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Monday, April 26, 2010

“सर्व धर्म सम् भाव” (चर्चा मंच-133)

चर्चाकारा -------------वन्दना गुप्ता

दोस्तों,
आज मैं डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री जी के आमन्त्रण पर पहली बार चर्चा करने का प्रयास कर रही हूँ अगर कोई गलती हो जाये तो उसके लिये क्षमाप्रार्थिनी हूँ।
पहली चर्चा मैं जगत नियन्ता को समर्पित करती हूँ।
ना ही कोई हिन्दू देवी -देवता गलत हो सकता है 
और ना ही पैगम्बर मुहम्मद साहेब गलत हो सकते है और ना ही ईसा मशीह

आदमी वही अच्छा होता है जिसके अन्दर इंसानियत होती है। धर्म वो ही अच्छा होता है जिसके अन्दर समाज को जोड़ने की कला होती है। सिर्फ धार्मिक बनने या वेद कुरान का नारा लगाने वाला इन्सान कभी भी समाज के बारे मैं नहीं सोचेगा। वो तो सिर्फ अपने धर्म के बारे मैं ही सोचेगा। सिर्फ अपने धर्म को ही अच्छा कहेगा।
ना ही कोई हिन्दू देवी -देवता गलत हो सकता है और ना ही पैगम्बर मुहम्मद साहेब गलत हो सकते है और ना ही ईसा मशीह और ना ही वेद और गीता गलत है और ना ही कुरान और बाइबल। सब अपने -अपने ज़माने के महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रन्थ है। उस ज़माने मैं फैली हुई बुराइयों को दू….र करने के लिए श्री कृष्ण का अवतार हुआ, ईसा मसीह और पैगम्बर मुहम्मद …….…………….
श्री राधा जी का दिव्य प्रेम ( सच्चे प्रेम की परिभाषा )
हम वैसे इस योग्य तो नहीं कि राधा जी के विरह को समझ सके । वो तो शाश्वत परात्पर ब्रह्म क़ी ही चैतन्य शक्ति हैं । पर हम तो ईश्वर के बेटे हैं । इसीलिए बेटे को पिता के बारे में कहने के लिए कोई कागज़ी स्वीकृति कि आवशयकता नहीं होती । 
ईश्वर प्रेम या अपने सच्चे प्रेम लगभग एक जैसे लगते हैं । संसारी प्रेम में बस ये होता हैं कि इसमें कभी कभी मोह भी होता हैं तो भेद कर पाना मुश्किल होता हैं । फिर भी चाहे कुछ भी हो अगर मोह हैं तो भी सारा ईश्वर को ही साक्षी मानकर किया जाये कि हे प्रभु उस लड़की का सौंदर्य भी तुने ही तो दिया और मेरे मन को कमजोर भी तुने ही तो किया । अब जैसी तेरी मर्ज़ी । बस हममे सदा सच्चा प्यार ही देना……………….।
बाज़ार के भगवान-हिन्दी हास्य कविताएँ
बाज़ार में नीलाम हो जायें
वही लोग आजकल कहलाते “बड़े” है,
डरते है जो बिकने से या काबिल नहीं बिकने के
वह छोटे इंसानों की पंक्ति में राशन लेने खड़े हैं।
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अब इस धरती पर
भगवान अवतार नहीं लेते,
जिसकी नीलाम बोली ऊंची लगायें सौदागर
लोग उसे ही भगवान मान लेते।
विस्तार
विस्तार मेरे नैनों के नीलाभ व्योम में, एक चन्दा, एक बदली और कुछ झिलमिल तारे रहते हैं. सावन में, जब घनघोर घटायें उमड़ घुमड़ कर,आँखों में खो जाती हैं. चन्दा, तारे सो जाते हैं. वर्षों मरु थे, जो पोखर सारे,स्वमेव ही भर जाते हैं. कभी………………
आज से पाँच साल बाद, पचास साल बाद, 
पाँच हज़ार साल बाद
Posted by कुमार संभव 
आज से पाँच साल बाद, पचास साल बाद, पाँच हज़ार साल बाद
मेरा बेटा, उसका बेटा या उसका बेटा

पूछेगा - नदी क्या होती है?
जवाब होगा - नदी बेटी, पत्नी और माँ की तरह होती है.
उसके किनारे सभ्यता और संस्कृति पनपती है.
फिर वो पूछेगा - कौन उठा लेगया उसे ?
जवाब होगा - किनारे की सभ्यता पीगई उसे
संस्कृति ने तबाह कर दिया.
आज से पाँच साल बाद, पचास साल बाद, पाँच हज़ार साल बाद
हम बनाते हैं भगवान - बस्तर यात्रा -12
आज के अभिमन्यु |
भाग्यशाली लगता है,
आज अर्जुन पुत्र अभिमन्यु,
जिसने चक्रव्यूह भेदने की कला
माता के गर्भ में रहते हुए ही सीख ली थी|

                नहीं जानता था वह चक्रव्यूह से बाहर निकलना,
                पर तोड़ दुश्मन का घेरा,
                घुस तो गया था अन्दर,
                वह कपटियों के बिछाए जाल को तहस नहस करने को,
                मरा जरुर वह,
                परन्तु अपना शौर्य दिखाकर,
                दुनिया को अपनी वीरता और क्षमता का प्रदर्शन दिखाकर|
अनुभूति
सोच रहा मेरा पागल मन !
कौन शक्ति दुनिया में
जिससे है इतना भारी अपनापन !
सोच रहा मेरा पागल मन !
है सुख क्या दुःख कौन वस्तु है,
है अथवा यह सब केवल भ्रम,
क्या इस जीवन में सुख दुःख का
चलता ही रहता है यह क्रम,
क्यों नैराश्य है दुःख का सूचक,
क्यों है आशा ही में जीवन !
अनुकरणीय श्रीमदभगवद गीता [स्थाई स्तंभ-2] - अजय कुमार

रचनाकार: अजय कुमार
Kaifi
श्रीमद्भगवदगीता- पहला अध्याय

तत: शड्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखा:।
सहसैवाभ्यहन्यंत स शव्दस्तुमुलोSभवत्॥13॥
अनुवाद:- तत्पश्चात्(उस सेना में) शीघ्र ही शंख, भेरी, ढोल, मृदग और गोमुख बाजे बजे; जिनसे भारी शब्द हुआ।

तत: स्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।
माधव: पाण्डवश्व्हैव दिव्यौ शस्खौ प्रदध्मतु:॥14॥
अनुवाद:- तदनंतर, श्वेत वर्ण के घोड़ो से जुते हुए उत्तम रथ पर स्थित श्रीकृष्ण और अर्जुन ने अपना अपना दिव्य शंख बजाया।

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनज्जय:।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशड्खं भीमकर्मा वृकोदर:॥15॥

अनंतविजयं राजा कुंतिपुत्रो युधिष्ठिर:।
नकुल: सहदेवश्च सुघोषमणुपुष्पकौ॥16॥
आत्मकथ्य
यह प्रारंभनहीं है निमेश भर, मायापाश काऔर न ही अंतिम मुक्ति का प्रश्वास;यह तिमिर हैचिरसंचित,चिरकालीनउस दिन सेजब वे मुझे कैद कर गए थेरहस्य-गर्भ स्पंदित कारागारों में ;तब रुद्ध-सिंहा मेरी आत्माबच निकली थी,वातायन वेदना के दौरानउन सघनित लोहे की सलाखों
“महाकुम्भ-मेला” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

महाकुम्भ-स्नान

हरिद्वार, उज्जैन, प्रयाग।
नासिक के जागे हैं भाग।।




बहुत बड़ा यहाँ लगता मेला।
लोगों का आता है रेला।।
 
"सत्यामृत"
आओ चलें, वहां - जहां'सत्यामृत' झर रहा हैचलते-चलते न रुकेंबढते-बढते, बढते रहेंहम भी पहुंचे वहांजहां 'सत्यामृत' झर रहा हैएक बूंद पाकरहम भीअजर-अमर हो"सत्यामृत" बन जाएंआओ चलें, वहां - जहां'सत्यामृत' .............।
कडुवा सच
श्याम कोरी 'उदय'

घरौंदा गम की तपिश हो या सोचों का बवंडर हो शोला हो मन का या आंखों का समंदर हो , डूब जाता है जैसे सब जब तैरना भी आता हो मंझदार नही मिलती किनारे पर च...

आँखों से अपने अश्क बहाया न करो, बेकार अपना नूर गँवाया न करो, गुम-सुम उदास रहने से कुछ लाभ नहीं, तिल-तिल के अपना आप मिटाया न करो !






..पोस्टो के शतक का सफर..और मैं! और आप सभी का आशीर्वाद ..!!. . आदरणीय ब्लॉगर भाइयों .बहनों ..कमलेश वर्मा का आप सभी को सादर प्रणाम ,नमस्कार एवम आशीर्वाद ......आज आप लोगों के अपार स्नेह एवम भावपूर्ण मार्ग दर्शन में मै...

शब्दों को पिरो दिलों को जोड़ने का प्रयास जब देश में भाषा व क्षेत्र के नाम पर अलगाववाद की राजनीति कर एकता व अखंडता को क्षति पहुंचाई जा रही हो ऐसे में 95 भाषाओं के शब्दों को एक माला में पिरोना निश्...



और अब आखिर में--------
बेग़म परवीन सुल्ताना-ठुमरी -तुम राधे बनो श्याम
ये आवाज़ - मानो नदी की कोई महीन धारा, कलकल करती, मधुर ध्वनि से आहिस्ता-आहिस्ता पहाड़ उतर रही हो.... एक तारों भारी रातमेरी अपनी यादों में सिक्किम की हल्की, पिस्तई तीस्ता सदा हरहराती है या फिर बाड़गंगा का धीमा मद्धम बहाव जो पहाड़ी की ओट होते ही कभी कानो……।
आज की पहली चर्चा में थोडा लीक से हट्कर काम करने की कोशिश की है जिस तरफ़ कम ही ध्यान जाता है । 
उम्मीद करती हूँ ये अन्दाज़ आप सबको पसन्द आयेगा।
- वन्दना गुप्ता

16 comments:

  1. mujhe to aapki charcha bahut pasand aayi.. roj-roj unhi chitthon ko dohrate rahna bhi theek nahin. kuchh aur logon ko bhi avsar milna hi chahiye.

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  2. सुन्दर और सम्पूर्ण चर्चा के लिए
    वन्दना जी को बधाई!

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  3. Vandana ji ne bahut hi sundar aur alag charcha ki hai..bahut pasand aayi hai..unhein anekon badhaii..
    aabhaar...

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  4. इतनी अच्छी और तथ्यपूर्ण चर्चा के लिये बहुत बहुत बधाई एवं आभार वंदनाजी ! सारी प्रविष्टियाँ अनमोल हैं ! धन्यवाद !

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  5. यह ढंग भाया !
    चर्चा सुन्दर है ! पहली चर्चा स्वागत योग्य है !
    आभार ।

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  6. शास्त्री जी...बेहतरीन चर्चा मंच सजाया....बधाई

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  7. चर्चा मंच पर आपकी पहली चर्चा का स्वागत है....बढ़िया चर्चा रही...नए लिंक्स के लिए आभार...मेरे चिट्ठे तो शामिल करने के लिए शुक्रिया

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  8. कोई कमी नहीं।
    एकदम मस्त चर्चा!

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  9. चर्चा मंच पर आपकी पहली चर्चा का स्वागत है|

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  10. Bahut hi sundar charcha. ise aage badhate rahiye.

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  11. चर्चा मंच पर आपकी पहली चर्चा का स्वागत है|मेरे चिट्ठे तो शामिल करने के लिए शुक्रिया !

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  12. चर्चा का अंदाज़ बहुत ख़ूबसूरत है!

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  13. बहुत ही सुन्दर और अलग ढंग की तथ्यपूर्ण चर्चा...बधाई

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  14. वंदना जी अच्छी चर्चा के लिये साधुवाद

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