे हैं।
यह पोस्ट श्री प्रवीण पाण्डेय की इस श्रृंखला की तीसरी है। प्रवीण बेंगळुरू रेल मण्डल के वरिष्ठ मण्डल वाणिज्य प्रबन्धक हैं। उनका मानना है जैसे जैसे हम महानता पर बढ़ते जाते हैं हमें और सजग रहना पड़ता है। स्वयं के लिये और समाज के लिये।
मेरा फोटोरंजीत समझा रहे हैं दो पाटन के बीच पर कविता की ज़रूरत। कहते हैं
कविता
काजल की कोठरी में बेदाग की तलाश है
निरर्थक शोर के बीच अर्थ का प्रयास है
खामोशी तोड़ने का आखिरी औजार है
मां की मनाही
और प्रेमिका की हां है
कविता
आखिरी सांस तक मानव बने रहने की जिद है!
सीधे सीधे जीवन से जुड़ी इस कविता में नैराश्य कहीं नहीं दीखता। एक अदम्य जिजीविषा का भाव कविता में इस भाव की अभिव्यक्ति हुई है।
My Photoगिरीश पंकज की ग़ज़ल तुम तो केवल इन आँखों को कहने दो में विचार, अभिव्यक्ति शैली-शिल्प और संप्रेषण के अनेक नूतन क्षितिज उद्घाटित हो रहे हैं। देखिए कुछ शे’र
क्यों ज़ुबान को ज़हमत दो बस रहने दो
तुम तो केवल इन आँखों को कहने दो

इक दिन हो सकता है दिल ये मिल जाये
अगर दुश्मनी टलती है तो टलने दो

अभी ज़िंदगी का पहला पग रक्खा है
अरे उसे कुछ ठंडी-गरमी सहने दो


धीरे-धीरे बच्चा दौड़ लगाएगा
चलने दो, गिरने दो, उसे संभलने दो

इस ग़ज़ल को पढ़ कर मैं वाह-वाह कर उठा। आप भी पढ़िए।
मेरा फोटोसंगीता पुरी जी बता रही हैं काफी अर्से से पृथ्‍वी पर आनेवाले भूकम्‍प , तूफान , ज्‍वालामुखी तथा अन्‍य प्राकृतिक आपदाओं के वक्‍त आसमान में ग्रहों की स्थिति का अध्‍ययन करने के बाद कुछ खुलासे तो हुए , पर पृथ्‍वी पर आक्षांस और देशांतर रेखा के निर्धारण में अभी भी कठिनाई आ ही रही है , जिसके कारण उपयुक्‍त भविष्‍यवाणी करने में बाधा उपस्थित हो रही है। 2010 के आनेवाले पूरे वर्षभर में पृथ्‍वी पर बुरी ग्रह स्थिति किन तिथियों को बनती है , जिसके कारण कई प्रकार के प्राकृतिक या मानवकृत दुर्घटनाओं या अन्‍य आपदाओं की संभावनाएं बनेंगी, उसका पूरा विवरण दे रहीं हैं।
मुझे तो उनकी भविष्यवाणियों पर विश्वास है, जिन्हें नहीं भी है, वे भी इसे सेव कर रख लें, आखिर सतर्क रहने में हर्ज़ ही क्या है?
My Photoलीजिए एक अच्छी सूचना।
अगर आपको लगता है कि फिल्म मेकिंग में प्रवेश पाना आसान नहीं है और वहां सिर्फ सिफारिशी लोगों की ही पहुंच होती है, तो आप गलत है। पत्रकार से फिल्म मेकर बने पंकज शुक्ल ने नई प्रतिभाओं को आगे लाने के अपने अभियान के तहत इस बार नए लेखकों को तलाशने का बीड़ा उठाया है।
इसके लिए सभी मीडिया कर्मियों से प्रविष्टियां आमंत्रित हैं, पेशेवर लेखक भी इस प्रतियोगिता में हिस्सा ले सकते हैं, सर्वश्रेष्ठ पटकथा लेखक को पुरस्कार स्वरूप 11 हज़ार रुपये की धनराशि दी जाएगी।
फिल्म की कहानी एक बच्चे पर केंद्रित है, इसलिए इस प्रतियोगिता में वे लोग बेहतर ढंग से शरीक हो सकते हैं जिन्हें बच्चों की मानसिकता की समझ है या जिन्हें बच्चों के दृष्टिकोण से कहानी या पटकथा लिखने का शौक रहा है।
मैं तो भाग ले रहा हूँ, आप क्यों देरी कर रहे हैं? पधारिए यहां।
मेरा फोटोशेफाली पाण्डे जी ने कुमाउँनी चेली पर आज प्रस्तुत किया है इन दिनों की बात | मेरे अंदाज़ में एक साथ ! एक बेहतरीन और लाजवाब प्रस्तुति जो दिल के साथ-साथ दिमाग़ में भी जगह बनाती है। कुछ बानगी देखिए
शशि अस्त है | थरूर पस्त है | सुनंदा त्रस्त है | मीडिया बेहद व्यस्त है |
भाषण का जोश | गडकरी बेहोश | सुषमा को रोष | सरकार को दोष |
इस कविता की अलग मुद्रा है, अलग तरह का संगीत, जिसमें कविता की लय तानपुरा की तरह लगातार बजती रहती है! अद्भुत!! मुग्ध करने वाली!!! विस्मयकारी!!!!
इस कविता को पढ़कर ताऊ जी कहते हैं
“बहुत ही लाजवाब अंदाज मे वर्तमान को पेश किया है. तीन बार पढ चुका हूं. तारीफ़ के लिये शब्द नही हैं. बहुत शुभकामनाएं!”
आज सचिन का जन्मदिन है! भले ही वो सैंतीस वर्ष के हो गए हैं उन्हें इसी तरह देश के लिए आगे कई वर्षों तक हर भारतीय खेलते देखना चाहता है। चाणक्य की चिंता नामक ब्लॉग पर यह पोस्ट लगा कर चाणक्य जी कहते हैं
“मेरी ओर से सचिन को जन्मदिन पर ढेर सारी शुभकामनाएँ!
यही बात इस मंच से हम सभी ब्लॉगरों की ओर से कहना चाहते हैं।
चाणक्य जी कहते हैं क्या आपको पता है की हर भारतीय एक बीमारी से ग्रस्त है ? जी हाँ जो दिन ब दिन बढ़ती ही जा रही है! ...हर कोई उस बीमारी को अपने साथ लिए चलना चाहता है जिसे जैसे मौक़ा मिले उसका करीब से उसका अनुभव करना चाहता है इस बीमारी ने हमारी देश में महामारी का रूप ले लिया है,इसने हर वर्ग के लोगो को अपना शिकार बनाया है इसने उम्र धर्म लिंग और क्षेत्रीयता किसी को भी अपने रास्ते की बाधा नहीं बनने दिया और सबसे मुख्य बात यह है कि यह हमारे साथ पिछले बीस सालों से है और हम इससे खुद पीछा छुडाना नहीं चाहते ..जैसे जैसे वक़्त गुजरा यह हमारे जीवन का हिस्सा बन गई और यह उतनी ही घातक होती चली गई ,इसकी जड़े आज इतनी गहरी और मजबूत हो गई है की आज इस भारतीयों की ज़िंदगी से निकाल पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो गया है आपने सही पहचाना हम सभी "सचिन सिंड्रोम "से ग्रसित हैं!
जीवन का महत्व तभी है जब वह किसी महान ध्येय के लिये समर्पित हो। सचिन का जीवन इसका उदाहरण है। बहुत अच्छी प्रस्तुति।
My Photoस्वामी विवेकानंद ने कहा था कि युवा किसी राष्ट्र की शक्ति होते हैं। किसी भी राष्ट्र की शक्ति का आंकलन वहां की युवा शक्ति से किया जा सकता है। पुरोहिती पाखंड को जड़-मूल से निकाल फेको शीर्षक आलेख के द्वार अमित तिवारी ’संघर्ष’ बता रहे हैं कि रोटी और डिग्री के पीछे भागते युवाओं को पुकारते हुए स्वामी जी ने कहा था,‘‘मेरी दृढ धारणा है कि तुममें अन्धविश्वास नहीं है। तुममें वह शक्ति विद्यमान है, जो संसार को हिला सकती है, धीरे - धीरे और अन्य लोग भी आयेंगे। ‘साहसी’ शब्द और उससे अधिक ‘साहसी’ कर्मों की हमें आवश्यकता है। उठो! उठो! संसार दुःख से जल रहा है। क्या तुम सो सकते हो?”
आगे कहते हैं आज देश के समक्ष असंख्य चीखते सवाल हैं। बेरोजगारी, भुखमरी, लाचारी, बेगारी, महंगाई।।। और भी ना जाने क्या-क्या? है कोई विकल्प किसी के पास? आज युवा, नरेन्द्र नाथ दत्त तो हैं, लेकिन ना उस नरेन्द्र में विवेकानंद बनने की युयुत्सा है और ना ही किसी परमहंस में आज देश-हित को निज-हित से ऊपर मानकर किसी नरेन्द्र को विवेकानंद बनने की दीक्षा देने का साहस ही शेष है। लेकिन फिर भी उम्मीद है, ‘‘कोई नरेन्द्र फिर से विवेकानंद बनेगा।’’
यह रचना हमें नवचेतना प्रदान करती है और नकारात्मक सोच से दूर सकारात्मक सोच के क़रीब ले जाती है।
मेरा फोटोकल और आज शीर्षक कविता के ज़रिए रेखा श्रीवास्तव जी बता रही हैं कि
एक कोमल अहसास से
मन पुलकित हो उठा,
पर ज़िन्दगी के दौर में कई बार ऐसा लगता है कि
हम जिन्दगी में
कैरियर का सुख,
औ' भौतिक सुखों के बीच
रिश्तों के सुख का
सौदा कर बैठे हैं.

ऐसा नहीं कि
अहसास मर चुके हैं
पर अब उन
अहसासों का स्पंदन
जो खुद हमने जिए थे
खत्म हो चुका है.
इस कविता के ऊपर अपना विचार रखते हुए रश्मि प्रभा जी कहती हैं “ज़िन्दगी के सारे मायने बदल गए हैं , वो कागज़ की कश्ती, बारिश का पानी, वो नानी की कहानी, वो चिड़िया, तितली, बुल्बुल्वाले दिन अब कहाँ !”
सरलता और सहजता का अद्भुत सम्मिश्रण बरबस मन को आकृष्ट करता है। चूंकि कविता अनुभव पर आधारित है, इसलिए इसमें अद्भुत ताजगी है।
My Photoडा. श्याम गुप्त जी ने पानी की बूँद – जल चक्र शीर्षक कविता के ज़रिए एक बहुत ही उत्तम संदेश देने की कोशिश की है।
कर रहा प्रदूषण तप्त सभी,
धरती आकाश वायु जल को।
अपने अपने सुख मस्त मनुज,
है नहीं सोचता उस पल को।
पर्वतों ध्रुवों की हिम पिघले,
सारा पानी बन जायेगी।
भीषण गर्मी से बादल बन,
उस महावृष्टि को लायेगी।
विनोद कुमार पाण्डेय जी बता रहे हैं एक कविता के द्वारा कि सरकारी प्रयास कितने सक्षम हैं?
My Photoसरकारी सारे प्रयास कितने सक्षम है, क्या बोलूँ,
उन्नतशील हो रहा भारत,मगर उन्नति जै श्री राम,

गाँव-शहर सब चीख रहा है,मँहगाई है,चारो ओर,
पेट पालना भी मुश्किल है,आया है, कैसा यह दौर,
जनता आख़िर किससे बोले,कौन सुने इनकी फरियाद,
मौन पड़े बैठे हैं सारे,संसद में जाने के बाद

बेरोज़गार बढ़ रहें दिन-दिन,और नौकरी छूमंतर,
अब भी पंडित,ओझा,औघड़ बाँध रहे,मंतर-जंतर,
अब भी घर से बेटी का बाहर जाना अपराध बना,
अब भी मंदिर-मस्जिद देखो राजनीति का साध बना,
अब भी पढ़े लिखे जनमानस,रुपयों के हो गये गुलाम,

उन्नतशील हो रहा भारत,मगर उन्नति जै श्री राम.

यह कविता सिर्फ सरोवर-नदी-सागर, फूल-पत्ते-वृक्ष आसमान की चादर पर टंके चांद-सूरज-तारे का लुभावन संसार ही नहीं, वरन जीवन की हमारी बहुत सी जानी पहचानी, अति साधारण चीजों का संसार भी है। यह कविता उदात्ता को ही नहीं साधारण को भी ग्रहण करती दिखती है।
दर्द शुजालपुरी ( गोवर्धन सिंह सिसोदिया ) की एक बेहद मर्मिक और दिल छूती ग़ज़ल पढिए आखर कलश पर।
सूरज की रूह, चांद का चेहरा हैं बेटियां !
जुगनू हैं, तितलीयां हैं, कलेजा हैं बेटियां !!
बेटे तो बीबीयों को अपनी लेके चल दिए !
बूढों की लाठियां और कांधा हैं बेटियां !!
फुरसत मिले तो इनको ज़रा पढ़ भी लीजिए !
कुरान, बाईबल और गीता हैं बेटियां !!
बेटी पर लिखी यह ग़ज़ल काफी मर्मस्पर्शी बन पड़ी है। इतनी मार्मिक है कि सीधे दिल तक उतर आती है ।
सरस पायस पर पढिए आकांक्षा यादव की नई शिशु कविता म्याऊँ करके उसे चिढ़ाती।
दिन-भर टें-टें करता रहता,
राम-नाम भी जपता रहता।
बहुत प्यार से मैंने पाला,
मेरा तोता बहुत निराला।
उसको मिर्ची ख़ूब खिलाती,
पानी लाकर उसे पिलाती।
म्याऊँ करके उसे चिढ़ाती,
बिल्ली से मैं उसे बचाती।
My Photoबम्बई में क्षेत्रीय प्रभुता का विस्तार शनैः शनैः हुआ। इस कारण से वहाँ न्यायिक समस्याएँ भी कम रहीं और न्यायिक व्यवस्था का विकास भी सीमित हुआ। बम्बई में न्यायिक व्यवस्था का विकास के बारे में दिनेशराय द्विवेदी जी बता रहे हैं तीसरा खंबा पर। बताते हैं कि बंगाल की न्यायिक व्यवस्था के अनुरूप ही बम्बई में भी सपरिषद गवर्नर को दांडिक न्याय व्यवस्था स्थापित करने का अधिकार दिया गया था। बम्बई में गंभीर मामलों की सुनवाई के लिए सर्किट न्यायालयों की स्थापना की गई थी। राजस्व विवादो के हल के लिए जिला कलेक्टर को अधिकृत किया गया था और उस की सहायता के लिए अधीनस्थ सहायक कलेक्टर नियुक्त किए गए थे। वे लगान वसूली, भूमि सीमा, कब्जे जल साधनों आदि के विवादों का निपटारा कर सकते थे। उन के निर्णयों की अपील जिला न्यायालयों को प्रस्तुत की जा सकती थी।
महत्वपूर्ण जानकारी देता आलेख।
अनुवादक : डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक” की कलम का कमाल देखिए उच्चारण पर जहां वे प्रस्तुत कर रहे हैं क्रिस्टीना रोसेट्टी की कविता का अनुवाद।
मैं जब दूर चला जाऊँगा,
मेरी याद तुम्हें आयेगी!
जब हो जाऊँगा चिरमौन,
तुम्हें यादें तड़पायेंगी!

इक क्षण ऐसा भी आयेगा!
मम् अस्तित्व सिमट जायेगा!
तुम सवाँर लेना अपना कल!
नई योजना बुनना प्रतिपल!

यादें तो यादें होती है,
तब तुम यही समझना!
मुझ अदृश्य के लिए,
नही तुम कभी प्रार्थना करना!
दीपक “मशाल” की कवितायें हमेशा ही बहुत संवेदनशील होती हैं। वे समाज के किसी न किसी नासूर को उजागर करती हैं। इस बार वो याद कर रहे हैं कोटला मुबारकपुर की एक तंग गली में गुज़ारे अपने दिन और उनके फ़्लैट के सामने वाले सीलन भरे अँधेरे कमरों में काम करते छोटे-छोटे, दुबले-पतले और कमज़ोर से बच्चे। वो बच्चे जो हर वक़्त सिर्फ एक ही काम में जुटे रहते और वो काम होता लहंगा या और किसी कीमती वस्त्र में कढ़ाई करने का या कि कहें उसे कढ़ाई कर कीमती बना देने का।
ना सिर्फ अपनी नाज़ुक, पतली, मासूम अंगुलियाँ उलझाकर
कुछ और तस्वीरें .5बल्कि पिरोकर उसमे अपने ख्वाब
अपनी रातों की नींद
सुनहरी तारों और रेशमी कपड़ों के बीच कहीं
बींध कर बचपन के अमोल पल उसमें
उन पर नज़र नहीं पड़ पायी किसी की


इसे सजाने की कीमत
पचास रुपये जोड़ा...
अपनी किलकारी को कलाकारी में बदलने का इनाम
पचास रूपये जोड़ा...

स्मृति पटल पर पडी याद का बढ़िया चित्रण। सच्चाई बयां करती बहुत ही सशक्त, मार्मिक और प्रभावी रचना। हर रोशन इमारत की नींव में ऐसे ही कितने दर्द छिपे हैं।

तोहरा से नज़र मिलाईं कईसे (भोजपुरी ग़ज़ल)
सुलभ सतरंगी की रचना पढें।

- सुलभ जायसवाल \देखाईं कईसे जताईं कईसे
हमरो अकिल बा बताईं कईसे
नासमझ के समझाईं कईसे

आँख खुलल बा जगाईं कईसे
अकेले सफ़र में गाईं कईसे

उदास मन बा खाईं कईसे
घाव करेजा के छुपाईं कईसे

पुरनका याद भुलाईं कईसे
तोहरा से नज़र मिलाईं कईसे

'सुलभ' झूट शान देखाईं कईसे
श्याम कोरी 'उदय' का सृजन एक बहुत ही अच्छी कविता है जो हमारी रचनात्मकता को प्रदर्शित करता है।
My Photoशब्दों की भीड में
चुनता हूं
कुछ शब्दों को
आगे-पीछे
ऊपर-नीचे
रख-रखकर
तय करता हूं
भावों को

शब्द, भाव, मंथन
मंथन से ही
संभव है
सृजन
एक "रचना" का !
कविता का बाना पहन कर सत्य और भी चमक उठता है।
My Photoमनुष्य का व्यवहार किन चीजों से निर्धारित होता है? उसमे सामाजिकता का क्या प्रभाव है? क्या व्यक्ति विशेष के लिए आक्रामकता का प्रदर्शन एक सीखी हुई प्रक्रिया है? जैविक द्वन्द और सामाजिक नियमन में अधिक प्रभावी क्या है, और कब है? क्या आदर्श व्यक्तित्व का खाका खिंच कर व्यक्ति के जैवीय आवेगों का नियमन किया जा सकता है? हारमोंस क्या है? उनका क्या कार्य है? वे कब पैदा होते हैं? व्यवहार से उनका कितना सम्बन्ध होता है?
इन सब प्रश्नों का जवाब ढूँढ रही हैं लवली कुमारी मानव व्यवहार की जटिलताओं पोस्ट द्वारा संचिका पर। कहती हैं जब तक सामाजिक रूप से सही और तर्क संगत तरीके से मनुष्य की जैविक आवश्यकतों की पूर्ति के लिए नियम नही बनाये जायेंगे वह असामान्य व्यवहार के लिए, अपराध के लिए प्रेरित होता रहेगा और बाजारवादी शक्तियाँ उसे जस्टिफाई करने के नए तरीके खोजती रहेंगी क्योंकि मनुष्य को असामान्यताओं के जल में उलझा कर ही उसे अपना विस्तार करना है।

.........और अन्त में-

जैसे तिल में तेल है,
ज्यों चकमक में
तेरा साईं तुझ में है,
तू जाग सके तो जाग||

20 comments:

  1. मनोज कुमार जी की कलम से निकली यह चर्चा बहुत ही सार्थक रही!
    बहुत-बहुत बधाई!

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  2. aapki is charcha me har post ke sath ki gayee mehnat saaf dikh rahi hai.. is sab ke liye aapka jitna aabhar vyakt karen kam hai.. :)

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  3. Bahut hi suljhi hui charcha...sabhi post nageene hain...
    bahut hi badhiya..
    aapka aabhaar...

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  4. शास्त्री जी चिट्ठा चर्चा प्रस्तुत करने में आप एकदम पारंगत हो चुके है...कही से कोई बढ़िया पोस्ट छूट नही पाती अपने में पूरी ब्लॉगवाणी जैसी कार्य करती है आपकी यह चिट्ठा चर्चा...प्रस्तुति बहुत अच्छी है...बहुत बहुत बधाई...सादर प्रणाम

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  5. वाह जी, बहुत उम्दा चर्चा..आनन्द आया इतने बढ़िया लिंक्स देखकर.

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  6. मनोज जी .. आप जैसों का विश्‍वास ही तो अध्‍ययन मनन में मेरी मदद कर रहा है .. बहुत सुंदर चर्चा की है आपने !!

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  7. waah manoj ji.. aapka andaaj sach me bahut umda hai...

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  8. मनोज कुमार जी
    चर्चा बहुत ही सार्थक रही
    बढ़िया लिंक्स के लिये आभार्।

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  9. मनोज जी सार्थक चर्चा के लिये धन्यवाद.

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  10. सराहनीय चर्चा ....
    मनोज जी को सार्थक प्रस्तुति किए लिए हार्दिक शुभकामनाएँ ..

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  11. जैसे तिल में तेल है,
    ज्यों चकमक में
    तेरा साईं तुझ में है,
    तू जाग सके तो जाग||
    .....बहुत सुन्दर,दार्शनिक भाव,अदभुत अभिव्यक्ति !!!

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  12. चर्चा वाकई में बहुत ही सार्थक रही.....
    आभार्!

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  13. सुन्दर चर्चा ! बेहतर संकलन ! आभार ।

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  14. आपके माध्यम से आज कई नए ब्लोगों की जानकारी मिली .....!!

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  15. बहुत उम्दा और सार्थक चर्चा.

    रामराम.

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  16. सार्थक और बढ़िया चर्चा

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  17. keval link de dena charchaa nahi hai.yah baat aapne logon ko sikhai hai.bhai apni or se ekadh line to kuchh likho. jaisaa aapane likha, fir link diya. badhai iss drishti ke liye. vilamb se dekh payaa, iskaa khed hai.

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