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Saturday, November 06, 2010

“प्रतीक्षा एक दिवाली की…!” (चर्चा मंच-329)

मित्रों!
दीपों का प्रकाश पर्व सदैव प्रकाशित रहने का सन्देश छोड़कर विदा हो गया है! आगामी 365 दिन हम सबके हृदय नव ऊर्जा से प्रकाशित रहें। इसी कामना के साथ आज का चर्चा मंच प्रस्तुत कर रहा हूँ।।
dangal diwali
ज्ञानचंद मर्मज्ञ-:-मैंने साल दर साल दीपक जलाया, कई बार जलकर भी दीपावली का वादा निभा नहीं पाया ! आज भी….. प्रतीक्षा एक दिवाली की
ख़ूब रौशन करें अपना घर लेकिन याद रखें कि दुनिया में करोड़ो घरों में अब भी अंधेरा है…अशिक्षा का, ग़रीबी का…करोड़ो आंखों में कोई सपना नहीं…रौशनी की तलाश में
हर साल, बैकुंठ चतुर्दशी पर .. ममता के लिए तरसती खाली गोद लिए मातृत्व की चाह में, महिलाए जिनकी गोद बर्षो से खाली है...और जो समाज में अज्ञानतावश कटु व्यंग का शिकार भी होती है... वो महिलाये इस मंदिर में सारी रात हाथ में जलता हुवा दिया ले कर ऐसे तटस्थ मौन खड़ी रहती है की मानो कोई मूरत हो ... क्या प्रभू इनकी इच्छाये पूरी करेगा.. पुनः बैकुंठ चतुर्दशी आने वाली है .. इनके साथ मैं भी प्रार्थनारत हूँ ... पर चाहूंगी की अच्छा चिकित्सीय परामर्श भी लें .. तदानुसार इलाज भी.."कैसा रहेगा
दीपावली को दीपों का पर्व कहा जाता है और इस दिन ऐश्वर्य की देवी माँ लक्ष्मी एवं विवेक के देवता व विध्नहर्ता भगवान गणेश की पूजा की जाती है।….दीपोत्सव और लक्ष्मी-गणेश की पूजा परंपरा
भाभी के कानों में झूम रही बालियाँ! दीपों से भरी-भरी थिरक रहीं थालियाँ! भाभी मुंडेरों पर दीपक सजाती हैं! दीवाली पर ढेरों ख़ुशियाँ ले आती हैं………मन के कोने में भी
चलो दीप एक ऐसा जलायें ..........ह्रदय के सभी तम मिट जाएँ लौ से लौ ऐसी जगाएं दीप माला नयी बन जाए कुछ तुम्हारे कुछ मेरे ख्वाब साकार हो जाएँ तेरे मेरे की छाया से….
तमसो मा ज्योतिर्गमय साल की सबसे अंधेरी रात में*दीप इक जलता हुआ बस हाथ मेंलेकर चलें करने धरा ज्योतिर्मयी बन्द कर खाते बुरी बातों के हम भूल कर के………..दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ!
दीपावली की बधाई--खूब बांटे खील पताशे और मिठाई -----
हम सभी भाग्यवान हैं...जो अंतरजाल जैसी सुविधा मिली है....मंगल दीप जले....!
कई दिनों से मन बनाए हूँ, कि दीवाली पर कुछ ज़रूर लिखूंगी. कम से कम एक संस्मरण का तो हक़ बनता है, छपने का , लेकिन........ धरी रह गई पूरी सोच, और लिखने की तैयारी…..एक बेमानी सी पोस्ट...
बर्फ की परतों के नीचे दबी होती है.. ज्यूँ पतझड़ में गिरी पत्तियां, वैसे ही मन की तहों में दबे होते हैं विचार.. कवितायेँ और अनेकानेक तथ्य;…..ये अब जाने कौन!
जागता सा कोई एक पहर ज़ारी है... - **** रात बीती और तमन्ना जागने लगी, ये दहर ज़ारी है क़यामत से कब हो सामना, सोच में वो क़हर ज़ारी है !
होली और दीवाली पर तो आते-जाते रहा करें कम से कम त्योहारों पर हम इक दूजे से मिला करें बारह महीनों में इक दिन आता है ये शुभ दिन हम आज तन के, मन के, धन के……..दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
पहले अंडा या मुर्गी , ये फैसला तो आज तक न हो सका है और न हो पाएगा , पर इसी तर्ज पर कुछ दिनों से एक महत्‍वपूर्ण विषय पर मैं चिंतन कर रही थी ,……….पहले जन्‍म या फिर भाग्‍य . . विश्‍लेषण के लिए कम से कम 100 अस्‍पतालों का आंकडा चाहिए !!
लहर लहर पहर पहर कशाकशी,खलबली जो कविता गुँथ रही वही कहीं बिखर गई 2 वो भाव जले सिके हुए गरम थे जब सील गए परोसती कैसे ? 3. तुम्हारी खुली आँखों के सपने मैने...वो कविता जो नहीं लिखी
*मैं वह दीपक नहीं , जो आँधियों में सिर झुका दे ।*** *मैं वह दीपक नहीं , जो खिलखिलाता घर जला दे ।* *मैं वह दीपक नहीं
* हर ओर एक गह्वर है एक खोह एक गुफा जहाँ घात लगाए बैठा है अंधकार का तेंदुआ खूंखार - * * * * * * * * * * * * *उजास*
चरागों से सीखें जलने का सबक़ दिलों के बुझने का भी तो सबब जानें ये जल तो लेते हैं एक दूसरे से अन्धेरा अपनी तली का न पहचानें परवाह करते हैं सिर्फ………मनों अँधेरा खदेड़ते नन्हें से चिराग
तारों से दमकता आकाश , दीपावली की रात , ओर सतत टिमटिमाते , माटी के दीपक , घर रौशनी से चमकने लगे , मंद हवा के स्पर्श से , दिए भी धीरे धीरे , बहकने लगे……ओर तुलना कैसी
अंधेरों में कुछ रोशनी की बात तुम करो नजर और दामन बचा कर चलने की बात करो भाषा भी है ,शब्द भी है पास कलम के हमारे भावों में डुबो कर सही तस्वीर तुम करो………
कुसुम कुसुम से कुसुमित सुमन से तेरे मेरे मधुरिम पल से अधरों की भाषा बोल रहे हैं दिलों के बंधन खोल रहे हैं लम्हों को अब हम जोड़ रहे हैं भावों को अब हम तोल रहे….
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय",
शमशेर बहादुर सिंह, बाबा नागार्जुन,
केदार नाथ अग्रवाल और फैज़ अहमद “फैज़” की
“परिचर्चा”
अपने मन में इक दिया नन्हा जलाना ज्ञान का।
उर से सारा तम हटाना, आज सब अज्ञान का।।
आप खुशियों से धरा को जगमगाएँ!
दीप-उत्सव पर बहुत शुभ-कामनाएँ!!

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