चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

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Saturday, October 23, 2010

चर्चा मंच-316 पर एकल चर्चा


आज शनिवार को एक अंतराल के बाद आप सबके लिए फिर से चर्चा लेकर हाज़िर हूँ. जैसी चर्चा आज मैं करना चाहता हूँ उसकी मांग एक लम्बे समय से कुछ पाठक करते आ रहे हैं, यानी एकल चर्चा.. किसी एक ही रचनाकार की विभिन्न पोस्टों की चर्चा एक जगह पर, उसकी खूबियों और खामियों का विश्लेषण.. लोगों को बताना कि उस चिट्ठे पर जाएँ तो जाएँ क्यों. काफी हद तक उनका भी कहना गलत नहीं कि चर्चा मंच में कभी कभार एकल चर्चा द्वारा सिर्फ एक चिट्ठाकार की विभिन्न पोस्टों की चर्चा हो जिससे कि लोगों को पता चल सके कि अपने लेखन के द्वारा कोई चिट्ठाकार कैसे हिन्दी चिट्ठाजगत को अपना योगदान दे रहा है. यहाँ पर आज मैं आज ऐसे चिट्ठाकार से आपका परिचय कराना चाहता हूँ जिसके लेखन में मुझे कुछ खूबी नज़र आयी(वैसे आपमें से कई उन्हें पहले से ही जानते होंगे)..
बेहतर होगा कि पहले उस शायरी, कविताई, नज़्मकारी के हुनरमंद के हुनर को पहले देख लिया जाए..प्रतिभा के दर्शन पहले कर लीजिये प्रतिभावान का नाम तो चलते-चलते आपको बता ही दिया जाएगा..
तो शुरुआत करते हैं उनकी त्रिवेणी से-

१-
आपकी आमद से राहें खुल गईं
बादलों से जैसे चमके रौशनी

ज़हन में कब से जमी थी मायूसी।

2.
आप से मिल के मेरा हाल ऐसा होता है
ज्यूँ समंदर में दिखे अक्स-ए-माह-ए-दोशीजा

दो-दो चेहरे लिए फिरती हूँ महीनों मैं भी।

3.
मेरे चेहरे पे शिकन पढ़ लेती हैं
आँखों में आई थकन पढ़ लेती हैं
बड़ी ही तेज़ तर्रार हैं, आँखें उसकी।

4.
बड़ी अना में कह गए थे वो जाते-जाते
अबकि उठे तो ना लौटेंगे तेरे दर पे सनम
लौट कर आए तो कहने लगे 'दिल भूल गए थे'।
5.
तेरी याद का एक लम्हा पिया
साँस आने लगी, जीना आसाँ हुआ
दमे की बीमारी है ज़िन्दगी गोया।

6.
तुम्हारी आँखों से गुज़रते हुए डर लगता है,
जगह-जगह है भरा पानी, और फिसलन है
ना जाने कब से मानसून ठहरा है यहाँ

अब एक ग़ज़ल के कुछ शेर-

दर्द ए दिल की दवा दीजिये
अपनी सूरत दिखा दीजिये..
ज़िन्दगी थक के सोने लगी
अब तो सूरज बुझा दीजिये..
धडकनों में बहुत शोर है
लब से ऊँगली छुआ दीजिये..

नींद से तो खफा हम नहीं
ख्वाब लेकिन नया दीजिये
.
----
अभी कविता में वो बात नहीं दिखाई देती जो उनकी और रचनाओं में है.. लेकिन कहते हैं ना कि 'ये लिखने की विद्या है बस लिखते-लिखते आती है.. सो वो भी आ जायेगी' पर भाव पक्ष तो मजबूत है ही-
बस में आते जाते
खुली खिडकी पे बैठे
धूल के उड़ते गुब्बारों को देखते
चिल्लाते लोग
दौड़ते भागते लोग
भीगे बिखरे लोगों को देखते हुए
कई बार सोचा
मैं तुम्हे भूल क्यूँ नहीं सकता ??..
कितना कुछ है दुनिया में
इन लोगो को ही देखो
ये लोग कितने व्यस्त हैं
व्यस्त तो मैं भी हूँ
पर तुम्हे याद करने में...
कभी कभी दिख ही जाती हो
तुम
बस की खिडकी से
झाँकती हुई
बोतल से
पानी पीती हुई..
भाग कर चढ़ता हूँ बस में
तो तुम नहीं होती
टिकट लेता हूँ
और अगले स्टॉप पे
उतर जाता हूँ
कि
मेरे पागलपन का
कोई साक्षी न हो..
टूटी फूटी
कविताएँ लिखता हूँ
और मोड कर गुल्लक में डाल देता हूँ
तुम्ही कहती थी
मेरी कविताएँ बहुत कीमती हैं
एक दिन
सबको बेच डालूंगा
और जहर खरीदूंगा
तुम्हारे
हर ख्याल
हर एहसास को
पिला दूँगा,
थोडा सा बच गया अगर
तो अपने बेचारे
भोले से
मासूम
मन को भी पिला दूँगा
जो तुम्हे भूल नहीं सकता...!!

आज के समय में प्रयोगधर्मी होना जरूरी हो गया है वर्ना आप साहित्य के पुराने ढर्रे पर चलते रहे तो ना ही नवीनता मिलेगी और ना ही लेखन में विविधतता आयेगी.. ऐसा ही एक प्रयोग देखिये-
कैसी हो तुम आठ आने की चार गोलियों जैसी
मीठी हो तो गुड के जैसी, खट्टी नीम्बू जैसी
तुमसे मिलके जीने में एक Taste आ जाता है
बेसुवाद है जीवन मेरा, तुम अमचूर के जैसी

हंसती हो तो मोती बिखरे, चांदी वर्क चढ़े से
ज़ुल्फ़ से आती है खुशबू मोगरे फूलों जैसी

कई बार सिर्फ एक प्रेमी-प्रेमिका के मन में पनपने वाले भाव.. खासकर वो भाव जिनमे वो अपने घर बसाने और उनमें खुशियों के तिनकों से सजाने की सोचते हैं भी नज़र आते हैं, उदाहरण के लिए देखिये उनकी एक नज़्म-

आओ हम सांझा कर लें कुछ मीठे सपने
सपने जिनमें तुम हो, मैं हूँ
और चमकती इक उम्मीद हो
आँखों की कोरों पे
पलकों से बहते सागर में
डूब के उभरें
आओ हम सांझा कर लें कुछ मीठे सपने..

आओ हम देखें कुछ खाब हंसी खुशी के
तुम दफ्तर से लौट के आओ
मैं मुस्का के बाहें खोलूं
दरवाज़े के भीतर आकर
तुम मुझको बाहों में ले लो
काम करूँ मैं, तुम मुझको पीछे से छेड़ो
गाल कभी, कभी गर्दन और बालों को चूमो
आओ हम देखें कुछ खाब
हंसी खुशी के..
आओ चुन लें
नींद के बिस्तर से
गीली सी महकी साँसें
आँख में भर लें आँखें
होठों पर साँसें रख दें
चाँद चुरा कर
तुम मेरे माथे पे रख दो
माँग में भर दो लाखों तारे
हाथ पकड़ कर
सूरज के फेरे हम ले लें
सात जनम में
साथ खुशी का वादा कर लें
रखें हाथ गगन पे
कसमें खाएँ प्यार की
इस दुनिया को आओ मोहब्बत हम सिखला दें..!
अभी ना जाओ छोड़ के कि दिल अभी भरा नहीं जैसा कुछ कहने की कोशिश है इन पंक्तियों में-
बैठो न मेरे पास अभी और दो घडी
घटती नहीं जो आरजूएं घट भी जाएँगी
मिटता नहीं जो दर्द ज़रा मिट भी जाएगा
कुछ देर मेरा हाथ थामे साथ तो रहो
बैठो न मेरे पास अभी और दो घडी..
कुछ और खूबसूरत पंक्तियाँ-
डूबे हैं अगर आँख तक
क्यूँ उबरें
यादें ही तो हैं
इनमें दम नहीं घुटता
आती है इनसे
सौंधी महक
जैसे बरसा हो पानी
सूखी मट्टी पर
सीली हों सभी यादें
ज़रूरी तो नहीं
कुछ जो प्यासी हैं
आओ उनके चेहरे पे
ज़रा आँसू छिड़क दें
फिर खोलें वो दिसम्बर की
ठिठुरती सर्दी
और चल पड़ें
द्वारका* के खाली रास्तों पर
थामे हुए ठंडे हाथ
रात के चुलबुले लम्हे
और 10 बजे का डर
उफ़...घर भी तो जाना है..

अक्सर ही खूबसूरत बिम्ब मिल जाते हैं यहाँ-
उदास रहने का चलन है
जिधर देखो वहीँ आसूं
अब किस्मत में नहीं आई ख़ुशी
तो क्या करें
तुम जो आओगे
तो ध्यान रखना
लेके आना साथ में
किलो दो किलो ख़ुशी..

उनकी इस ग़ज़ल के चंद अशआर देखिएगा-
कोई ना आया अबकी बारहा बुलाने से
गो अब की हो गए हैं लोग कुछ सयाने से
हमसे मत पूछ दर्द क्या है हमने देखा है
किस तरह दोस्त भी हो जाते हैं ज़माने से
उतार फेंके तेरे ख्वाब आँखों से लेकिन
निकालें कैसे तुझे रूह के तहखाने से...!!

इतना पढ़ने के बाद लगा कि इश्क़ से बाहर कलम नहीं निकली आपकी लेकिन तभी कुछ शेरों ने आकार कान में फुसफुसाया-
ज़रा लफ्जों के कारोबार में चौकन्ना हो जा दोस्त
तेरी हर बात में दीवानगी की खुशबू आती है.. !
मैं जब कभी देखता हूँ ये सियासत ज़ुल्म ओ सितम की
खुदा की बेबसी से आदमी की खुशबू आती है..

सोचा कि उनकी इस तरही ग़ज़ल के कुछ ख़ास शेर ही यहाँ रखूँ... पर मजबूर था कि किसी भी शेर ने आम होने से इंकार कर दिया-

नहीं है दर्द तो फिर कोई आरज़ू कर दे
किसी का नाम ले और आँख को लहू कर दे..

बड़े दीवाने हुए तेरे शहर मे जाना
ज़रा स तल्ख़ ये अंदाज़े गुफ्तुगू कर दे..

नहीं है उसके सिवा कोई भी तलब मुमकिन
हरेक शे को खुदा उसका हू ब हू कर दे..
जो लब खुले तो मोहब्बत की मीठी बातें हो
नज़र मिले तो निगाहों को बा वज़ू कर दे..
उसी को देखूं उसे सोचूं मैं जिसे चाहूँ
मेरे खुदा तू वो ही शक्ल चारसू कर दे...
ले आब ख़त्म हुआ सिलसिला भी माजी का
मसर्रतों का सफ़र अब कोई शुरू कर दे..


विदाई के वक़्त ये सोच कर किस सौभाग्यकान्क्षिणी का दिल ना बैठने लगेगा, ये पढ़ कौन ना रो दे भला -
सोचा नहीं था
यूँ छोड़ के जाना होगा
अपने गलियारों से
मुंह मोड़ के जाना होगा
याद कर अपने बचपन के
दिन उछल जाती हूँ
बारिशों की बूंदों से
अब तक मचल जाती हूँ
मेरे बचपन के साथियो
मेरे खिलौनों बताओ
मैं तुमसे दूर कैसे जाऊँ
कोई तो रास्ता सुझाओ...
घर का आँगन अभी भी
दामन थामे खडा है
मैं मुड के देख कर उसे
बिलख बिलख के रो रही हूँ
इसी आँगन में खेलती थी कभी
आज इसी से पराई हुई जाती हूँ॥

यहाँ आइये तो प्रतीकों की बानगी देखिये ज़रा-
अम्बर कुछ सीला लगता है,
रोया है? पीला लगता है..

उसने यादों के ज़ख्मों को,
शायद फिर छीला, लगता है..

आँखों में अश्कों का मोती,
कुछ तो चमकीला, लगता है..

देखो गिर के टूटे ना वो,
चन्दा जो ढीला लगता है..

इसके बारे में क्या ख्याल है-
मैं नहीं इश्क के काबिल तू मुझसे प्यार ना कर
मान ले बात मेरी वक़्त यूँ बेकार ना कर
मेरी जुम्बिश मेरी येः शक्ल भी उधार की है
येः रंग ओ नूर अमानत मेरे बाज़ार की है

बारिश के लिए आपकी दुआ है कि-
धरती के चेहरे पर अब तो
छींटा दे दे रब्बा
दर्द प्यास का थम जाए
जल मीठा दे दे रब्बा.. !
अब तो नयनों से ममता का
नीर बहा दे रब्बा
अपने बच्चों पर बादल से
जल बरसा दे रब्बा... !

तकलीफ के आँसू पीती सी ये पंक्तियाँ भी खूब लगीं मुझे.. जाने आपको कैसी लगें-
ये मेरी ज़िन्दगी क्या से क्या हो गई
देखते देखते हादसा हो गई...
मुस्कुराई थी मैं तो तिरी याद में
लोग कहते हैं मैं बेवफा हो गई..

एक और
मेरी तस्वीर के टुकड़े उठा क्यूँ नही लेता?
अगर है इश्क़ मुझसे तो बता क्यूँ नही देता??

बस ऐसे ही मसखरी सूझी मुझे-
यूंतो लिए घूमता है पासपोर्ट अपने हाथों में
जो शौक़ है मिलने का तो वीजा क्यूं नहीं लेता??

ऐसा नहीं कि सिर्फ नज्में, ग़ज़लें ही हैं... अरे कहानी भी है भाई-
"Thankyou bhaiya", keep the change.. कह के मैंने टैक्सी से अपना छोटा सा suitcase निकला, सामने grey colour से रंगी दीवारें आपस में यूँ जुडी थी जैसे पक्के दोस्त जो एक दुसरे से हमेशा किसी न किसी तरह जुड़े होते हैं, साथ में जुडा था maroon रंग एक छोटा सा दरवाजा.... चार छोटी छोटी सीढियां...मैंने अपनी jeans की pocket से चाबी निकाली, दरवाजा खोला...खट से करके दरवाजा खुला, अपना suitcase अंदर रख मेरे दिल से निकल कर जुबान पे आया, "लो जी मैडम, यह है आपका नया घर".....घर या मकान??? कहते हैं चार दीवारों से जुड़े मकान को उसमे रहने वाला घर बनता है, फिर एक दिन वही घर बनाने वाला उसे छोड़ के चला जाता है, उस मकान की कई यादें ले कर.. और उस घर को फिर से मकान बना कर....Detective होने की सबसे बड़ी सजा यही होती है शायद, खानाबदोश की तरह कभी इस शहर कभी उस शहर...6 साल की नौकरी में 3 घर बदल चुकी हूँ अब तक.. यह तीसरा घर, जाने कितनी यादें बटोर कर लायी हूँ पिछले घर से, जाने कितनी ले जाउंगी यहाँ से... हर बार एक नए मकान को घर बनाओ, सजाओ सवारों, फिर एक दिन अपना सामान समेटो और चलो एक नयी मंजिल की और...ओह..! सामान से याद आया, मेरा सामान अभी तक नहीं आया... फ़ोन मिलकर पूछा तो पता चला की सामान आने में अभी कुछ और वक़्त लगेगा, तब तक क्यूँ न मैं घर की सफाई ही कर लूँ...
पूरी पढ़नी है तो उनके ब्लॉग पर जाइए भाई.. बड़े आये सब यहीं देखना चाहते हैं.. :p

हाँ तो अब आपको नाम भी बता ही देते हैं सरकार... ये हैं मासूम लम्हे वाली दिपाली सांगवान 'आब' जी
देखिये जनाब मेरा फ़र्ज़ था बताना सो मैंने बता दिया.. अब अगर आपकी शेर-ओ-शायरी में रूचि हो और इस ब्लॉग में कुछ अपना सा लगे तो लगाइए ना इसे ब्लोगरोल में.. :)
मिलते हैं बाद में

नमस्कार

आपका-
दीपक 'मशाल'
सभी चित्र(आखिरी को छोड़कर)- अपने कैमरे की कृपा से साभार.. :)


22 comments:

  1. बहुत बढ़िया रही आज की एकल चर्चा!
    --
    दीपक की मशाल में दीपाली की चर्चा तो जगमगा उठी!

    ReplyDelete
  2. दीपक मशाल जी पोस्ट को सुधार कर दोबारा लगाते रहे और बहन संगीता स्वरूप का यह कमेंट भी धराशायी हो गया!
    --
    संगीता स्वरुप ( गीत ) has left a new comment on your post "चर्चा मंच पर एकल चर्चा":

    आज की एकल चर्चा बेहतरीन रही ..दीपाली "आब" को खूब पढ़ा है , और उनका लिखा बहुत पसंद किया है..

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  3. 6/10

    उत्कृष्ट चयन - सुन्दर चर्चा
    देखा जाए तो असल 'चिटठा चर्चा' यही है,
    बाकी सब तो 'चिट्ठे चर्चा' है.
    दिनोंदिन चर्चा का स्वरुप, चयन और स्तर बदलता दिख रहा है. अत्यंत शुभ संकेत है. कुछ ऐसा हो कि चिटठा चर्चा में शामिल होना हर एक की अनिवार्यता सी बन जाए.
    मुफ्त मशवरा : चिटठा चर्चा में तड़क-भड़क - डेकोरेशन की जरूरत नहीं. 'जस्ट सिंपल एंड सोबर'

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  4. अच्छे लिनक्स के लिए आभार .... अच्छी चर्चा

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  5. कविताएँ बहुत भावपूर्ण लगीं |बधाई
    चर्चा का यह रूप नया है पर इसमें बहुत उच्च कोटि के लोगों को ही अवसर मिल पायेगा |जो पहले से ही नामवर हें उनको पढ़ने का अवसर तो मिलेगा पर नए लेखकों का अवसर मारा जाएगा |
    आशा

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  6. deepak ji ko shukriya,
    aur sabhi pathakon ko shukriya, meri rachnayein pasand krne ke liye.
    Pichi baar mujhe, kisi aur se, shikayat thi ki mere chitte par blog ka link aur naam nhi tha.. Aapne sari shikayatein door kr di. Shukria

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  7. दीपक जी, आपका ये प्रयास सराहनीय है, जिसमें एक बेहतरीन रचनाकार से रूबरू कराया गया है.

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  8. निखिल आनंद गिरिOctober 23, 2010 at 10:59 AM

    दीपाली जी अपनी गज़लें गाती भी हैं....ये जानकारी मैं जोड़ दे रहा हूं....बाक़ी अच्छी समीक्षा है...हमें तो पता ही है....

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  9. रोचक ढंग से पोस्ट को बाँधा है , आहा दीपाली जी तो कमाल का लिखती हैं , ग़ज़ल के साथ साथ कविता पर भी पूरा सवामित्व लगा मुझे , एक साथ इतनी खुराक मिल गई , धन्यवाद

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  10. अद्वितीय , मुझे तो ये ढंग बहुत पसंद आया !

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  11. बढ़िया चर्चा !!

    उस्ताद जी की सलाह काबिले गौर है !
    ....अभी भी ड्राफ्टिंग में घोर समस्याएं दिख रही हैं इस पोस्ट के साथ !
    शायद ब्लॉग का एच टी एम एल और सी एस एस ढांचा गड़बड़ा गया है !!

    यह किस्सा भी बेशर्म भारतीय राजनीति में निर्लज्जता का ही अध्याय है

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  12. दीपक
    आज की चर्चा कमाल की है…………।मैने तो पहले दीपाली जी को नही पढा मगर अब लगता है कि रह कैसे गया……………बेहद उत्कृष्ट लेखन ………सीधा दिल मे उतरने वाला………………ये अन्दाज़ बेहद पसन्द आया चर्चा का……………चलो इतने दिन बाद आये तो एक नये रंग के साथ ………………अच्छा लगा……………इसी तरह कुछ और नयी हस्तियों से परिचय करवाते रहना………………आभार्।

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  13. बहुत खूब दिपाली जी!...एक एक रचना, दिल को छू लेने वाली है!...बधाई दिपकजी... प्रस्तुति बेहतरिन है!

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  14. आज तक पढ़ा नहीं था इनको...
    आपका बहुत बहुत आभार इनकी कृतियों तक पहुँचाने के लिए...

    बहुत ही प्रभावित किया है इनकी लेखनी ने..

    और आपने भी बहुत सुन्दर ढंग से सजाकर इनकी रचनाओं को प्रस्तुत किया है..

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  15. ज़रा लफ्जों के कारोबार में चौकन्ना हो जा दोस्त
    तेरी हर बात में दीवानगी की खुशबू आती है.. !
    मैं जब कभी देखता हूँ ये सियासत ज़ुल्म ओ सितम की
    खुदा की बेबसी से आदमी की खुशबू आती है..

    क्या ग़जब की पंक्तियाँ हैं ? बधाई दीपालीजी को इतनी सुन्दर रचनाओं के लिए ! दूसरी बधाई दीपक मशालजी को इतने सुन्दर चयन के लिए !

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  16. deepali ji ki rachnaon se parichaya achchha laga.

    kunwar kusumesh
    Blog:kunwarkusumesh.blogspot.com

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  17. बढ़िया चर्चा !!

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  18. चर्चा का यह स्वरुप बहुत पसंद आया इस तरह पाठकों को एक रचनाकार के साथ साथ उसकी समग्र रचनात्मकता का परिचय भी मिल जाएगा और रचनाकार का ब्लॉग भी पाठकों की नज़र में आ जाएगा ! आपके इतने मौलिक विचार के लिये बहुत सारी बधाई एवं अभिनन्दन !

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  19. छा गए अब तो....और दीपाली जी से तो वहीं मिलती हूँ...

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"चर्चामंच - हिंदी चिट्ठों का सूत्रधार" पर

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