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Thursday, October 07, 2010

गुरूवासरीय चर्चा-----(चर्चा मंच—299)

अरे क्या बतायें भाई! बडी अजीब मुसीबत है.यूँ समझिये कि एकदम से जान साँसत में आई पडी है.अभी अभी पंडिताईन से वाकयुद्ध् करके हटे हैं और आते ही ये चर्चा करनी पड गई. लेकिन आज अपना अपना मूड बहुते खराब है,इसलिए चर्चा-उर्चा तो बाद में करते रहेंगें अभी तो आप लोगों से तनिक अपना दु:ख दर्द सांझा कर लिया जाए.भई बात ये है कि अभी जैसे ही भोजन करने बैठे तो थाली में टेढी-मेढी,जली-भुनी रोटियाँ देखकर दिमाग भन्ना गया.हमने पंडिताईन से पूछा कि ये रोटी बनाई है या हिन्दोस्तां का नक्शा बनाया है.बस जी सुनते ही भडक गई.कहने लगी “आपको तो बस मेरी कमियाँ निकालने का मौका चाहिए. आदत ही पड चुकी है बोलने की तो बोलते रहो.मैं भी कहाँ तक करूँ मरी. बच्चों को पढा लो या घर का काम करा लो”
अब आप भी जानते हैं कि  खाना तो वो होता है जिसे देखकर ही मुँह में पानी आ जाए ये थोडा ही कि सुबह शाम बीवी के हाथ की जली भुनी रोटियों का फ्लैगमार्च ही देखने को मिलता रहे.भई,ऎसा खाना खाने से तो बेहतर है कि भूखा रहा जाए या फिर टेस्टी-टेस्टी केले खाकर ही गुजारा कर लिया जाए.
लो जी,हमने सिर्फ इतना कहा कि तुम तो बच्ची को पढ़ाओ मत!कार खरीदो ताकि तुम्हारी जिंदगी का सफ़र मजे से कट सके.हमारा क्या है…हम तो ठहरे पति नामक जीव…दुनिया जहान के पतियों की तरह हम भी काट ही लेंगें जैसे तैसे.  
लेकिन वो पत्नि ही क्या, जो पति के व्यंग्य को न समझ पाये. लो जी, बस मुँह खोलने भर की देरी थी कि महाभारत शुरू….कहने लगी कि एक मैं ही हूँ,जो कि जैसे तैसे निभा रही हूँ. वर्ना कोई ओर होती तो अब तक न जाने कब की छोड छाड कर अपने माँ-बाप के घर चली गई होती.एक मैं ही पागल हूँ जो घर के कामकाज से दिन भर की थकी हारी ड्योढ़ी पर खड़ी शाम से तुम्हारे आने की राह ताकती रहती हूँ कि कब आएं और प्यार के दो मीठे बोल सुनने को मिले. लेकिन तुम हो कि आते ही जली कटी सुनाने लगते हो…… 
       
अरी भागवान! तुम भी न जरा सी बात का बतंगड बनाकर बैठ जाती हो….खाली कहने भर से थोडा ही कुछ होता है.अब इस भूखे को रोटी दो तो जाने कि तुम्हे पति की फिक्र है…वर्ना तो हम यही कहेंगें कि तुम सिर्फ यूँ ही झूठ-मूठ की बातें बनाना जानती हो…
अब आखिर, है तो वो हिन्दूस्तानी नारी ही न ! जो, चाहे जितना मर्जी ‘प्रपंच’ कर ले,लेकिन जिसके मुँह से आखिर में पति को यही सुनने को मिलता है कि अच्छा ... आप भी न बडे वो हो :)

लो जी, घर घर की इस रामकथा का ये अध्याय तो यहीं समाप्त होता है…….अब चला जाए. आज चर्चा तो हम कर नहीं पाएंगें… क्यों कि आज हमरा मूड कुछ ठीक नहीं है :)

लीजिये साहब गांधीजी के यहां घंटी जा रही है

image विष्णुजी छीरसागर में शेषशैया पर ऊंघ रहे थे। शेषनाग भी जम्हुआई ले रहे थे। अचानक किसी लहर को ठिठोली सूझी वह झटके से शेषनाग के ऊपर लस्टम-पस्टम होते हुये विष्णुजी से जा लगी। विष्णुजी चिहुंककर जाग गये। लहरस्पर्श का सुख दबाते हुये गीले पीताम्बर के साथ गंभीरता का चोला लपेट लिया। शेषनाग ने मुस्तैदी के साथ कमांडो वाले अंदाज में फुफकार कर सारा पानी फिर क्षीरसागर में डाल दिया।

बच्ची को पढ़ाओ मत! कार खरीदो

‘मेरा भारत सचमुच में महान है जहाँ एम्बुलेन्स के मुकाबले पिज्जा पहले पहुँचता है और जहाँ कार के लिए ऋण सात-आठ प्रतिशत की ब्याज दर पर और उच्च शिक्षा के लिए ऋण बारह प्रतिशत की ब्याज दर पर मिलता है।’ऐसे एसएमएस आए दिनों मुझे भी मिलते रहते हैं। कल मुझे ऐसे एसएमएस को अनुभव करने का अवसर मिला।

मुगालतों का देश और सुपर पॉवर होने का सपना..!(Sundip Kumar Singh)

कॉमनवेल्थ खेलों की रंगारंग ओपनिंग सेरेमनी के बाद देश का दम और दुनिया में भारत की दबंगई का ढोल पीटने वाले लोग इधर काफी मुगालते में जीने लगे हैं. अचानक से देश-दुनिया के तथाकथित सेलेब्रिटी लोगों के बयान अख़बारों में नज़र आने लगे हैं जिनमे कॉमनवेल्थ खेलों की चमक-दमक को भारत की चमक-दमक से जोड़कर राष्ट्रीय गर्व का एहसास कराया जा रहा है.

एक कछुआ जो कह रहा है अपनी कहानी !

एक कछुवें की कहानी कछुवें की जुबानी
क्षितिरतिविपुलुलतरे तव तिष्ठति पृष्ठे। धरणिधरणकिणचक्रगरिष्ठे।। केशव धृतृतकच्छपरूप। जय जगदीश हरे॥
अर्थात(हे केशव!पृथ्वी के धारण करने के चिन्ह से कठोर और अत्यन्त विशाल तुम्हारी पीठ पर पृथ्वी स्थित है,ऐसे कच्छपरूपधारी जगत्पति आप हरि की जय हो)(श्रीदशावतारस्तोत्रम)

क्यों टटोलूं तेरी नब्ज़ मैं ?

कई गायें खेतों में चरने लगी हैं.राधा अपना सर कृष्ण के काँधे से उठाimage कर देखती है...दिन ढलने को है.पिछले ही पल तो कंधे पर सर रखा था तब तो सवेरा था. अगर काफी देर हुआ तो मेरे गर्दन में दर्द होना चाहिए था लेकिन नहीं हो रहा. कृष्ण, राधा की मग्नता टूटा देख अपनी उंगलियों से बांसुरी के छिद्रों की तस्दीक करते हैं.

क्या खूब पेट पर दे मारा - कॉमन वेल्थ गेम्‍स- राजू कुलकर्णी

चालीस करोड का गुब्बारा
क्या खूब पेट पर दे मारा
मत लटक कृषक इन पेडों पर
करना ही हो जो आत्त्महनन
तो दौड लटक गुब्बारों में
महाबचत है खेलबजट
है माल बहुत कलमाडी में
है खून-पसीना बंद तेरा
स्विस बैंक की अलमारी में

हमारे संस्कार अभी भी जीवित हैं-- धन्य हैं ऐसे माता-पिता !

समाज में तेजी से हो रहे परिवर्तन में सबसे चिंता का विषय है हमारी नयी पीढ़ी का अपने संस्कारों को भूल जाना.आजकल बच्चे अपने माता-पिता और बड़ों से सम्मान के साथ बात नहीं करते। खुद को ज्यादा होशियार और बाकी सभी को अपने से कमतर समझते हैं। नयी पीढ़ी का होने के नाते,वे खुद को ज़हीन और समय के साथ समझते हैं, लेकिन बड़े-बुजुर्गों को दकियानूस और आउट डेटेड समझते हैं।

खीर का कटोरा!

पंडितजी की खीर का कटोरा उस परिवार में पहले अलग ही रखा जाता था,क्योंकि छोटी कटोरी से पंडितजी का काम नहीं चलता था। अत: वह बड़ा कटोरा उन्हीं के लिए रखा गया था,जो श्राद्ध-पक्ष में ‍िनकाला जाता था। इस बड़े कटोरे में खीर प्राप्त कर लेने के बावजूद यदि थोड़ा आग्रह-मनुहार किया जाए-जो कि परंपरा के अनुसार किया ही जाता था-तो पंडितजी थोड़ी और खीर ग्रहण कर ही लेते थे। मगर….

कुछ अनसुलझे रहस्य ..... १

imageब जैसे कि हम कहेंगे कि आज बीमारियों का इलाज हो गया है।पुराने लोगों ने इन बीमारियों के इलाज क्‍यों न बता दिये।लेकिन आप हैरान होंगे जानकर कि आयुर्वेद में या युनानी में इतनी जड़ी बूटियों का हिसाब है और इतना हैरानी का है कि जिनके पास कोई प्रयोगशालाएं न थे वे कैसे जाने सके कि यह जड़ी-बूटी फलां बीमारी पर इस मात्रा में काम करेंगी….


दो रोटियों के सिंकने के बीच



दो रोटियों के बीच
देखती हो स्वप्न
स्वप्न में उडती है
तितलियाँ रंग विरंगी,
आसमान में होता है
चाँद पूनम का, गोल
बिल्कुल रोटियों की तरह

तलहट्टी में छिपी यादें

यादें अदृश्य हैं
फिर भी जुडी हैं मन से
ठीक वैसे ही
जैसे इन्द्रियाँ जुडी है तन से ॥
दुसरे इन्द्रियो की तरह
यादें कुछ मांगती भी नहीं हैं
खाने को /पीने को
बस छुपी रहती है
दुबकी रहती है
वर्तमान की तलहट्टी में ॥

अच्छा ...आप भी न...

अच्छा ...आप भी न ...
ऐसे हि बोलते हो...
झाड़ पर चढ़ाते हो बस...
कहीं इस उम्र में भी...
मैं नही बस...
और मैं देखता हूँ तुम्हें
अपने आप में सिमिटते
कभी पल्लू से खेलते

बदतर है...(हिमांशु डबराल)

क्या मंदिर है, क्या मज्जिद है,
दोनों एहसासों के घर है...
आखें बंद रखो तो शब्,
वरना हर वक्त सहर है...image

वरण करो न अंध विचार

वरण करो न अंध विचार।

हो जाता है हरण सभ्यता का इससे विस्तार।।
जीवन-तरणी डूब नहीं जाती है बिन पतवार।।

उसे बचाने वाला भी बनता है एक विचार –
किसी तरह से पार लगूँगा, मानूँगा न हार।।

नेत्रहीन विश्वासों की आयी है अंध बयार।।
बचो,कहीं फिर उड़ ना जाए वेदों-सा शृंगार।

ओपन बुक्स ऑनलाइन पोर्टल

आज की साम्प्रदायिकता के नाम...(Hilal Ahmad 'hilal')

काश रहबर मिला नहीं होता
मै सफ़र में लुटा नहीं होता
गुंडागर्दी फरेब मक्कारी
इस ज़माने में क्या नहीं होता
हम तो कब के बिखर गए होते
जो तेरा आसरा नहीं होता
आग नफरत की जिसमे लग जाये
पेढ़ फिर वो हरा नहीं होता

संविधान चालीसा

जय भारत दिग्दर्शक स्वामी । जय जनता उर अंतर्यामी ॥
जनमत अनुमत चरित उदारा । सहज समन्जन भाव तुम्हारा॥
सहमति सन्मति के अनुरागी । दुर्मद भेद - भाव के त्यागी॥
सकल विश्व के संविधान से। सद्गुण गहि सब विधि विधान से॥
गुण सर्वोत्तम रूप बृहत्तम। शमित बिभेद शक्ति पर संयम ॥
गहि गहि राजन्ह एक बनावा । संघ शक्ति सब कंह समुझावा ॥
देखहु सब जन एक समाना। असम विषम कर करहु निदाना॥

सबसे पहले अपने में,इंसान को बसाओ

निरंतर सब कहते हैं
पानी बचाओ,बिजली बचाओ
टाइगर बचाओ,दुनिया बचाओ
प्रयावरण बचाओ
कभी नहीं सुना,कोई कह रहा हो
इंसानियत बचाओ

कार्टून:- ये है अयोध्या फ़ैसले पर सुलह का प्लान

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हो गए युवा कन्फयूज !!! !!!!!! !!!!! !!!!


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20 comments:

  1. अरे.....अरे ...पंडित जी आराम से !! चलिए आप कह रहे है तो हम मान लेते है कि आज आप चर्चा नहीं कर रहे है ......वैसे बातों बातों में आप जो लिंक्स दे गए है हम भी कहे दे रहे है .......भले ही आपको बुरा लगे ......हम भी उन लिंक्स को नहीं देखे है ! और फिर जब आपने चर्चा करी ही नहीं तो हम आभार किस बात का जताये .... क्यों है ना ???
    सो बस राम राम किये जा रहे है !

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  2. भूखे पेट न भजन गोपाला...मगर चर्चा तो हो ही सकती है. :)

    बढ़िया रही महाराज!

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  3. बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
    मध्यकालीन भारत-धार्मिक सहनशीलता का काल (भाग-२), राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

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  4. बिना चर्चा की चर्चा में चर्चा ना करने के बाद भी चर्चा करने के लिए बहुत आभार ...
    अच्छे लिंक्स ...थोड़ी फुर्सत से पढेंगे ...!

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  5. बहुत अच्छी प्रस्तुति।

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  6. बहोत ही अच्छी रही आज की चर्चा .........आभार

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  7. रचनाओं पर आपके कमेंट्स अच्छे लगे पंडित जी !
    प्रणाम !

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  8. चर्चा अच्छी लगी |बधाई
    आशा

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  9. पंडजी चिंता मत करो, अपने देश की खासियत यही तो है कि सब धीरे-धीरे अपने आप पटरी पर खुद व खुद आ जाता है ! :)

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  10. वाह क्या चर्चा मे नमक मिर्ची डाला है …………खाने का स्वाद बढ गया है……………ये अन्दाज़ भी रास आया………………बस अब चाशनी हम डाल देते हैं…………टिप्पणी करके।

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  11. बहुत सुन्दर चर्चा !

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  12. बहुत अच्छी चर्चा और बहुत अच्छे लिंक्स ...आभार

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  13. अच्छी चर्चा ,मस्त कार्टून ।

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  14. बहुत अच्छी चर्चा और बहुत अच्छे लिंक्स ...आभार!

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  15. चर्चा अच्छी लगी
    http://shikanjee.blogspot.com/

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  16. चर्चा तो सुंदर है ही उसपर अपनी पोस्ट का भी ज़िक्र हो तो मज़ा और भी बढ़ जाता है.

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  17. अच्छा लिखते हो भैयाजी
    कभी हमारे द्वारे भी आना
    जै राम जी की

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