चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

समर्थक

Sunday, October 31, 2010

रविवासरीय (३१.१०.२००७)चर्चा- मेरी चुनी कुछ पोस्ट

नमस्कार मित्रों!
मैं मनोज कुमार एक बार फिर हाज़िर हूं। कुछ लिंक्स और एक लाइन … बस।
  1. अच्छा आँखे तेज कर रही है... ------------>बच्चे यह भी जान गये की आँखें तेज करना क्या होता है।   जो भी लिख दे कलम दिल से.... पर NK Pandey ---
  2. हिंदी शोध में स्टालिनवाद   ----> शिक्षा क्षेत्र में ‘तानाशाही’ प्रवृत्ति!  कलम पर cmpershad ---

  3. लकवा ---- इलाज यदि साढ़े चार घंटे के अंदर शुरू कर दिया जाए तो उनके ठीक होने की संभावना काफी बढ़ जाती है।   स्वास्थ्य-सबके लिए पर कुमार राधारमण --

  4. (title unknown)  saptak पर mahendra verma --- टाइटिल भी लगाइए – तभी तो जो खोजै सो पावै

  5. फिर से है ! ---सारे दरवाज़े बन्द  मेरी भावनायें... पर रश्मि प्रभा... ---

  6. बच्‍चों के पालन पोषण की परंपरागत पद्धतियां ही अधिक अच्‍छी थी !! ---->ज्‍योतिषियों और मनोचिकित्‍सक के पास मरीजों की बढती हुई संख्‍या इसकी गवाह है।   गत्‍यात्‍मक चिंतन पर संगीता पुरी

  7. संसृति के भाव ---->तड़ित वेग से चमक उठे Unmanaa पर Sadhana Vaid

  8. ब्रह्माण्ड की प्रथम दीपावली    ------>.एकदम स्तब्ध कर देने वाली सन्नाटा -... कुहासा - कालिमा -  pragyan-vigyan पर Dr.J.P.Tiwari

  9. बीसीसीआई इतना खेल क्‍यों कराती है ------>अब इतना खेल होने लगा है कि लोग सिर्फ सुर्खियों को पढना ही दिलचस्‍पी कहते हैं। Neeraj Express परनीरज तिवारी

  10. काश ! रात कल ख़त्म न होती... ------>
    रात एक ही प्लेट में दोनों / खाना खाकर, सुस्ताये थे.../देर रात तक बिना बात के/ख़ूब हँसे थे, चिल्लाये थे....
    आपबीती... by निखिल आनन्द गिरि

  11. हम तो हैं मुसाफिर....   ------> पीछे क्या छूटा उसे भूल गएजो मेरा मन कहे पर यश(वन्त)

  12. संरचना!    -------->
    ग़र फिर धराशायी होगा../तब भी हम/घुटने नहीं टेकेंगे
    anupam yatra....ki suruwat... पर अनुपमा पाठक

  13. घर से ऑफिस के बीच ------>
    जाने कितनी चीजें / भूलता है आदमी
    ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र पर वन्दना

  14. संयुक्त परिवार टूटने की वजह    ------>अकेले में समझाएं सीधी बात पर प्रज्ञा

  15. नगर भ्रमण -------> एक छोर से दूसरे छोर पहुँचने में दो घंटे  तक का समय लग जाता है।न दैन्यं न पलायनम् पर praveenpandeypp@gmail.com (प्रवीण पाण्डेय)

Saturday, October 30, 2010

"आजाद कर दिया है आज!" (चर्चा मंच-323)

मित्रों!
आज का चर्चा मंच ज़रा जल्दी में लगा रहा हूँ!
इसमें सभी कुछ आपका ही है, मेरा कुछ नही है!
"चिड़ियों की कारागार में पड़े हुए हैं बाज" 
आजाद कर दिया है आज!
क्योंकि बेमन से होता नही है कोई काज!!
भूखे नंगे हिंदुस्तान से
कश्मीर को आज़ाद होना चाहिए --
दुर्भावनाओं वाले,.
पाक को बरबाद होना चाहिए!
प्रिय बहणों और भाईयों, भतिजो और भतीजियों सबको शनीवार सबेरे की घणी राम राम. 
ताऊ पहेली *अंक 98 *में 
मैं ताऊ रामपुरिया, सह आयोजक सु. अल्पना वर्मा के साथ आपका स्वागत करता हूँ!
मगर बंटी चोर का जवाब टीप कर मत लिख देना!
सबकी है सरकार प्रभु क्या सबको अधिकार प्रभु 
आमलोग जीते मुश्कल से इतना अत्याचार प्रभु 
साफ छवि लाजिम है जिनकी करते भ्रष्टाचार प्रभु
यह जीवन श्रृंगार प्रभु 
हकीक़त की ईंटों के नीचे दबे हैं जो सपने अब पानी से गलने लगे हैं
सजीं हैं क़रीने से कीलें वफा की तेरे नाम टंग कर मचलने लगे हैं
काव्य मंजूषा में सपने अब पानी से गलने लगे हैं ....
एक नवयुवक के मन में इच्छा होती है कि वह इंजीनियर बने। 
खूब नाम और दाम कमाए,उसे सफ़ल व्यक्ति के रुप में जाना जाए। 
लेकिन विपन्नता कहीं न कहीं आड़े आती है। 
ऑटो रिक्शा से इंजीनियर और बिल्डर तक का सफ़र-------------
आज फ़ुरसत में भ्रष्‍टाचार पर कुछ बतियाने का मन बन गया। 
जब यह विषय मेरे मन में आया...तो 
फ़ुरसत में... भ्रष्‍टाचार पर बतिया ही लूँ !
कभी कभी कुछ लोगों से मिलता हूँ तो लगता है कि 
मैंने क्या मेहनत करी और क्या तिकडम ! 
लोग कितनी काम्प्लेक्स जीवन जी रहे होते हैं, 
शायद चिली की खदान में .....जीवन के रास्ते कभी कठिन तो कभी सरल … 
जालंधर के भोगपुर थाने में धोखाधड़ी के मामले में 
पूछताछ के लिए लाये गये एक व्यक्ति के साथ 
लेकिन पुलिस वालों ने उसके साथ जानवरों जैसा सुलूक किया।.....
यह पुलिस वाले हैं या फिर जल्लाद -
मेरी क्‍या गलती है आज शाम को सीरी फोर्ट स्थित 
अपने कार्यालय से घर वापसी पर कमला नेहरू कॉलेज की लाल बत्‍ती से दांये मुड़ते ही 
मेरी चर्चित टाटा इंडिका जीएलजी...........  आज मुझे टाटा करने के मूड में थी 
पोर पोर में पीर समाया किसने है ये तीर चुभाया ! 
मन का हाल नहीं पूछा और पूछा किसने धीर चुराया !
किसी बोल ने चीर तड़पाया.....
लाल आंखोंवाली बुलबुल पँछी के जोड़े की ये कढ़ाई है. 
इनकी तसवीर देखी तो इकहरे धागे से इन्हें काढने का मोह रोक नही पाई. 
कैसे होते हैं ये परिंदे
प्यारे मित्रो एवं स्वजनों ! नमस्कार । 
समय आ पहुंचा है " ग़ज़ल स्पर्धा " का परिणाम घोषित करने का, 
इसलिए जल्दी जल्दी सब करने की कोशिश कर रहा हूँ ।
लीजिये प्रस्तुत है ग़ज़ल स्पर्धा के परिणाम की प्रथम कड़ी
अभी नवंबर की शुरूआत भी नहीं हुई कि गुलाबी ठंड की दस्तक हो गयी है।
 बीते दो दिनों से मौसम में सुबह से शाम तक ठंडक का ही माहौल रहा है। 
तापमान में गिरावट आने से...अब मौसम की गडबडी दिसंबर के पहले सप्‍ताह में ही दिखती है !!
अपने केबिन में कुर्सी पर अपनी भीमकाय देह का बोझ डाले बैठा सरकारी वकील. 
जिसके सबूट चरणों में एक गरीब सी दिखने वाली बुढिया अपने बेटे को बचाने के लिए गिरी पडी .

मुंबई के कोलाबा में नौसेना की भूमि को सफेदपोश अपराधियों ने 
नेताओं और अपराधियों की साठ-गाँठ से आदर्श कोपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी के नाम करा ली और
मैं ब्लॉग जगत के उन सभी साथियों का आभार प्रकट करती हूँ, 
जिन्होंने मुझे मेरे जन्मदिन पर शुभकामनाएं प्रेषित की, 
और मुझे मेरी बढ़ती उम्र का एहसास दिलाया ...
ऑनलाइन हिंदी फिल्म देखने के लिए दस वेबसाइट्स जहाँ पर आप 
नयी पुरानी हिंदी फिल्मे देख पायेंगे । 
अपने व्यक्तित्व से लुभाते हो , अनजाने में कभी कभी , बातों को हवा देते थे | 
भावनाओं को उभार कर , मन मस्तिष्क पर छाते गए , 
फिर कहीं चले गए ,...
तुम हो एक सौदागर तुम हो एक सौदागर 
यदि आप यह सोचते हैं कि केवल अंग्रेजी बोलने से ही 
आपको सम्मान मिलेगा तो आप शायद गलत हैं।
 2004 की भयंकर सुनामी की याद है आप सबको ? 
भूल भी कैसे पाएंगे । दो लाख तीस हज़ार लोगों की मौत बनकर जो भयानक प्राकृतिक आपदा आई थी 
उसे कोई कैसे भूल सकता है? सुनामी: प्रलय का  ही दूसरा नाम है।
आज जिस ग़ज़ल को आप सभी से रूबरू करवा रहा हूँ, 
उसे कुछ रोज़ पहले बेलापुर में हुए, एक कवि सम्मलेन-मुशायेरे में पढ़ा था.
आसमान के दायरों में कैद नहीं, 
सुबह बन धरती पर प्रतिदिन उतर आता हूँ मैं! 
सूरज हूँ जीवनदायी हैं किरणें मेरी, 
आस विश्वास बन शाम की उदासी में बिखर जाता हू...


 पुराने फटे से टाट पर 

स्कूल के पेड के नीचे बैठे हैं कुछ गरीब बस्ती के बच्चे 
कपडों के नाम पर पहने हैं बनियान और मैली सी चड्डी 
उनकी आँखों मे देख...मिड डे मील--- 
 * * *टूटते तारो कि कुछ तो हर्जी वसूल हुई * 
*चलो अपनी भी कोई तो दुआ कबूल हुई * * 
* *उसूलो के खम्बो से बंधी है उडारी मेरी * 
*जिंदगी जैसे किसी आँगन की झूल हु...


Friday, October 29, 2010

"अब लड्डू खाने जाते है !" (चर्चा मंच-322)

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प्यारे बच्चो ,  सम्मानित ब्लोगर्स और  आगंतुक साहित्य प्रेमियों,

                 यूं तो बचपन में काफी चर्चापरिचर्चाओं  में भाग लिया किन्तु  ये चर्चा तो काफी जिम्मेदारी लिए हुवे है | अतः  शांति  बनाये  रखें | चर्चा में भाग लें और और चर्चा का रसास्वादन करें | सर्वप्रथम आपके हमारे चरण इस चर्चा मंच में पड़े  है | इस पदार्पण के लिए आप सभी का स्वागत करते हुवे , कामना करती हूँ  कि आपका हमारा पदार्पण इस मंच में शुभ हो मंगल हो, इस स्वागत गीत के साथ-  
सुस्वागतम  - लिंक में जाएँ -->
=============================================== और स्कूल में ‘‘स्वागत-गीत’’गाने के लिए छोटे बच्चो को बुलाया जाता है तो हमारे छोटे बच्चे  इस चर्चा मंच में कौन सा गीत गा रहे है.. 

बच्चो का गीत बहुत सुन्दर लगा ..कहिये आप को कैसा लगा?
बच्चो अब जरा मंच से उतर कर अपनी अपनी स्थान पे आराम से बैठ जाओ |
श्ह्ह्हह्ह्ह्ह शोर नहीं शोर नहीं --
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आज  मंच पर सबसे पहले भारत के प्रथम हिंदी के ड़ी लिट, साहित्यकार, शोधकर्ता स्व.डॉ पीताम्बरदत्त  बडथ्वाल  जी को याद करते हुवे हिंदी के लेखककवि यु.ए.ई से श्री प्रतिबिम्ब  बडथ्वाल  जी डॉ  पीताम्बरदत्त जी पर  कविता के द्वारे क्या कहते है - देखिये  डॉ० पीतांम्बरदत्त बड़थ्वाल की पुण्यतिथि के अवसर पर .. इस महान हिंदी के शोधकर्ता को याद करते हुवे आगे की चर्चा की  प्रक्रिया जारी करती हूँ.. 
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अब आपके सम्मुख आ रहे है सदूर हिमालय की घाटियों, देवभूमि से जोशीमठ से एक मौन रचनाकार श्रीप्रकाश जी, जो चुपचाप लिखते है ...जरा देखें किस तरह से  ये प्रेम और अध्यात्म को जोड़ते है..इनका दर्शन क्या कहता है| किस तरह  नव यौवन ..  आत्मा जीवन की डूबती सांझ की बेला का इन्तजार कर रही है जब वो परमात्मा से मिल जाएगी .
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अब हमारे सामने आ रही है " अपर्णा मनोज भटनागर " जी की कविता | अपर्णा जी   अहमदाबाद से हैं  और बहुत मृदुल है इनकी  लेखनी  | इनकी लेखनी का आनंद लीजिये |पोस्ट ली गयी है शब्दाकार ब्लॉग से |.

अपर्णा की कविता -- भारतीय दीवारें  |

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अब आपके सम्मुख ....  इक पर्दा लगाया आज तेरी यादों को ओट में रखने को जब जी चाहे चली आती थीं और हर ज़ख्म को ताज़ा कर जाती थीं मगर बेरहम हवा ने यादो का ही साथ दिया जैसे ही ....पर्दा हटा दिया......... वंदना जी की ये सुन्दर कविता  |
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गुजरात के जानेमाने कविवर श्री पंकज त्रिवेदी जी भी है यहाँ पर विश्वगाथा  से हैं  वो जीवनदर्शन में नकारात्मक विचारो के सामने सकारात्मक विचारो को रखते है और कहतें है निराशा-आशा  .. आशा ही जीवन है .. और निराशा की काट - सो जीवन मे आशान्वित रहीये  और जीवन को सार्थक बनायें |
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अरे मैडम आप उस तरफ कहाँ  देख रही है ?.. जी हाँ मे अनुपमा पाठक जी से ही कह रही हूँ.. आप आइये ऊपर मंच में .. आप उस दिन कुछ समुद्र अस्तित्व पर बात कर रहीं थी .. तो हो जाये एक कविता  इंसानियत का आत्मकथ्य!
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अब हमारे बीच आ रहे है, इलाहाबाद से आये जय कृष्ण राय तुषार जी| हाल ही में जो करवाचौथ था उस पर आप दो  भावभीनी कविता  ग़ज़ल कह रहे हैं ..दो रचनाएं : सन्दर्भ - करवा चौथ
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अब हमारे बीच हैं शन्नो अग्रवाल  जी, जो रहती तो है इंग्लैंड पर सदा भारत की याद और भारत का गाँव उनके ह्रदय में रचा बसा हुवा है ..उनकी कलम बहुत ही सुन्दर लेख और कवितायेँ लिखती है भारत की आम समस्या पे... उनकी एक कविता 

दूर घाटी में,-- ओस

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टेलीविजन का रिमोट जब हाथ में होता है तो अक्सर ही डिस्कवरी या नेशनल जियोग्राफिक देखने के लिये सास-बहू चैनलों से आगे पीछे जाने के लिये बटन दबाना पड़ जाते हैं..
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 व्यर्थ हृदय में ज्वार उमड़ता व्यर्थ नयन भर-भर आते हैं, पागल तुझको देख सिसकता पत्थर दिल मुसका जाते हैं ! युग-युग की प्यासी यह संसृति पिये करोड़ों आँसू बैठी,...हृदय का ज्वार 
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कछु समय पहिले ये लेखा कछु देखे कछु कभी न देखा समय बहुत कम है मम पासा पुरानी पोस्ट छापूँ देऊ झांसा :):) श्री ब्लाग जगत के कल्याण करू निज मन करू सुधारि.....त्रिदेव ........ -
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कागज के नोट तो हम सभी ने देखे होंगे, पर प्लास्टिक के नोट मात्र खिलौनों के रूप में ही देखे होंगे। आज मंच पर यह भी दिखा देते हैं 
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छुड़ाते रहे ताउम्र मगर दाग अभी बाकी है 
मुतमईन होकर न बैठो आग अभी बाकी है  
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बचपन से ही मैं बाँये हाथ से लिखता था. लिखने से पहले ही खाना खाना सीख गया था, और खाता भी बांये हाथ से ही था. ऐसा भी नहीं था कि मुझे खाना और लिखना सिखाया है.--
लबड़हत्था में पढ़िए यह सब कुछ!

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गधा सम्मेलन के सफ़लता पूर्वक समापन पर गाल बजा बजा कर गाल दुखने लगे और सभी गधे अपने अपने धामों पर पहुँच कर अपने अपने हिसाब से तफरीह की रिपोर्ट पेश करने लगे,...
देखि्ए यह मजेदार व्यंग्य!---घाघों के घाघ ’महाघाघ ऑफ ब्लॉगजगत’ 
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माँ की गोद, पापा के कंधे; आज याद आते हैं, बचपन के वो लम्हे. रोते हुए सो जाना, खुद से बातें करते हुए खो जाना. वो माँ का आवाज लगाना, और खाना अपने हाथों से.....
यही तो हैं...बचपन. !
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अब मैं चर्चा का समापन करने जा रही हूँ | लाउडस्पीकर क़ी आवाज सही  कर दीजिये हम  हिंदी की कविताओं  और लेख की चर्चा कर रहे है |  हमें अपनी हिंदी और हिंदुस्तान से प्रेम जरूर है |  आज में चर्चा का समापन स्मार्ट  इंडियन  अनुराग जी की इस गाने के साथ कर रही हूँ जिसमे  देशभक्ति का गीत झंडा ऊँचा रहे हमारा विशेष  अंदाज में है, आप भी गाने का मजा लीजियेगा विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊँचा रहे हमारा और  देश के गौरव और सम्मान के लिए अपने नागरिक कर्तव्यों  का निर्वाह करें |
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और आप सब जाते जाते मुंह मीठा  करते जाइएगा, देखिये डॉ रूपचन्द्र शास्त्री जी ने सभी के लिए मिठाई का इंतजाम  किया  है क्यूंकि लड्डू सबके मन को भाते : डॉ. रूपचंद्र शास्त्री "मयंक" की शिशुकविता अतः आप सभी लड्डू पार्टी का भी आनंद लीजियेगा | बच्चा लोग जरा पंक्ति से जाने का है.. कोई छिना झपटी नहीं स्टोक काफी बड़ा है.. पोस्ट विकल्प और सभी बड़े और बच्चे मीठी मीठी चर्चा कीजियेगा आज क़ी चर्चा पर ..हम भी अब लड्डू खाने जाते है - बाय

परम आदरणीय स्नेही  मित्रों - मै चर्चामंच  को पूर्णतया सुसज्जित नहीं कर पाई आशा करती हूँ आप सभी इस मंच को अपने स्नेह से सुसज्जित करेंगे और मेरा मार्गदर्शन करेंगे |  
डॉ नूतन गैरोला

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