समर्थक

Monday, May 31, 2010

"कुछ तो लोग कहेंगे ......" (चर्चा मंच-169)

चर्चाकारा -----------वऩ्दना गुप्ता
बिखरे मोती
कुछ तो लोग कहेंगे ..... - ओढ़ रखी थी जब तक खामोशी लोग तब पर्त- दर - पर्त कुरेदा करते थे .... आज जब खामोशी ने तोड़ दिए हैं मौन के घुँघरू लोग अब उसे...
रिश्ते भी देह बदलते हैं...
ओम आर्य at मौन के खाली घर में... ओम आर्य -
*घर लौटता हूँ तो तुम्हारी यादें, उसकी बाहों में खो जाती है वैसे तो मुझे याद है कि नहीं रहती इस शहर में अब तुम पर फिर भी धडकनों को न जाने क्या शौक है रुक जाने का अचानक से और दिल भी बहाने बना लेता है कि तुम ज...
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
posted by knkayastha@gmail.com (knkayastha) at नशा सा चढ़ा है... - 12 hours ago
posted by दिलीप at दिल की कलम से...
‘‘अच्छा साहित्यकार बनने से पहले अच्छा व्यक्ति बनना बहुत जरूरी है’’-बाबा नागार्जुन। (डा. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)

posted by डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक at मयंक
एक हरा पत्ता बैठा था कोमलसी शाख पर , एक बूंद गिरी उस पर , वो कुम्हला गया , वो सुख गया , क्यों ? वो बूंद मेरे अश्ककी थी , जब वादा करके भी तुम ना आये ....
posted by प्रीति टेलर at जिंदगी : जियो हर पल -
जा उद्धो जा... मत कर जिरह..
Author: अनामिका की सदाये...... | Source: अनामिका की सदाये...
हे उद्धो ... मत जिरह करो उस छलिया की जिसने भ्रमर रूप रख हम संग प्रीत बढाई और अब हमारी हर रात पर पत्थर फैंक कर जाता है ... मन को जख्मी करता है .. हमारे अंतस पर उसी का पहरा है.
तुम हमारी पोल मत खोलो...हम तुम्हारी नही खोलेगें....
Author: परमजीत सिँह बाली | Source: इंकलाब
जब से सुना है कि बाबरी मस्जिद के दोषीयों को राहत दे दी गई है.....मन मे अजीब सी हलचल मची हुई है.....सोचता हूँ... कही सब पार्टियां इस नीति पर तो नही चल रही कि तुम हमारे दोष मत देखो ......फिर हम तुम्हारे दोष भी नही देखेगें।तुम गोधरा के लिए बवाल मत मचाना हम ८४ के दंगे पर चुप्पी साध कर बैठे रहेगें।अफ्ज़ल को फाँसी की बात ज्यादा जोर दे कर नही उठाएगें...।आज जो नकसलवाद सिर उठाए हँस रहा है.....इसे शुरू होते ही ना दबाने के क्या कारण हैं ?.......यह सब भी ठीक वैसे ही चल रहा है जैसे कभी पंजाब में चल रहा थ ..
मनोज
काव्य शास्त्र-१६ :: आचार्य मम्मट - *आचार्य मम्मट* *- आचार्य परशुराम राय* भारतीय काव्यशास्त्र में आचार्य मम्मट का योगदान अद्वितीय है। इन्हें विद्वत्समाज 'वाग्देवतावतार' मानता है। इनका काल ...
काव्य मंजूषा
जाईये आप कहाँ जायेंगे...ये नज़र लौट के फिर आएगी...
- आजकल गानों से ही काम चलाइये.... इनदिनों इतनी ज्यादा व्यस्त हूँ कि ये भी नहीं बता सकूँगी कि कितनी व्यस्त हूँ ...
कमेन्ट भी नहीं कर पा रही हूँ,
आपलोग प्लीज बु...
किस्सा-कहानी
मेरी पसंद.... - मेरे हमराह मेरा साया है और तुम कह रहे हो, तन्हा हूँ मैं ने सिर्फ एक सच कहा लेकिन यूं लगा जैसे इक तमाशा हूँ ****************************** आंधी से टूट जाने..
ना चाहूँ इस कदर.........
Author: Shekhar Kumawat | Source: काव्य 'वाणी'
ना दिखा पाउँगा दर्द- ए- दिल किसी को | ना सुना पाउँगा जज्बात-ए-जिगर किसी को |
विकसित होता भारत देखो !
Author: पी.सी.गोदियाल | Source: अंधड़ !
अटल, सोनिया, एपीजे, मनमोहन और प्रतिभा-रत देखो, लालू, मुलायम, ममता , येचुरी, प्रकाश-वृंदा कारत देखो ! संतरी देखो, मंत्री देखो, अफसर, प्रशासक सेवारत देखो, आओ दिखाएँ तुमको अपना,विकसित होता भारत देखो !!
देशनामा
एक सवाल का जवाब दीजिए...खुशदीप - देश में भारी बहस छिड़ी है...आतंकवाद को पीछे छोड़ते हुए माओवाद देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है...लेकिन हमारी सरकार तय ही नहीं कर पा ...

SPANDAN
हिंगलिश रिश्ते - रिश्तों का बाजार गरम है पर उनका अहसास नरम है हर रिश्ते का दाम अलग है हर तरह का माल उपलब्ध है कभी हाईट तो कभी रूप कम है जहाँ पिता की इनकम कम है सा...
भारत-ब्रिगेड
मुक्तिका: .....डरे रहे. --संजीव 'सलिल' - मुक्तिका .....डरे रहे. संजीव 'सलिल' * हम डरे-डरे रहे. तुम डरे-डरे रहे. दूरियों को दूर कर निडर हुए, खरे रहे. हौसलों के वृक्ष पा लगन-जल हरे रहे. रिक्त हुए जो..
ताऊजी डॉट कॉम
प्रिय ब्लागर मित्रगणों,
आज वैशाखनंदन सम्मान प्रतियोगिता में
श्री विनोद कुमार पांडेय की रचना पढिये.
लेखक परिचय :- नाम-विनोद कुमार पांडेय जन्मस्थान: वाराणसी ...
सरस पायस

आओ, नाचें ता-ता-थइया : श्याम सखा श्याम का बालगीत -
आओ, नाचें ता-ता-थइया!
बादल भइया, बादल भइया,
आओ, नाचें ता-ता-थइया!
बंद पड़ी दादुर की टर-टर,
बहे पसीना झर-झर-झर-झर!
बछिया ढूँढ रही है मइया!
बादल भइया, बादल ...
मसि-कागद

छमिया(लघुकथा)---------------------->>>दीपक 'मशाल' - नए शहर में पहले दिन बाज़ार से कुछ खरीदने गई थी रमा.... कि तेज धूप में अचानक सड़क पर गिरते उस लड़के को देख वो भी अपनी स्कूटी ले उसकी तरफ बढ़ गई. १०-१२ लोग ...
दोस्तों!
अभी तबियत पूरी तरह ठीक नही है!
इसलिए "चर्चा मंच" में चर्चा करने के
नाम पर केवल औपचारिकता ही निभा रही हूँ!
अन्त में यह कार्टूनिस्ट की कलम से निकली
यह पोस्ट भी देख लीजिए-

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून

[image6.png]संयुक्त अरब अमीरात भारत से साढ़े तीन घंटे की हवाई दूरी पर है, लगभग इतनी ही देर में सीधी हवाई सेवा से दिल्ली व त्रिवेंद्रम की दूरी तय की जा स..

-0-0-0-0-0-0-0-

अरे वाह! यह कार्टून कितना बढ़िया है?


--------------------------------------------------------------------------------------------------------


Sunday, May 30, 2010

रविवासरीय चर्चा (चर्चा मंच-168)

आज मुझे प्रातःकल ही चर्चा लगानी थी 
परन्तु मैं किसी आवश्यक कार्य से 
अपने गाँव चला गया था!
इसलिए मैं मनोज कुमार आज की 
सांध्यकालीन चर्चा आपकी सेवा में 
प्रस्तुत कर रहा हूँ!
My Photoअनिल पुसादकर जी कहते हैं
बहुत दिनो बाद मीनाबाज़ार का नाम सुना। आजकल ये सुनाई ही नही आता।उसकी जगह ले ली है फ़न वर्ल्ड, फ़न पार्क, फ़न गेम्स, फ़न फ़ेयर और जाने क्या-कया। आधुनिकतम झूलों और तकनीक के सामने परंपरागत मीनाबाज़ार शायद गुम हो रहे हैं। खैर मीनाबाज़ार का नाम सुनते ही मौत की छलांग भी याद आ गई।
ज़िंदगी के लिये मौत की छलांग! जी हां ये सच है और उस छलांग की कीमत भी कितनी? आप कल्पना भी नही कर सकते कि इंसान की ज़िंदगी इतनी सस्ती है। ज़िंदगी को दांव पर लगाने की क्या मज़बूरी होगी ये तो सवाल सामने है ही एक और सवाल सामने है क्या सच मे इंसान की ज़िंदगी इतनी सस्ती है?

बेचैन आत्मा प्रस्तुत करते हैं नव गीत जिस में शब्द है, प्रवाह है, अर्थ है, अर्थात सारे नियमों को पूरा करती हुई एक सम्पूर्ण कविता जो बहुत सुन्दर है और जिसमें शब्द और भाव का अच्छा संयोजन है।
My Photoरिश्तों के सब तार बह गए
हम नदिया की धार बह गए.
बहुत कठिन है नैया अपनी
धारा के विपरीत चलाना
अरे..! कहाँ संभव है प्यारे
बिन डूबे मोती पा जाना
मंजिल के लघु पथ कटान में
जीवन के सब सार बह गए.

२९ मई पत्रकारिता दिवस पर अरुणेश मिश्र की लाजवाब प्रस्तुति जो कम शब्दों में ...अच्छा सन्देश दे रही है ! इसे ही गागर में सागर कहते है .


आज हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर
मेरा फोटोअखरे जो बार बार
उसे अखबार
कहते हैं ।
सरके जो बार बार
उसे सरकार
कहते हैं ।
समाचारों को बेचकर
खरीद ले जो कार
उसे पत्रकार
कहते हैं ।

बहुत कुछ कह गए एम. वर्मा जी एक दस्तक तुम्हारे दरवाज़े के नाम कविता के माध्यम से। यह कविता हालात और उसके अंदरूनी द्वन्द को दिखा रही है। इस कविता की अभिव्यक्ति बहुत ही सहज है।
My Photo
भेजा था मैनें,
उस दिन एक दस्तक
तुम्हारे दरवाजे के नाम
और तुम्हारा दरवाजा
अनसुना कर गया था;
तभी तो
खुलने से मना कर गया था.
मुझे पता है
यह हौसला
दरवाजे का नहीं हो सकता
वह उन दिनों
तुम्हारे 'फैसले' की सोहबत में था.
- सुलभ जायसवालशुरू करो उपवास रे जोगी

Sulabh Jaiswalसुलभ § Sulabh

जब तक चले श्वास रे जोगी
रहना नज़र के पास रे जोगी
बंधाकर सबको आस रे जोगी 

कौन चला  बनवास रे जोगी
हर सूँ फ़र्ज़ से सुरभित रहे

घर दफ्तर न्यास रे जोगी
सदियों तक ना प्यास जगे

यूँ बुझाओ प्यास रे जोगी
एक खुशखबरी:-हिंदी ब्लॉग्गिंग को मिला 'परमाणु'



                                                                   शिवम् मिश्रा प्रस्तुत करते हैं  बुरा भला – 1पर और कहते हैं
जी हाँ, दोस्तों यह १००% सच है ...................हमारे और आपके बीच एक नए ब्लॉगर आ गए है ............ श्री शलभ शर्मा 'परमाणु' | मेरे काफी पुराने मित्र है और आज कल नॉएडा में रहते है |
आप के यहाँ भी बी.एस. एन. एल. है, भाई आप भी हिम्मती हैं.
                      
Gagan Sharma, Kuchh Alag sa पर बताते हैं
कुछ दिनों पहले सरकारी फोन 45 दिन तक कोमा में रहा था। डेस्क-डेस्क, केबिन-केबिन के यंत्रं पर पुकार लगायी पर वे भी तो अपने आकाओं से कम कहां है, सब मशीनी आवाज लिए बैठे होते हैं। सब को हिलाया, डुलाया, झिंझोड़ा पर …?
हिन्दी ब्लोगिंग में सघंठन क्यों ??? मिथिलेश दुबे

पूछ रहे हैं Mithilesh dubey  Dubey –पर और कहते हैं कि
अभी हाल ही में दिल्ली में इंटरनेशनल ब्लोगिंग सम्मेलन का सफल आयोजन किया गया , इसके लिए आयोजको को बहुत-बहुत बधाई । सम्मेलन में अधिक से अधिक ब्लोगरो ने पहुँच कर इस सम्मेलन को सफल बनाने में अपनी भूमिका अदा की ।
दोस्त.....................(कविता).................अनुराधा शेषाद्री

हिन्दी साहित्य मंच पर हिन्दी साहित्य मंच -                                                                                 
ऐ दोस्त तेरी दोस्ती का रिश्ता बहुत गहरा है                                                      न जाने किस उम्मीद पर दिल ठहरा है                                                             ऐ दोस्त यह रूह से रूह की गहराईयों का रिश्ता है                                                 जो रिश्तों से परे मोहब्बत की डोर से बंधा है                                                      ऐ दोस्त यह एक प्यारा सा मासूमियत का रिश्ता...
आईये आज आप को अपने गांव के अंदर घुमा लाये भाग अन्तिम

राज भाटिय़ा की प्रस्तुति पराया देश – पर
कल हम ने यही पर यह कडी छोडी थी, अभी हम यहां के कब्रिस्थान मै ही है, यह गांग के दुसरी ओर के कुछ घर है यह मुर्तियां एक पुरी दिवार जितनी है, शायद जब किसी को दफ़नाने आते हो तो यहां सब मिल कर कोई पुजा वगेरा करत...
यात्रा क्षेपक

पढिए इयत्ता – पर ह
रिशंकर राढ़ी की प्रस्तुति। मैं अपनी यात्रा जारी रखता किन्तु न जाने इस बार मेरा सोचा ठीक से चल नहीं रहा है। व्यवधान हैं कि चिपक कर बैठ गए हैं। खैर, मैं कोडाईकैनाल से मदुराई पहुँचूँ और आगे की यात्रा का अनुभव आपसे बांटू...
वेदांश...... की प्रस्तुति

दरख़्त

भीड़ में बैठा अक्सर देखा  करता हूँ ......
हाड़-मांस के कुछ दरख्तों को,
सूखे से,सीना ताने..
अपनों के बीच बेगाने से,
लहू कबका सूख चुका है,
बचे हैं सिर्फ कुछ..
निशां...
सुर्ख से,
क्या ये ???
साँस लेते होंगे....
हाँ ,दिल तो है,
पर धड़कन कहीं गम हो चुकी है,
स्याह,अँधेरी रात कि गहराईयों में ,
इन दरख्तों के वीरान जंगल से..
जो भी गुज़रता है,
वो तब्ब्दील हो जाता है
इन  दरख्तों में ...
मत करो टांग खिंचाई-होती है जग हंसाई

राजकुमार ग्वालानी की प्रस्तुति  राजतन्त्र – पर पढिए। वे कहते हैं
हम ब्लाग बिरादरी में पिछले एक साल से ज्यादा समय से देख रहे हैं कि यहां भी टांग खिंचाई हो रही है। ब्लाग जगत में टांग खिंचाई हो रही है तो उसके पीछे कारण यही है कि लोग एक-दूजे को भाई जैसा नहीं मानते हैं।
भय और सच
रश्मि प्रभा की प्रस्तुति  मेरी भावनायें... – पर                                  
सुबह आँखें मलते सूरज को देखते मैं सच को टटोलती हूँ ये मैं , मेरे बच्चे और मेरी ज़िन्दगी फिर एक लम्बी सांस लेती हूँ सारे सच अपनी जगह हैं अविश्वास नहीं एक अनजाना भय कहो इसे हाँ भय उन्हीं आँधियों का
ग्लोबेलाइजेशन विद ड्यू रिस्पेक्ट टू प्रिंसेज़ डायना...खुशदीप

खुशदीप सहगल की प्रस्तुति  देशनामा – पर
*ग्लोबेलाइज़ेशन या वैश्वीकरण क्या है...* पिछले दो दशक से हम ग्लोबेलाइज़ेशन की हवा देश में बहते देखते आ रहे हैं...लेकिन मुझे इसकी सही परिभाषा अब जाकर समझ आई है...वो भी *ब्रिटेन* की मरहूम *प्रिंसेज डायना कॊ।
धागा हूँ मैं

वन्दना की प्रस्तुति  ज़ख्म…जो फूलों ने दिये – पर                           
धागा हूँ मैं मुझे माला बना                                                                           प्रीत के मनके पिरो नेह की गाँठें लगा                                                            खुद को सुमरनी का मोती बना                                                                     मेरे किनारों को स्वयं से मिला                                                                      कुछ इस तरह धागे को माला बना                                                                  अस्तित्व धागे का माला बने                                                                      माला की सम्पूर्णता में
फ़रिश्ते

posted by 'उदय' at कडुवा सच - 1 day ago
आज पहली बार नया चेहरा साहब मत पूछो मां बीमार, भाई थाने में गरीब हूं, असहाय हूं मां मर न जाये भाई जेल में सड न जाये मैं अनाथ न हो जाऊं इसलिये यहां खडी हूं जब कुछ रहेगा ही नहीं तब इस जिस्म का क्या अचार डालूं..
आज के लिए बस इतना ही- 
अगले रविवार को कुछ और
ब्लाग्स की चर्चा लेकर 
आपकी सेवा में उपस्थित हो जाऊँगा!

Saturday, May 29, 2010

आमों का मौसम है आया ……… (चर्चा मंच -167)

नन्हे-मुन्ने, प्यारे-प्यारे!
इस दुनिया में सबसे न्यारे!
हम सब की आँखों के तारे!
ख़ुशबू के छोड़ें फव्वारे!
जिन्हें देख मन कहता गा रे!
जिनके मन में शक्करपारे!
जो हैं सबके राजदुलारे!
आँखों के सामने यदि बच्चों की गतिविधियाँ न हों,
तो मन तक सूना-सूना लगता है!
और यदि
हँसते-मुस्कराते-
खेलते-कूदते-गुनगुनाते-खिलखिलाते-
चहकते-महकते-शरमाते-सकुचाते-ठुमक-ठुमककर नाचते
और गा-गाकर ख़ुशियाँ मनाते बच्चे हमारी आँखों के सामने हों,
तो हमारी आँखों में तो ख़ुशियों की चमक बनी ही रहती है,
मन भी इनकी मधुर गुंजार से प्रफुल्लित रहता है!
-----------------------------------------------------------------

 
लीजिए मिलिए  माधव : दर्जी  से
  लाल टी शर्ट अच्छी है ना
मुझे सिलाई भी आती है

नन्हे-मुन्हे


पैसे

अनिल सवेरा जी की बाल कविता

बंदर बाबु पेंट पहन कर
पहुंच गये ससुराल.

अब ले चलते हैं रूद्र के स्कूल ..
……………………………………………………

rudra ka school

BAL SAJAG


पर सोनू कुमार की बाल कविता पढ़िए
कविता :कवि सम्मेलन

नन्हे सुमन पर
डा० रूपचन्द्र शास्त्री जी
लाए हैं
“आम रसीले मन को भाये”

IMG_1205

सरदी भागी, गरमी आई!
पेड़ों पर हरियाली छाई!!

इस पर आकांक्षा यादव बता रही हैं 

काला-पानी की कहानी




आज बस इतना ही….

Thursday, May 27, 2010

अथ ब्लागर जनगणना चालू आहे!!!(चर्चा मंच-166)

                            चर्चाकार---पं डी.के.शर्मा “वत्स”
एक आलसी का चिट्ठा पर अथ ब्लॉगर जनगणना चालू आहे!
गिरीजेश जी बता रहे हैं कि आज हमारे गाँव में जनगणना का प्रथम चक्र प्रारम्भ हुआ। नए प्रावधान के अनुसार हम 4 प्राणियों को फॉर्म 2 में प्रवेश दे सदा सदा के लिए हमारी जड़ काट दी गई। मुझे आज दुहरा दु:ख है --जड़ से कट जाने का कम और गाँव जवार में राजपूतों की संख्या में  4 की कमी का अधिक । मैंने यह पता लगाने को कहा है कि जो जनगणना करने आया था वह किस जाति का था (बहुत गहरा पेंच है इसमें,आप लोग समझ रहे होंगे)?
आगे वो लिखते है कि आज मुझे सूझा कि क्यों न ब्लॉगरों की भी जाति आधारित गणना की जाय ? अब सबसे पूछना ठीक नहीं (मुई अभी तक इस मामले में सीखी गई शरम नहीं गई जब कि मास्साब लोग गली मोहल्ले एकदम बेहिचक पूछे जा रहे हैं -का  हो ज्ञान चचा !तोहार जात का है?) । इसलिए अनुमान के आधार पर सूची लगा रहे हैं। जिन्हें आपत्ति हो वे अपनी आपत्ति टिप्पणियों के माध्यम से दर्ज करा सकते हैं।उनकी जाति 'बदल'मेरा मतलब 'सही' कर दी जाएगी
अन्त मे इस ब्लागर जनगणना का क्या परिणाम निकला..ये जानने के लिए आप चिट्ठे पर जाकर खुद ही पढ लीजिए……
image बैठे ठाले अनुराग मुस्कान जी अपनी दुखभरी दास्तान सुना रहे है कि अगर घर वालों नें रोका न होता तो आज नौ साल का करियर हो गया होता अपना बाबागीरी में।
भगवान तो भगवान,भगवान का गुणगान करने वालों की भी कम ऐश नहीं है। आपने कभी जिस महाराज का नाम तक नहीं सुना वो भी कथा बांचने के लिए एक साथ हज़ारों भक्तों को क्रूज़ पर ले जाते हैं। लंदन, पेरिस और न्यूयार्क की हवाई यात्राएं कराते हैं। कोई क्रूज़ पर कथा बांच रहा है तो कोई 50,000 हज़ार फीट की उचांई पर भजन कीर्तन कर रहा है। नारायण...नारायण। जो कभी किसी चैनल पर प्रवचन करते थे उन्होने वो चैनल ही खरीद मारे। जो कभी भगवान के वंदन के साथ इस फील्ड में उतरे थे, वो ख़ुद ही भगवान बन बैठे। परमपूज्यपाद हो गए, प्रातःस्मरणीय कहलाने लगे।आज बड़ा अफ़सोस होता है भाई। नौ साल का करियर हो गया होता अपना बाबागीरी में। मस्त लाइफ़ कट रही होती। और हां, धन-दौलत, ऐश-ओ-आराम और वैभव देखकर शायद मां को भी कोई शिकायत नहीं होती। वो नौ साल पहले भी मेरी मां थी और आज भी मेरी मां है। आस्था का प्रपोज़ल मान लिया होता तो वो भी सिर्फ मां ना रहती। अरे भाई गुरूमां हो गई होती। क्या ख़्याल है आपका...?
 
बहुत ज्यादा खर्चीली महिलाओं के लिए मृ्गेन्द्र पांडे जी बता रहे हैं पैसा बचाने के 10 तरीके 
ऐसे बहुत से लोग है जिनकी आमदनी अच्छी-खासी है, लेकिन उन्हे पता भी नहीं चलता और आश्चर्यजनक ढंग से उनका पैसा समाप्त हो जाता है, जबकि बहुत से काम और अगली आमदनी के कई दिन बाकी रहते हैं। यह सिर्फ आपकी जेब...ऐसे बहुत से लोग है जिनकी आमदनी अच्छी-खासी है, लेकिन उन्हे पता भी नहीं चलता और आश्चर्यजनक ढंग से उनका पैसा समाप्त हो जाता है, जबकि बहुत से काम और अगली आमदनी के कई दिन बाकी रहते हैं। यह सिर्फ आपकी जेब में छेद होने से ही नही,आपकी गलत आदतों का भी परिणाम होता है। जानिए बचत के कुछ टिप्स---
ब्लॉग जगत में काला बन्दर.
image सामूहिक पागलपन की स्थिति में लोग सामूहिक रूप से किसी भी काल्पनिक विचार या बात  को सच समझ लेते हैं और सही  बात को समझने के लिए अपनी सामान्य बुद्धि का प्रयोग भी नहीं करते. बात चाहे ख़ुशी की हो या गम की पर होती बड़ी मामूली सी है लेकिन  लोग उसे खींच खींच कर बहुत बड़ा बना देते हैं. कोई आदमी एक  बात कहता है,चाहे वो सच हो या झूठ,महत्वपूर्ण हो या मामूली सभी उसी पर पिल पड़ते हैं और बात का बतंगड़ बन जाता है. मैं जब से ब्लॉग जगत से जुड़ा हूँ, मैंने अक्सर ही यहाँ पर ब्लोग्गेर्स में ऐसे ही  सामूहिक पागलपन के दौरे  पड़ते देखे हैं…..
जय कुमार झा जी कितनी खरी बात कह रहे है कि अपने बच्चों को रतन टाटा और मुकेश अम्बानी बनाने के बजाय शहीद भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसा बनाने कि कोशिस कीजिये --------?
image आज पैसा बोलता है ,पैसा चुप रखता है ,पैसा किसी कि जान बचाता है ,पैसा किसी कि जान लेता है ,पैसा रिश्ते बनता और उखारता है ,पैसा मीडिया को सामाजिक सरोकार से दूर कर चुका है ,पैसा मंत्रियों को समाज व इंसानियत से दूर ले जाकर भ्रष्ट और अय्यास बना चुका है ,पैसा इंसानियत को अपने पैरों तले ह़र वक्त कुचल रहा है और यही नहीं पैसे कि भूख ने ना जाने किन किन गम्भीर सामाजिक पतन को जन्म दिया है / इन सब बातों के मद्दे नजर हम क्या कोई भी यह कह सकता है कि यह पैसों कि वे वजह भूख सिर्फ और सिर्फ हमें इंसान से हैवान ही बना सकती है / पैसों कि भूख ने ज्यादातर बच्चों को इंसानी उसूलों से दूर धकेल दिया है और बच्चे अपने माता पिता का आदर करने के वजाय उनकी हत्या कि सुपारी देने लगे हैं
ओर ये एक छोटी सी पोस्ट हमारी भी…लगता है ब्लागजगत अब समझौतावादी हो गया है....
imageमुझे लग रहा है कि अब इस ब्लागजगत में मठाधीशी, अनामी-बेनामी ब्लागर, तेरा धर्म-मेरा धर्म जैसी टपोरपंथी, अन्याय, वगैरह से लडने की शक्ति बिल्कुल ही चूक गई है, तभी तो कितने दिन हो गए ऎसी कोई धमाकेदार सी किसी को गरियाती हुई कोई पोस्ट नहीं दिखाई पडी. विश्वास नहीं हो रहा कि ये वही बीते कल वाला ब्लागजगत ही है या कि हम ही गलती से किसी ओर जगह चले आए हैं.

दूधवा लाईव पर बेजुबान प्राणी और इन्सान के बीच के रिश्ते को दर्शाती एक सच्ची घटना से परिचय करा रहे हैं—आशीष त्रिपाठी-- बेटा देकर जा रहा हूँ भाई….ख्याल रखना
image नफरत की दुनिया को छोड़कर प्यार की दुनिया में...खुश रहना मेरे यार। राजेश खन्ना अभिनीत फिल्म हाथी मेरे साथी का यह गीत लोगों को भुलाए नहीं भूलता। इन दिनों आप दुधवा में देख सकते हैं कि ऐसे रिश्ते केवल फिल्मों में ही नहीं होते। यह रिश्ते यथार्थ भी हैं। लखनउ चिड़ियाघर से दुधवा भेजे गए बुजुर्ग हाथी सुमित के साथ किशन का ऐसा प्यार भरा रिश्ता है। यह बिछोह की घड़ियां हैं। किशन एक-दो दिन में ही सुमित को छोड़कर दुधवा से चले जाएंगे। इन दिनों उनका दिल जार-जार रोता है। दिन में कई-कई बार वह सुमित को सहलाते हैं, पुचकारते हैं। सुमित भी उनके कंधे पर सूंड़ रख देता है;इन दिनों किशन का गमछा नम रहता है आंखों को पोछते-पोछते। दुधवा में सुमित की देखरेख का जिम्मा महावत अयूब को दिया गया है। रोज ही किशन अयूब से कहते हैं, अपना बेटा देकर तुम्हे जा रहा हूं....खयाल रखना।
image लज्जा के नीड़ में चपलता का बसेरा

 

 

अब टिकते नहीं फिसलते हैं

मुख पर जाकर मेरे दो दृग.


पहले रहती थी नीड़ बना
लज्जा, अब रहते चंचल मृग.

चुपचाप चहकती थी लज्जा
बाहर होती थी चहल-पहल. 

 

चख चख चख चख देखा करते
कोणों को करके अदल-बदल.


imageआखिर हमारे चाहने वाले कहाँ गए

रोशन थे आँखों में,वो उजाले कहाँ गए
आखिर,हमारे चाहने वाले कहाँ गए

रिश्तों पे देख,पड़ गया अफवाहों का असर
वाबस्तगी के सारे हवाले कहाँ गए

 

गम दूसरों के बाँटके,खुशयां बिखेर दें
थे ऐसे कितने लोग निराले,कहाँ गए

बहन जी के पास बस ७५ करोड़ रुपये हैं!
my pic.jpg new (कार्टूनिस्ट इरफान)
image
कूल आइडिया ...कूल जुगाड़ ...
image (कार्टूनिस्ट मस्तान सिँह)
image

Technorati टैग्स: {टैग-समूह},

LinkWithin