चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

समर्थक

Sunday, July 17, 2011

रविवासरीय (17.07.2011) चर्चा

नमस्कार मित्रों!

मैं मनोज कुमार एक बार फिर से हाज़िर हूं रविवासरीय चर्चा के साथ।

--                                      --बीस-

जिजीविषा

Raviratlami

मेरा फोटोपिछले दिनों गृहनगर की यात्रा पर था तो जब एक बचपन के मित्र के घर जा रहा था तो वहाँ गली के एक कोने में यह देखा. एक छोटी सी दीवार के सहारे फलता फूलता बड़ा सा विशाल वृक्ष. यह पीपल समूह का वृक्ष है.


                                 --उन्नीस

मनुज प्रकृति से शाकाहारी

पं.डी.के.शर्मा"वत्स"

मेरा फोटोमनुज प्रकृति से शाकाहारी
माँस उसे अनुकूल नहीं है !
पशु भी मानव जैसे प्राणी
वे मेवा फल फूल नहीं हैं !!


                                --अट्ठारह

कार्टून: मैं मुंबई जा रहा हूँ.

Kirtish Bhatt, Cartoonist

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                                    --सत्तरह

चंचल चित ..ये मन मोरा .....!!

अनुपमा त्रिपाठी...

My Photoधानी चुनरिया ओढ़े ..
संग झूले की पींग ..मन ले हिचकोले ...!
पटली जडाऊ नगदार ..
हरी-हरी चूड़ीयन संग
मेहँदी रचे हाथ ..मन पिया संग डोले ...!


                                  --सोलह—

मन के आँसू [ताँका]

डॉ. हरदीप संधु

मेरा फोटोआँसू में होती

सागर से गहरी

संवेदनाएँ

पावनता इनकी

डूबकर ही जानूँ !


                                  --पन्द्रह

ईश्वर जो भी करता है मनुष्य के भले के लिए अच्छा ही करता है ...

महेन्द्र मिश्र

महेंद्र मिश्रभगवान जो भी करता है आदमी के भले के लिए अच्छा ही करता है . आपने उस समय मुझे अपमानित कर अच्छा ही किया कम से कम उसके कारण मेरे प्राण तो बच गए .


                                  --चौदह

क्या तुम मुझे छोड़ के जा रही हो "जोया"***

venus****"ज़ोया"

मेरा फोटोजोया" !       यही नाम है  न तुम्हारा 

मानी के अन्वेषिका ,
खोज में लीन

खुद के मानी खोजते खोजते
युहीं

तुम से आ मिली थी
मैं इक दिन

हू ब हू मुझसी दिखती
..मू बा मू
बस कुछ अलग था तो वो था
तुम्हारे हाथ में मोरपंखीं कलम होना


                                      --तेरह

अब बोल कर ढूंढिए जानकारियाँ

नवीन प्रकाश

गूगल वॉइस सर्च जो गूगल क्रोम में एड ऑन के जरिये उपलब्ध था अब गूगल ने इसे आधिकारिक रूप से सभी इन्टरनेट ब्राउजर के जरिये उपयोग करने के लिए जारी कर दिया है .
यानि अब आप गूगल में जानकारियाँ ढूँढने के लिए टाइप करने के साथ ही बोल कर भी उससे जुड़ी जानकारियाँ प्राप्त कर पायेंगे .


                                     --बारह

इस ओम में बहुत प्रकाश है

रंजीत

मेरा फोटोबिहार की जमीन गणित की विशिष्ट प्रतिभा के लिए हमेशा उर्वरा रही है। आज भी बिहार के गांव में पढ़ाई का दूसरा नाम है- गणित की दक्षता।

ओमप्रकाश अभी पांचवीं कक्षा का छात्र है और देश की सबसे बड़ी दिमागी प्रतियोगिता- आइआइटी के स्तर के सवालों को बखूबी हल कर ले रहा है। विलक्षण प्रतिभा के स्वामी ओम प्रकाश इन दिनों पटना के कुम्हरार में रह कर आइआइटी की तैयारी कर रहा है।


                                --ग्यारह

खुशफहमियों के बीच

निर्मल गुप्त

My Photoमैं और मेरा शहर आजकल खुशफ़हमियों के बीच जिंदा हैं|इस जीवन विरोधी समय में जिंदा रहने के लिए घनघोर आशावाद ज़रूरी है|वैसे यह कमोबेश जिंदगी की तल्ख़ सच्चाइयों से आंखें फिरा लेने जैसा भी है|मैंने आशावाद को सायास ओढ़ रखा है क्योंकि कुछ लोगों की राय है कि इसे ओढ़ लेने के बाद मेरे चेहरे से अमूमन रचनाकारों के मुख मंडल पर चिपका रहने वाला मनहूसियत का स्थाई भाव छिप जाता है|


                                     --दस

हर-हर बम-बम

रविकर

My Photoहर-हर बम-बम,  बम-बम धम-धम |

तड-पत हम-हम,  हर पल नम-नम ||

अक्सर गम-गम, थम-थम, अब थम |

शठ-शम शठ-शम, व्यर्थम  -  व्यर्थम ||


                                    --नौ

मेरी दो ग़ज़लें

जयकृष्ण राय तुषार

मौसम तो खुशगवार बहुत  वादियों में है

मेरा सफर तमाम मगर सर्दियों में है

ये सोचकर परिंदे भी उड़ते चले गए

रहते थे जिस दरख्त पे वो आंधियों में है


                                 --आठ

आप उनको याद आयेंगे

प्रवीण पाण्डेय

जिन स्थानों पर आपका समय बीतता है, उसकी स्मृतियाँ आपके मन में बस जाती हैं। कुछ घटनायें होती हैं, कुछ व्यक्ति होते हैं। सरकारी सेवा में होने के कारण हर तीन-चार वर्ष में स्थानान्तरण होता रहता है, धीरे धीरे स्मृतियों का एक कोष बनता जा रहा है, कुछ रोचकता से भरी हैं, कुछ जीवन को दिशा देने वाली हैं। स्मृतियाँ सम्पर्क-सूत्र होती हैं, उनकी प्रगाढ़ता तब और गहरा जाती है जब उस स्थान का कोई व्यक्ति आपके सम्मुख आकर खड़ा हो जाता है।


                                     --सात

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"दो रोटी" के खातिर अब तो "तिलक लगा" घर वाले भेजें

surendrshuklabhramar5

Sahity Ke Srijan Me Aaaiye Sahyog Karenचिथड़े पड़े "खून" बिखरा है

"ह्रदय विदीर्ण" हुआ देखे !

आँखें नम हैं धरती भीगी

"जिन्दा लाश" बने बैठे !!


                                       --छह

क्षणिकाएँ

देवेन्द्र पाण्डेय

My Photoबांधना चाहता हूँ तुझे
गीतों में
फैलती जाती है तू
कहानी बनकर।


                                --पांच

क्या हमारी मीडिया भटक गयी है ?

ZEAL

My Photoदेश और समाज के हालात से अवगत कराने का कार्य मीडिया का है ! लेकिन क्या हमारी मीडिया इस कार्य को निष्ठा के साथ अंजाम दे रही है ? आम जनता की बहुत अपेक्षाएं जुडी होती हैं मीडिया के साथ , वो उसकी तरफ सहायता पाने की दृष्टि से देखती है. अपनी आवाज को ऊंचा करना चाहती है मीडिया की मदद से! और देश तथा परिवेश का पारदर्शिता से दिखाया गया आइना देखना चाहती है!


                                     --चार

"गीत-...गद्दार आ गये हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मेरा परिचयपाये नहीं जिन्होंने, घर में नरम-निवाले,
खुद को किया उन्होंने, इस देश के हवाले,
फूलों को बींधने को, कुछ खार आ गये हैं।
टुकड़ों को बीनने को, मक्कार आ गये हैं।।


                                   --तीन

कविता : अंगूठे का सहारा

मुकेश कुमार तिवारी

मेरा फोटोआज भी

जब विज्ञान नही समझ पाता है

किसी बात को

रुक जाता है

किसी रूल ऑफ थम्ब पर

लेते हुए सहारा अंगूठे का

तर्कों को ठेंगा दिखाते हुए


                                      --दो

"माँ"

अमित श्रीवास्तव

मेरा फोटोमाँ !

एक ओस की बूंद, 

जिसमे चमक सूर्य सी, 

शीतलता अमृत सी, 

तरल सी फिर भी समग्र,


                                   --एक--

रंगमंच से : दब न जाये कहीं भारत-पाक की एक सम्मिलित आवाज

अभिषेक मिश्र

clip_image003भारत-पाक संबंध इनके स्थापना काल से ही एक तलवार की धार पर चलने सरीखे हैं, जिन्हें इनकी राह से भटकाने में कई स्वार्थजन्य तत्व भी छुपे हुए हैं. कहते हैं मो. अली जिन्ना को भी आगे चलकर अपने इस निर्णय के औचित्य पर संदेह होने लगा था, मगर तबतक राजनीति की शतरंज के खिलाडी अपने खेल में काफी दूर निकल चुके थे. उस दौर की विभीषिका झेल चुकी एक पीढ़ी अपने स्तर पर इतिहास की इस भूल को सुधारने के प्रयास करती रही.


आज बस इतना ही!

अगले हफ़्ते फिर मिलेंगे।

तब तक के लिए हैप्पी ब्लॉगिंग!!

26 comments:

  1. अच्छी लिंक्स के लिए बधाई |
    आशा

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  2. सुन्दर प्रस्तुति ,हार्दिक बधाई ...

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  3. सुन्दर, मेरे लिए बहुत से नए लिंक्स ||

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  4. मनोज जी नमस्कार ..!!बढ़िया चर्चा है ...आभार ...मेरी कृति के चयन के लिए....

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  5. वाह
    मेरी रचना भी
    सुखद आश्चर्य ||
    बहुत-बहुत आभार ||

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  6. बढ़िया चर्चा .

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  7. बहुत बढ़िया चर्चा संजोयी है ... आभारी हूँ आपने समयचक्र की पोस्ट को सम्मिलित किया ...

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  8. धन्यवाद कुछ नए लिंक देने के लिए

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  9. सुंदर चर्चा ,आभार

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  10. सुन्दर व सटीक चर्चा।

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  11. क्रमानुसार सार्थक चर्चा .आभार

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  12. सुन्दर चर्चा, सुन्दर लिंक्स... आभार

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  13. सभी की रचनायें तो पढ़ूंगा ही। सर्वप्रथम सभी मित्रों के लिन्क देने के इस सुंदर तरीके के लिये आपको बहुत बहुत बधाई।

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  14. संतुलित चर्चा में आपका कोई जवाब नहीं है मनोज जी बहुत सुन्दर तरीके में प्रस्तुत करते हैं आप चर्चा .आभार

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  15. अछे लिंक्स मिले.आभार.

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  16. सुन्दर प्रस्तुति ,हार्दिक बधाई ...

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  17. अच्छी लिंक्स के लिए बधाई |

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  18. अनुभवी हाथों से तैयार की गई,
    शानदार चर्चा!

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  19. आज की चर्चा में आपने कई बहुत बढ़िया उपयोगी लिंक दिए हैं ! आभार स्वीकारें

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  20. This comment has been removed by the author.

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  21. मेरी रचना के चयन के लिए आभारी हूँ .
    निर्मल गुप्त

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  22. This comment has been removed by the author.

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  23. This comment has been removed by the author.

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  24. aapka prayas spsttaya parilakshit ho raha hai,,safal bhi hua ,,hardik badhayiyi

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