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Friday, October 08, 2010

चर्चा मंच # 300 - अनामिका


1. मनोरमा... पर श्यामल सुमन जी की नयी गज़ल देखिये ..
अश्क यूँ बहते नहीं
भाव चेहरे पर लिखा जो लब से वो कहते नहीं
है खुशी और गम जहां में अश्क यूँ बहते नहीं
हो भले छत एक फिर भी दूरियाँ बढ़ती गयी
आज अपने वो बने जो साथ में रहते नहीं


2.  * क्या जग का उद्धार न होगा पढ़िए  Unmanaa... पर ये कविता..
इस पतझड़ के से मौसम में
उपवन का श्रृंगार लुट गया,
लजवंती रजनी के कर से
आँचल का आधार छुट गया,
उमड़ी करुणा के मेघों से पृथ्वी का अभिसार न होगा ?
ओ निर्मम तव दमन चक्र से क्या जग का उद्धार न होगा ?


3.  अपराजिता at Chashmebaddoor पर पढ़िए...माँ और मैं
माँ से पहले मैं
न तत्व थी
न अस्तित्व था
न जान थी
न जीवन था


4.  अनुपमा पाठक at अनुशील -पर नयी कविता लेकर आई हैं
  बादलों का सहोदर
ललित भैया की प्रेरणा से यह रचना अस्तित्व में आई थी.... , आज
उन्ही के द्वारा नए रूप में सजाये गए "अनुशील ...एक अनुपम यात्रा" पर सबसे
 पहले उन्ही की प्रेरणा से लिखी एक कविता .....
बादल अपनी व्यथा-
उनसे कहते हैं...
वो पीर लिए हृदय में-
हँसते हुए सबकुछ सहते हैं...


5.  रचना समय... पर रूपसिंह चन्देल जी की कुछ रचनाये पढ़िए..
कविताएं

पिछड़ा हुआ कह के
देश को पीछे छोड़ दिया
सोने-चांदी के लोभ में
पराये से नाता जोड़ लिया
मौसम से सीखो
इसमें राज़ बड़ा है
जो जड़ से जुड़ा है
वो अब भी खड़ा है
रंग जिसने बदला
वो कूढ़े में पड़ा है
ये व्यर्थ के चौंचले
हैं रुढ़ियों के घोंसले
एक दिन ढह जाएंगे
वक्त के साथ बह जाएंगे
सिंदूर-मंगलसूत्र के साथ
ये भी कहीं खो जाएंगे
एक समय चट्टान थी
चोट खा कर वक़्त की
मार खा कर लहर की
टूट-टूट कर
बिखर-बिखर कर
बन गई वो रेत थी



6.  रोजनामचे में मेरा दिल, हलाल हुआ है ...ये रचना है ब्लॉग
काव्य मंजूषा पर...
जीतने का हुनर हम,  भूलने लगे
हारने का न कोई, मलाल हुआ है
अफ़वाह सुनी थी कहीं, के क़त्ल हुआ था
रोजनामचे में मेरा दिल, हलाल हुआ है



7. बन जाओ अफ़साना...ये रचना पढ़िए..JHAROKHA पर पूनम जी की ..
तुम गीत गज़ल बन करके
मेरे सपनों में आना
मैं शब्द शब्द बन जाऊंगी
तुम बनना नया तराना।



8.  RAJESH CHADDHA / राजेश चड्ढ़ा... पर राजेश चड्ढ़ा जी की नयी गज़ल पढ़िए..
मत मांग गरीब रात से/
मत मांग गरीब रात से, तू गोरे चांद सी रोटी ,
तोड़ देगी भूख़ तेरी, ये लोहारी हाथ सी रोटी ।
नहीं करेगा कोई तमन्ना, पूरी ख़ाली पेट की,
अरे नहीं मिलेगी तुझे कभी, सौग़ात सी रोटी।


9. "अभिनन्दन"... पर योगेश शर्मा जी की कविता " 'उन्हें जानना है....' को जानिये..
उन्हें जानना है  मेरी,  बर्दाश्त की हदें
जो समझ न पाए, अपने ज़ुल्मों की इन्तेहा
बनके चारागर नमक ज़ख्मों पे डालते रहे
और हंस के पूछते हैं,  मुझे दर्द है कहाँ



10 Palash... पर पलाश जी की गज़ल कुछ ढूँढ रही हूँ पढ़िए..
इस अंजान शहर में कोई अपना ढूँढ रही हूँ |
कुछ नही अपनी जिन्दगी का मुकद्दर ढूँढ रही हूँ ||
किसको फुरसत है जो पल भर साथ बैठ सके |
जो मेरे साथ चल सके वो डगर ढूँढ रही हूँ |



11. zindagi-uniquewoman... पर zindagi-uniquewoman.blogspot.com
लिंक पर अर्चना धनवानी जी की रचना हाज़िर है........" ये ज़िन्दगी "...
कितना खुबसूरत सफ़र है  ..ज़िन्दगी का....
कुछ अजनबी चेहरे अपने बना देती है....
तो कुछ जाने पहचाने चेहरे पराये कर देती है....
कितने दर्द देती है तो दूसरे ही पल राहते दे जाती है....
कितने इम्तहान लेती है तो अगले ही लम्हे में ज़िन्दगी सवार देती है....


12.  वंदना शुक्ला जी के ब्लॉग  चिंतन -पर  पढ़िए...रास्ते
मेरे बचपन की वो पगडंडी
.बारिश की सोंधी
महक से गुलज़ार,
खुशबूदार खुबसूरत
फूलों से लदी डालियों से
घिरी,और
झरे हुए पतों और फूलों पर
दौड़ता मेरा बिंदास
बचपन
आदि और अंत से
बेखबर




13.  आज से नवरात्रे शुरू हो रहे हैं तो सबसे पहले GURUTVA KARYALAY...
 पर GUTUTVA KARYALAY पर  पढ़िए आज

मां के चरणों में निवास करते समस्त हैं तीर्थ

माता गुरुतरा भूमे:।
अर्थातः मां इस भूमि से भी कहीं अधिक भारी होती हैं।
आदि शंकराचार्य का कथन हैं '
कुपुत्रो जायेत यद्यपि कुमाता न भवति।
अर्थातः पुत्र तो कुपुत्र हो सकता है, पर माता कभी कुमाता नहीं हो सकती।
भगवान श्री रामका वचन हैं।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।
अर्थातः जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर होते हैं।


14.  शरद कोकास... पर शरद कोकास जी आमंत्रित कर रहे हैं आप सब को
अपनी अपनी कवितायेँ भेजने के लिए अपने इस लेख द्वारा...पढ़िए..
नवरात्र कविता उत्सव में आपका स्वागत है
कल आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से शरद नवरात्र प्रारम्भ होने जा रहा है । वर्ष में दो बार आने वाले इस पर्व पर मैं विगत दो नवरात्र से कवयित्रियों की कविताएं प्रस्तुत करता आ रहा हूँ । इस श्रन्खला में सर्वप्रथम मैंने हिन्दी की कवयित्रियों की कविताएँ प्रस्तुत की थीं । उसके अगले नवरात्र में विदेशी कवयित्रियों की कविताओं के हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किये थे । आप सब ने इन कविताओं को पढ़ा था एवं इनकी सराहना की थी और भरपूर टिप्पणियों के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी ।
आप सभी के स्नेह एवं प्रोत्साहन के फलस्वरूप इस नवरात्र में भी मै यह श्रन्खला जारी रखना चाहता हूँ । इस बार इस श्रन्खला में आप पढ़ेंगे भारतीय भाषाओं की कवयित्रियों की कवितायें ।
 

15.  उठो! जागो!... पर jayantijain ब्लॉग पर 

ए. पी. जे. अब्दुल कलाम के प्रेरक वचऩ 

  • आपको खुद अपना निमार्ण करना है और जिंदगी को सँवारना है।
  • अदम्य साहस का दूसरा कदम है किसी लक्ष्य या ध्येय का पूरा करने  के रास्ते में आने वाली सभी बाधाओं पर विजय पाने की क्षमता।
  • जब कोई अभियान प्रगति पर हो तो हमेशा कुछ-न-कुछ समस्याएँ या असफलताएँ सामने आती ही हैं, किंतु असफलताओं के कारण कार्यक्रम बाधित नहीं होना चाहिए।
  • फूल को देखो-वह कितनी उदारता से अपनी खुशबू और शहद बाँटता है। वह हर किसी को देता है, प्यार बिखेरता है, और जब उसका काम पूरा हो जाता है तो चुपपाच झड़ जाता है। फूल की तरह बनने की कोशिश करो, जिसमें इतनी खूबियों के बावजूद जरा भी घमंड नहीं।


16.  नेटवर्क6... पर आवेश तिवारी के ब्लॉग का ये लेख पढियेगा....
http://www.network6.in/2010/10/06/%E0%A4%AE%E0%
A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A
4%97%E0%A4%B2-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%
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मैं मंगल कुंजुम बोल रहा हूँ..

आप को शायद अजीब लगे, लेकिन ये सच है कि भान  साहू या मंगल कुंजुम या फिर उनके जैसे हजारों लोग किसी बडबोले अखबार या फिर बाजार में ख़बरों को उत्पाद बनाकर बेंच  रहे किसी इलेक्ट्रानिक चैनल का हिस्सा नहीं हैं ,ये मीड़िया का वो चेहरा हैं जिन्हें बमुश्किल अपना नाम भी लिखने आता हो ,लेकिन ख़बरें साँसे ले रही न सिर्फ साँसे ले रही है बल्कि बिजली की गति से भी तेज हर एक उस आदमी तक पहुँच रही हैं जिसे ख़बरों की भूख है |ये करिश्मा है सी जी नेट स्वर का ,जिसने मोबाइल फोन के जरिये जल ,जमीन और जंगल से जुडी बुनियादी जरूरतों के लिए जूझ रहे घोर नक्सल प्रभावित गोंडवाना इलाके में क्रांति कर दी है .


17.  kavyakala... पर Laxmi N. Gupta जी द्वारा पढ़िए एक पौराणिक कथा..
गुणकेशी के लिए वर...
गुणकेशी इन्द्र के सारथी मातलि की पुत्री थी जो बहुत ही रूपसी और सर्वगुणसम्पन्न थी। मातलि उसके लायक वर की तलाश कर रहे थे। उन्हें देव, गन्धर्व या नर लोकों में कोई ऐसा नहीं मिला जो उन्हें गुणकेशी के लायक लगा। फिर वे नारद मुनि के साथ नागलोक जाते हैं सुयोग्य वर की खोज में। वहाँ पर उन्हें सुमुख नामक नाग युवक अपनी कन्या के योग्य वर लगता है। वे उसके पितामह से बात करते हैं। पितामह को कोई आपत्ति नहीं है किन्तु वे बताते हैं कि नागों के सहज शत्रु गरुड़ ने सुमुख के पिता को खा लिया था और एक महीने बाद वे सुमुख को खाने वाले हैं। इन्द्र की आज्ञा के अनुसार गरुड़ को नागों को खाने का अधिकार है। मातलि कहते हैं कि उन्हें पूरा विश्वास है कि वे इन्द्र की कृपा से सुमुख का जीवन बचा सकते हैं.


18. अर्पणा दीप्ति... पर arpanadipti ब्लॉग पर देखिये एक पोस्ट जो एक उपन्यास
 के बारे में बता रही है...
उधार की सुरक्षा में असुरक्षित स्त्री
लेखिकाओ का अनुभव संसार इतना शाही नहीं होता ,वे भी अपने समय और समाज पर गहरी नजर रखती है और उसकी उन भीतरी सच्चाईयों से परिचित रहती हैं, जिन्हें पुरुषों की दुनिया सदा अंधेरे में कैद रखती है । ’त्रिया हठ ’में भी कुछ ऎसी ही अंधकार ग्रस्त दबी छिपी सच्चाइयों को सामने लाया गया है ।
इस उपन्यास में मुख्य आठ पात्र सम्मिलित हैं। मीरा इस कथा की वाचिका है। त्रिया हठ ’(2006) की कथा वस्तु पतिव्रता उर्वशी की कथा है । एक बेटे द्वारा अपनी माँ की मौत की सच्चाई ढूँढ़ने की और माँ को इंसाफ दिलाने की कथा । कहानीकार को एक बेटे की चुनौती की गाथा कि- ...



19.  Arvind Jangid... पर arvind jangid जी  एक रोचक कहानी सुना रहे हैं..
क्यों की वेद तो चार नहीं आठ होते हैं
पंडित जी ने वचन दे रखा था, इसलिए मना भी नहीं कर पाये। राहगीर ने पंडित जी से कहा की "मुझे आप की मूंछ का एक बाल चाहिए"  और उसने पंडित जी की मूंछ में से एक बाल उखाड़ लिया और जाने लगा, तभी गाँव वालों ने पूछा की तुमने पंडित जी से धन क्यों नहीं लिया इस बाल का तुम क्या करोगे ? "



20.  यथार्थ... पर रेखा श्रीवास्तव जी का लेख पढ़िए...
वसीयत
  सबसे पहले मैं बता दूं किये कहानी बिल्कुल भी नहीं है बल्कि हाल ही में घटी एक सच्ची कहानी है. वैसे कहानियां आती कहाँ से हैं? लेकिन जब अपने घर और परिवार के करीब घटती है तो लिखना अधिक मुश्किल होता है. फिर भी कलम जब मुझे नहीं छोड़ती है तो फिर रिश्तों का लिहाज कर करेगी.



21. उड़न तश्तरी ...
उड़न तश्तरी ....ब्लॉग पर समीर जी लाये हैं अपनी एक भाव विह्वल कर देने वाली  पोस्ट सात समुंदर पार आती गली....
मेरे लिए वो गली मेरे घर से शुरु होती है. वहीं मैं पैदा हुआ और होश संभाला. वो गली आकर बाजार में जुड़ती और फिर बाजार की सड़क से होती हुई राजमार्ग पर और फिर सीधे शहर में. शहर मुझे विदेश ले आया उस गली से शुरु होकर. वो गली मेरे लिए विदेश तक आती है. लौट लौट कर मैं उस तक जाता हूँ. कभी सच में मगर रोज - यादों में, सपनों में....



22. * क्या है मेरा नाम * ये एक सच बयान करता लेख पढ़े साधना वैद जी का..
दादी – घर में तो सब पगलिया पगलिया कहत रहे ! छोट भाई बहन जीजी जीजी कहके बुलात रहे ! सादी के बाद ससुराल में अम्माजी बाऊजी दुल्हन कह के बुलात रहे ! मोकूँ कबहूँ मेरो नाम से काऊ ने ना बुलायो ! तो मोए तो पतो ही नईं है ! ना जाने का नाम रखो हतो बाउजी ने



23.  मेरे ब्लाग के आदरणीय पाठकों से एक विनम्र अनुरोध -सतीश सक्सेना 
जी कर रहे हैं...वे नफ़रत बांटे इस जग में हम प्यार लुटाने बैठे हैं ...मेरा प्रमुख उद्देश्य है ! और यहाँ छपे प्यार के लेख दिखावटी नहीं बल्कि दिल से निकले हैं !किसी व्यक्ति , धर्म अथवा पार्टी का नाम लेकर, अपमान करने के उद्देश्य से कहे कमेन्ट यहाँ नहीं छापे जायेंगे ! कुछ लोगों का यह मानना है कि विरोध की आवाज सहन करने की हिम्मत नहीं है वे इसे शौक से मेरी कायरता मान लें इसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं है .....



24. मोहब्बत के शे'र लाइए और जीतिए नगद पुरस्कार .
आगे की जानकारी के लिए अलबेला खत्री जी के ब्लॉग पर पढ़िए...
प्यारे मित्रो !
आज से हम एक खेल शुरू कर रहे हैं । इस खेल में आप खुल कर भाग
लीजिये तथा वाह वाही के साथ साथ पॉइंट्स के आधार पर नगद
पुरस्कार भी अपने नाम कीजिये ।


25. पैरेंट्स की प्यार भरी सुरक्षा किसी पेड़ जैसी हो या शामियाने जैसी ? ये लेख है ब्लॉग

अपनी, उनकी, सबकी बातें की रश्मि रविजा जी का..

क्या पैरेंट्स का साया एक पेड़ की तरह  होना चाहिए जिसके पत्तों से छन हवा, धूप, बारिश, आंधी, तूफ़ान भी बच्चों को प्रभावित करता रहें या फिर एक मजबूत शामियाने की तरह जो उन्हें हर तूफ़ान, धूप, बारिश, आंधी से महफूज़  रखे....


26. और अंत में पढ़िए ये लेख भक्तिकाल की राजनैतिक व 
सामाजिक परिस्थितियाँ मनोज भारती जी का  बूंद-बूंद इतिहास ब्लॉग पर...
इस काल में हिंदु समाज की स्थिति अत्यंत शोचनीय थी । यह असहाय, दरिद्रता और अत्याचार की भट्टी में झुलस रहा था । स्वार्थवश या बलात्कार के कारण हिंदू मुस्लिम धर्म स्वीकार कर रहे थे । हिंदू कन्याओं का यवनों से बलात विवाह का क्रम चल रहा था । दास प्रथा भी प्रचलित थी । संपन्न मुसलमान हिंदू कन्याओं को क्रय कर रहे थे । कुलीन नारियों का अपहरण कराके अमीर लोग अपना मनोरंजन किया करते थे ।



नमस्कार
अनामिका

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