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Tuesday, May 31, 2011

जीने दो इन्हें , न जाने कब खुदा लिबास उतार दे .. साप्ताहिक काव्य मंच – 48 .. चर्चा मंच – 530

नमस्कार , एक बार फिर हाज़िर हूँ मंगलवार की चर्चा ले कर ..चर्चा मंच ऐसी वाटिका है जहाँ जाने पहचाने चेहरों के साथ नए चेहरों का भी परिचय मिलता है … ब्लॉग जगत में ऐसे मोती छिपे हैं जिनकी चमक स्वत: ही दिखाई दे जाती है ..बस इस समंदर में गोता लगना पड़ता है ..खैर आप तो नए मोतियों की चमक से आनंदित होईये .. और बताइए कि मोती असली ही हैं न ? सबसे पहले वाटिका ब्लॉग से चलते हैं आज की चर्चा पर --
clip_image002[6]वाटिका पर पढ़िए नोमान शौक की कविताएँ --यातना
मृत शरीर
कितने ही प्रिय व्यक्ति का क्यों न हो
बदबू देने लगता है
थोड़े समय बाद
किसी टूटे हुए रिश्ते को
अन्तिम सांस तक संभाल कर
जीने की चाह से
बड़ी नहीं होती
कोई यातना ।
मनोज जी विचार ब्लॉग पर लाये हैं एक ऐसी रचना जो मजबूर करती है सोचने पर …
clip_image002[10] clip_image003[4]
काम करती माँ कविता के आगे की कड़ी है यह झींगुर दास ..
झींगुर दास ने देख लिए तीन पुश्त
उस मालिक की देहरी के
मालिक भी परलोक गए
बच्चे उनके परदेश में हैं
अब झींगुर करेगा क्या,
खाएगा क्या?
clip_image002[12]शिखा वार्ष्णेय कल्पना के पंखों को फैला कर डूबी हैं थोड़ी रुमानियत में --
यूँ ही कभी कभी
ठन्डे पड़ जाते हैं
मेरे हाथ
तितलियाँ सी
यूँ ही मडराने लगती हैं
पेट में
clip_image002[14] हरकीरत हीर जी की हर रचना ज़िंदगी का अनुभव होती है …एक एक लफ्ज़ महसूस होता हुआ स लगता है … न जाने खुदा कब लिबास उतार दे ..
झूठ .....
कुछ यूँ टँगा रहता है
लोगों की जुबाँ पर
के हर रोज़ उतारती हूँ
ज़िस्म के ....
clip_image001आज आपके समक्ष लायी हूँ कविताओं के धनी एस० एन० शुक्ला जी को , फिलहाल कई कविताएँ पढ़ डाली हैं मैंने और बाकी भी पढ़ने का लोभ संवरण नहीं कर पा रही हूँ … जो अभी तक पढ़ी हैं उनमें से वीरवर कर्ण और प्रश्न ने बहुत प्रभावित किया है ..यहाँ उनकी एक और रचना लायी हूँ -
कुछ लोग हवा के साथ चले, धारा के साथ बहे होंगें
लोगों की नजरों में शायद वे ही तैराक रहे होंगे
मैं सदा चला विपरीत धार, मझधार-पार से क्या लेना
मैं विद्रोही बन जिया सदा, फिर जीत-हार से क्या लेना.
clip_image002[16]जिंदगी से भरपूर इस लड़की की मृत्यु की खबर अखबार में पढ़ी ...किसी की नजर में फ़ूड पोइजनिंग का मामला था , तो कोई इसे जानबूझकर जहर खाना बता रहा था ...उस दिन अखबार में 4 लड़के -लड़कियों की आत्महत्या की खबर थी , भुलाये नहीं भूलता ...भरे-पूरे परिवार में किस तरह लोंग अकेले पड़ जाते हैं कि उनके पास आत्महत्या के सिवा चारा नहीं होता ….  वाणी शर्मा जी अपने मन की बात इस रचना के माध्यम से कहना चाहती हैं --
जीने दो इन्हें
अनन्य अद्भुत शांति
सिमटी हो हमारी आँखों में
अंतस तक भिगोती स्निग्धता
जो देती रहे इन्हें साहस
जीने का हौसला
clip_image002[18]अतुल प्रकाश त्रिवेदी जी कॉल सेंटर में काम करने वाली लड़कियों की दिनचर्या को शब्द दे रहे हैं --गुड़ मॉर्निंग
अभी अभी
नभ में टूटा कोई तारा
हमने नहीं देखा
नदी के तट पर
हर शाम की तरह
खुद का प्रतिबिम्ब निहारता
clip_image002[20]निवेदिता श्रीवास्तव जी दानवीर कर्ण के विषय में अपनी भावना व्यक्त कर रही हैं सूर्य पुत्र या सूत पुत्र "कर्ण"
आज सूर्य की ,
धरा पर झांकने को तत्पर,किरणों से
मैं सूर्यपुत्र कुछ कहना चाहता हूँ
मैंने तो कभी न पाली किसी के प्रति
अपने मन में कोई दुर्भावना ,फिर -
मुझे मिली किस अपराध की सजा !
clip_image001[4] कुश्वंश जी महाभारत के पत्रों को आज के युग में किस सन्दर्भ में देख रहे हैं ज़रा गौर करें --अंजाम नहीं मालूम
महाभारत की द्रोपदी का प्राणांत
कोई नहीं जानता,
और जानता भी है तो
पढने जैसा कुछ नहीं होगा उसमे,  
क्योकि द्रोपदी
महाभारत समाप्त होने पर भी
नहीं मरी,
आज भी जिन्दा है,
clip_image002[22]आशुतोष मौर्य जी कहते हैं “  मेरे मित्र सोमू दा की एसएमएस के जरिए भेजी गयी ये कुछ कविताएं बेहद प्यारी लगती हैं मुझे। इन कविताओं की सबसे खास बात यह है कि सोमू दा इन्हें अपनी मूल कविता संग्रह में कहीं नहीं रखते। ये कविताएं उन्होंने संदेश के निमित्त ही लिखी हैं। तो लीजिए पढ़िए उनके सोमू डा की रचनाएँ .. जो सच ही एक से बढ़ कर एक हैं ..सन्देश कविताएँ
धरती और स्त्री में एक समानता है
कि वह धरती की तरह है
और एक अन्तर कि वह धरती नहीं
वह एक समय में कई धुरी पर घूमती है
कई बार तय करती है दूरी
वहां तक जहां तरतीब में नहीं हैं चीजें
घर जैसी छोटी दुनिया में कोई स्त्री
कितने अद्भुत तरीके से धरती बनी रहती है
clip_image002[24]देवेन्द्र गौतम जी की एक खूबसूरत गज़ल --
डूबने वाले को
डूबने वाले को तिनके के सहारे थे बहुत.
एक दरिया था यहां जिसके किनारे थे बहुत.
एक तारा मैं भी रख लेता तो क्या जाता तेरा
आस्मां वाले तेरे दामन में तारे थे बहुत.
clip_image001[6] आनंद द्विवेदी जी बहुत से नज़ारे दिखा रहे हैं वेटिंग रूम से -
प्रतीक्षालय में होना
सुखद है,
बनिस्बत

होने के
किसी प्रतीक्षा में ..

हजारों चेहरे
और इसके आगे की कड़ी पढ़िए ..वापसी .. प्रतीक्षा के बाद
याद आ रहा है मुझे
गुज़रते हुए इस
अनिश्चितकालीन प्रतीक्षा से
कहा था कभी
clip_image001[8]अरुण चन्द्र राय जी मजदूरों की मजबूरी को अपने शब्दों में लाये हैंलेबर चौक खोडा
मुझे नहीं पता कि
देश का सबसे बड़ा
लेबर बाज़ार कहाँ है
लेबर बाज़ार कहाँ है
लेकिन जब देखता हूं
दिल्ली, नोएडा और गाज़ियाबाद के बीच
नो मैन्स लैंड खोड़ा के चौक पर
हर सुबह

clip_image001[10] स्वराज्य करुण जी लाये हैं एक खूबसूरत गज़ल -
ज़िंदगी की नदी में
हमने जिसे अपने खून-पसीने से खूब सींचा है , 
नज़दीक उसके जा भी न सकें , ये कैसा बगीचा है   ! 
कालीन जो तुमने बनायी, बिछी है उनके पाँव में ,   
घर में तुम्हारे यहाँ महज काँटों का गलीचा है !
मेरा फोटो दिलबाग विर्क जी की हाईकू पढ़िए साहित्य सुरभि पर
तोड़ लेती है
टहनियों से फूल
स्वार्थी दुनिया .
चांदी काटना
सत्ता का मकसद
मेरे देश में .
clip_image002[28]अना जी बता रही हैं कि आज बचपन कैसे बस्तों के बोझ तले दब रहा है -
ये बचपन
बस्तों के बोझ तले दबा हुआ बचपन
बसंत में भी खिल न पाया ये बुझा हुआ बचपन
बचपन वरदान था जो कभी अति सुन्दर
पर अब क्यों लगता है ये जनम - जला बचपन
clip_image002[30]इन्द्रनील “ सैल" जी के खीचे हुए चित्र के साथ उनकी एक खूबसूरत गज़ल का आनंद लीजिए …
ये जिंदगी, पता है क्या ?
न खत्म हो, सज़ा है क्या ?
है आँख क्यूँ भरी भरी ?
किसी ने कुछ कहा है क्या ?
clip_image001[12]सौरभ चौधरी “सुमन “ अपनी रचना के माध्यम से उस नन्हे शिशु के मन की बात बता रहे हैं जिसने अभी इस दुनिया में प्रवेश किया है … वो नन्हा क्या सोच सकता है .. ज़रा आप भी पढ़िए --- " माँ "...!!!
कितना खुश था मैं माँ
जब मैं तेरे अन्दर था माँ
इस दुनिया से बचाकर कर रखा था तुमने
कितने प्यार से पाला था तुमने
 
clip_image001[14]कुंदन जी को किसी कि आँखें देख कर क्या क्या लगता है जानिये उनके ही शब्दों में ..
क्या कहूँ तेरी आँखों के बारे मे
जब भी इन्हें देखता हूँ
तो लगता है
इन आँखों मे झील की गहराई है
इन आँखों मोती की सच्चाई है
clip_image001[16]डा० कविता किरण जी अपनी गज़ल में कह रही हैं ---अमृत पी कर भी है मानव मरा हुआ
अमृत पीकर भी है मानव मरा हुआ
बरसातों में ठूंठ कहीं है हरा हुआ
करके गंगा-स्नान धो लिए सारे पाप
सोच रहे फिर सौदा कितना खरा हुआ
 My Photo
clip_image002[32] अरुण कुमार निगम जी की एक खूबसूरत रचना --
चादर सी ,चूनर सी- चैत की चंदनिया
झांझर सी,झूमर सी - चैत की चंदनिया
महुआ की मधुता सी,  मनभाती-मदमाती
छिटके गुलमोहर सी - चैत की चंदनिया
अनपढ़ - अनाड़ी सी   ,सल्फी सी-ताड़ी-सी
मादक-सी,मनहर सी - चैत की चंदनिया
clip_image002[34] रंजीत जी लाये हैं मन की बात मन से करते हुए --
सामने तालाब पर
भोरे-भोर आया था वह
झलफल होने तक इंतजार करता रहा
न जाने किसका
न जाने क्यों
clip_image002[36] रेखा श्रीवास्तव जी उम्र के उस पड़ाव पर आकर दर्द महसूस कर रही हैं जब शरीर थकने लगता है …बच्चे सब घोंसलों से निकल अपने आकाश में उड़ने लगते हैं ..अपना नया आशियाना बना लेते हैं --
दर्द किसी सूने घर का
तेरी आवाज सुनी तो सुकून आया दिल को,
वर्ना तुझे देखे हुए तो जमाना गुजर गया।
कभी गूंजती थी किलकारियां इस आँगन में,
वर्षों गुजर चुके है इसमें अब पसर गया।
clip_image002[38]डा० आकुल जी की प्रस्तुति साहित्य प्रेमी संघ पर पढ़िए -- इस तरह से
इस तरह अंतर जगत में
साथ में मिलकर चले हम ,
दूर भी तो रह न पाए ,
पास आ पाए नहीं .
clip_image002[40]मृदुला हर्षवर्धन जी न जाने क्यों कुछ चुप चुप सी हैं और कह रही हैं कि -आज मन बहुत उदास है ... तो चलिए कुछ उदासी दूर कर दी जाये ..
आज मन बहुत उदास है
सब कुछ तो है, जाने फिर किस की प्यास है
भीड़ में अकेलेपन का अजीब सा एहसास है
शुष्क आँखों के किसी कोने में, टूटी हुई आस है
clip_image002[42]बाबुषा एक पहाड़ी की भावनाओं को भी अपने शब्द दे रही हैं ..
मेरी छाती में
लोटती रहती है धूप
दिन के दूसरे पहर तक;
और फिर -
सरकते हुए
धरती के सुदूर कोने में
चली जाती है !

clip_image002[44]गोपाल तिवारी जी एक बता रहे हैं कि राजनीति में अपने आकाओं के चक्कर लगाने से कुछ न कुछ तो हासिल हो ही जायेगा ---
हास्य कविता
राजनीति में
जो अपने आका का परिक्रमा लगाएगा
कभी नही तो कभी पूजा जाएगा
और जो अकडन दिखलाएगा
अवसर को गंवाएगा
clip_image001[18] वंदना गुप्ता जी … एक विस्तृत आकाश को कैनवस पर उतार लायी हैं …
तुम्हारी ख्वाबों की दुनिया
का कैनवस कितना
विस्तृत है
है ना ...........
उसमे प्रेम के
कितने अगणित रंग
बिखरे पड़े हैं
clip_image002[46]वर्षा सिंह खूबसूरत रचना से बता रही हैं कि मीठे बोल मन में कैसे अपार सुख को भर देते हैं ---बोल प्यार के
कितना तरसा है मन
मीठे बोल तुम्हारे सुन कर मेरी
बोल तुम्हारे मिल जाएँ
मन कि कलियाँ खिल जाएँ
clip_image002[48]वटवृक्ष पर रश्मि प्रभा जी प्रस्तुत कर रही हैं आनंद द्विवेदी जी को -- उनकी एक गज़ल
खत लिख रहा हूँ तुमको--
न दर्द, ... न दुनिया के सरोकार लिखूंगा,
ख़त लिख रहा हूँ तुमको, सिर्फ प्यार लिखूंगा !
तुम गुनगुना सको जिसे , वो गीत लिखूंगा ,
हर ख्वाब लिखूंगा, .. हर ऐतबार लिखूंगा !
clip_image001[20] ऋषभ जी अलग अंदाज़ में पेश कर रहे हैं ..कुर्सी - रोटी
कुर्सी मुकुट और दरबार
रोटी पेटों की सरकार
कुर्सी भरे पेट का राज
रोटी भूखों की आवाज़
कुर्सी सपनों का संसार
रोटी मजबूरी-बेगार
clip_image002[50]चन्द्र भूषण मिश्रा “ गाफिल “ जी की खूबसूरत गज़ल …चर्चामंच पर पहली बार पेश है
बस वही दूर हुआ जा रहा मंजिल की तरह
मैँने चाहा है बहुत जिसको जानो-दिल की तरह।
बस वही दूर हुआ जा रहा मंजिल की तरह॥
जुल्फ़-ज़िन्दाँ में हूँ मैं कैद एक मुद्दत से,
कोई आ जाये मेरे वास्ते काफ़िल की तरह।
clip_image002[52]कुसुम ठाकुर जी कुछ हाईकू रचनाये लायीं हैंममता
ममता माँ की
निःस्वार्थ सतत ही
है अनमोल
******************
गोद समेटे
धरा और जननी
यही शाश्वत
clip_image002[54] रश्मि प्रभा जी मन के मंथन को कर लायी हैं एक नायब रचना --अमृत देवता के हाथ
सर्वप्रथम कृष्ण मनुष्य
फिर भगवान्
कभी कुशल राजनेता
कभी सारथी , .....
कभी सार कभी सत्य
clip_image002[56]मनोज ब्लॉग पर श्यामनारायण मिश्र जी का खूबसूरत नवगीत
गूंजता होगा नाम तुम्हारा
घाटियों में
गूंजता होगा तुम्हारा नाम।
दूर प्राची के अधर से
सारसों की दुधिया ध्वनि
चू रही होगी।
clip_image001[22]डा० रूपचन्द्र शास्त्री जी अपने गीत में एक सार्थक चिन्ता को व्यक्त करते हुए कह रहे हैं
यौवन जैसा “रूप” कहाँ है,
खुली हुई वो धूप कहाँ है,
प्यास लगी है, कूप कहाँ है,
खरपतवार उगी उपवन में।
पंछी उड़ता नीलगगन में।
और इस सीख के साथ ही देखिये क्या हाल है गर्मी का ?  पढ़िए कुछ दोहे --दोहे - दो गंजे
clip_image002[58]
गर्मी के कारण हुए, हाल बहुत बेहाल।
बाल वाङ्मय लिख रहे, मुँडवा करके बाल।।
सिर घुटवा गंजे हुए, दोनों ब्लॉगर साथ।
रवि जी ने रक्खा हुआ, कन्धे पर है हाथ।।
clip_image001[24] चर्चा के समापन तक बहुत से लिंक्स दिए पर अभी भी लगता है …
अभी कुछ और ....बाकी है .. समीर लाल जी की एक खूबसूरत गज़ल ..
इन्हीं राहों से गुज़रे हैं मगर हर बार लगता है
अभी कुछ और,अभी कुछ और ,अभी कुछ और बाक़ी है

हमेशा ज़ख़्मी दिल को दोस्तो ये खौफ रहता है
अभी कुछ और,अभी कुछ और ,अभी कुछ और बाक़ी है
लीजिए मैंने तो सारे मोती रख दिए आपके सामने … आपको कौन कितना आकर्षित करता है , यह आप ही बताएँगे … आपके सुझाव और प्रतिक्रिया का हमेशा इंतज़ार रहता है … आप जाँचिये – परखिये और मैं चली नए मोती इक्कठा करने … अरे अगले मंगलवार को भी तो लाने हैं न कुछ नए चेहरे …चलते चलते एक हास्य रचना यहाँ भी -- संगीता स्वरुप

Monday, May 30, 2011

ख़ट्टी मीठी चर्चा……………चर्चा मंच

दोस्तों
सोमवार की खट्टी मीठी 
चर्चा में 
आपका स्वागत है 
अब हमने क्या कहना है
हम तो कह चुके 
शायद कुछ खट्टा लगे
और कुछ मीठा 
अब चख कर बताइए 
कैसा लगा   


दोस्तों हमारे साथ एक नए 
चर्चाकार अरुणेश सी दवे जी जुड़ 
रहे हैं उनका तहेदिल से स्वागत है
आशा है वो चर्चामंच को
नयी ऊँचाइयाँ देंगे  




 अच्छे से करना 




अरे वाह ! तो फिर जानते हैं कैसे



हाय हाय .........क्यों झोंक रहे हैं चूल्हे में  

 जो किसी ने न जानी 


कहाँ मिलता है आज ? 


 किसी ने नहीं कहा जी 


कितनी भोली कितनी प्यारी  


 नवगीत गाये जा 
ज़िन्दगी महकाए जा  


 मेरी ज़िन्दगी 


क्यों जी ..........इसे किस्मत मत बनाओ  


 इसके लिए क्या करना चाहिए ?



 निकाल बाहर फेंको 


 इसमें क्या शक है 



क्या आपको पता चल गया ? 



पता नहीं  


 आपने पढ़ लिए ? 



 कितनी देर लगी ?



कैसे कोई हमें भी बता दे 

 नमन है 



जरूर मिलेगा

श्याम का तराना

तो क्या करती जी ? 


जरूर देखते हैं जी 



हम हैं ना



ऐसी डांट ही लगानी चाहिए .........शायद तब समझे वो 

इतना क्यों डरा रही हो 


 सत्य वचन

जिस पर बीते वो जी जान सकता है



 चलिए दोस्तों आज के लिए इतना ही
अगले सोमवार फिर मिलेंगे 
तब तक आप अपने विचारों से
हमें अवगत कराते रहिये 
हमारा हौसला बढ़ाते रहिये  

Sunday, May 29, 2011

रविवासरीय (29.05.2011) चर्चा

नमस्कार मित्रों!


मैं मनोज कुमार एक बार फिर से हाज़िर हूं रविवासरीय चर्चा के साथ।

आज आई.पी.एल. का फाइनल बस शुरु होने ही जा रहा है। आप सब उसका आनंद ले रहे होंगे। … और हम बैठे हैं अपना साप्ताहिक कमिटमेंट पूरा करने। टॉस हो चुका है, और मैच बस शुरु होने ही वाला है। हमारी चर्चा भी बस शुरु ही होने वाली है। जब मैच खत्म हो चुका होगा तब हम अपनी चर्चा शेड्यूल कर रहे होंगे। शास्त्री जी को हमने वचन दे रखा है कि रविवार की सुबह की चर्चा हम करेंगे। तो वचन तो निभाना ही पड़ेगा, चाहे आई.पी.एल. का फाइनल मिस हो जाए। आई.पी.एल. की धूम से बात की शुरुआत करें तो यह देखें

कार्टून: देश बड़ा या आईपीएल ?



कहा गया है, “हमारे वचन चाहे कितने भी श्रेष्‍ठ क्‍यों न हों परन्‍तु दुनिया हमें हमारे कर्मों के द्वारा पहचानती है।” तो अब हम अपना कर्म करें। पर एक

इलित्जा तो कर ही सकता हूं कि जो भी परिणाम आए उसे हमें भी बताइएगा, एक पोस्ट लिख दें तो मज़ा आ जाएगा, ताकि हम डिटेल में जान पाएं कि क्या-क्या हुआ?

आई.पी.एल. की चर्चा चली तो एक बात जो उभर कर सामने आई वो यह कि जबसे क्रिस गेल सामने आया तब से इस टूर्नामेंट का सारा समीकरण ही बिगड़ गया। जो टीम सबसे आगे थी, धीरे-धीरे खिसकते-खिसकते नीचे आती गई और आरसीबी चोटी पर पहुंचता गया। उसने सिंगल हैंडेडली इस टीम को फाइनल में पहुंचा दिया। अपनी टीम (वेस्ट इंडीज़) में उसे जगह नहीं क्या मिली लगता है उसके अंदर एक आग सी जल उठी और उसकी धधकन लिए वह आई.पी.एल. में टूट पड़ा और फानल में जिस अंदाज़ से सेमीफाइनल के रास्ते आया है लगता है कि उसमें

आग बहुत-सी बाकी है … और क्या पता वह फाइनल भी  ….:)!


आग कैसी भी पर सफलता तो मेहनत से ही मिलती है। “जिस प्रकार थोड़ी सी वायु से आग भड़क उठती है, उसी प्रकार थोड़ी सी मेहनत से किस्मत चमक उठती है।” और प्रेम की आग तो सबसे कम जलाती है, यदि उसमें वासना न हो। इसके लिए हमें एक अलग देस में जाना होगा। वहां जहाँ मनुष्य के मन में प्रेम इतना प्रबल हो कि अपने अंदर ही नित्य उपजतीं  अन्य नकारात्मक प्रवृत्तियां स्वतः ही दुर्बल  पड़ने लगें ..!!  इसलिए

चला वाही देस ... .....!!

किसी ने सच ही कहा कि “यदि मैं यह समझ लूँ कि मेरा असली गुण प्रेम करना है तो मन में द्वेष आ ही नहीं सकता।” आखिर हम इस छोटी सी ज़िन्दगी में द्वेष-ईर्ष्या क्यों पालते हैं।  हर कोई यहां सफ़र में है, और जैसे एक-दूसरे से हम प्रतीक्षालय में प्रतीक्षालय में मिले हों, बस गाड़ी के आने की घोषणा होते ही हमें इस

वेटिंग रूम से....

चला जाना होगा। 


इस छोटी सी ज़िन्दगी के भी कई रूप होते हैं। अब देखिए न “बीस वर्ष की आयु में व्यक्ति का जो चेहरा रहता है, वह प्रकृति की देन है, तीस वर्ष की आयु का चेहरा जिंदगी के उतार-चढ़ाव की देन है लेकिन पचास वर्ष की आयु का चेहरा व्यक्ति की अपनी कमाई है। ” इस उम्र के लोग कहते मिल जाएंगे

हमें बहुत पैसा मिल रहा है 

मिले भी क्यों न? आखिर अनुभव की भी तो क़ीमत होती है।

अनुभव बड़े काम की चीज़ होती है। अनुभव की पाठशाला में जो पाठ सीखे जाते हैं, वे पुस्तकों और विश्वविद्यालयों में नहीं मिलते। अब देखिए न मिट्टी से कुल्हड़ बनाना कोई आपको सिखा दे, आप सीख लेंगे। उसमें चाय पीकर उसे फेंक देंगे। पर इस कुल्हड़ का कोई उपयोग भी हो सकता है वह तो अनुभवी लोग ही बता सकते हैं। तो इसी बात पर देखिए आप भी

द स्टोरी ऑफ 'कुल्हड़ यूटिलाइजेशन'

कोई भी चीज़ तब अनुपयोगी नहीं होती जब तक वह पूर्णतया अनुपयोगी न हो जाए। उपयोग करने की इच्छा और आदत होनी चाहिए। “हमें क्षण-क्षण का उपयोग करके विद्या का और कण-कण का उपयोग करके धन का अर्जन करना चाहिये!” इसलिए ज़रूरी है 

निर्धनों को बाँटकर तालीम कहलाओ धनी, क्यों सबल को भेंट दे, उपहार की बातें करें। 

लेकिन आज ग़रीबों की कौन सुनता है। जो धनी हैं और भी धनी होना चाहते हैं। और जो ग़रीब हैं और भी ग़रीब होते जा रहे हैं। “अपनी जरुरत के लिए धन कमाना अच्‍छी बात है, किन्‍तु धन-दौलत जमा करने की भूख होना बुरी बात है।” इस भूख से भ्रष्टाचार जनमती है। और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में सरकार भी विवश दिखती है। कभी-कभी मन में यह प्रश्न आता है कि

क्या भ्रष्टाचार का सरोकार सरकार से ही है

सरकार को क्या दोष दें, चुनते तो उन्हें हम ही है, जो हम पर शासन करते हैं। हमने जिन्हें चुना है वो राजनीति का ऐसा खेल खेल रहे हैं जिसमें आप जनता घुन की तरह पिसती जा रही है।

गुंडों के बल पर चला , राजनीति का खेल ।भले आदमी रो रहे, ऐसी पड़ी नकेल ।।

राज बदले, या पाट बदले, राजनीति का मौसम एक सा ही रहता है। मौसम तो बदलता ही रहता है। अब तो प्रचंड गर्मी की मौसम आ गया है। हम आपको चेता दे रहे हैं। आप हो जाइए  

सावधान! हाजमा बिगाड़ सकता है बदलता मौसम


वैसे कोई भी मौसम हमें कैसा लगता है वह हमारे मन पर निर्भर करता है। मन में नकारात्मक भाव हों तो “कभी कोयल की कूक भी नहीं भाती और कभी (वर्षा ऋतु में) मेंढक की टर्र टर्र भी भली प्रतीत होती है | ” जो कभी कसूरवार लगते थे वे बेकसूर लगने लगते हैं, जो अच्छी बातें बताता लगता था वो बकवास करता प्रतीत होता है।

बेकसूर प्रिंसिपल, नकारात्मक मीडिया - फालोअप पोस्ट 

से तो ऐसा ही लगता है।

क्या-क्या देखना पड़ता है, क्या-क्या सुनना पड़ता है। क्या-क्या देखना बाक़ी है, क्या-क्या सुनना बाक़ी है। जैसी है वैसी ही है दुनिया न जाने

कैसी है ये दुनियां!

जो है सो है। यहां तो आंख के अंधे को दुनिया नहीं दिखती, काम के अंधे को विवेक नहीं दिखता, मद के अंधे को अपने से श्रेष्ठ नहीं दिखता और स्वार्थी को कहीं भी दोष नहीं दिखता। इसलिए चलिए चल कर रहें तारों के पीछे।


जहां जाकर कुछ शान्ति मिले, सुकून मिले और मन को मिले विश्राम। इसीलिए

फुरसत में ... दिल ढूँढता है फिर वही ऊटी ... !

चाहे जो हो, जैसा भी हो, हमें आशा है कि

अच्छे दिन फिर से आयेंगे


ये थी आज की हमारी

एक छोटी सी लव स्टोरी। आशा है अच्छी लगी होगी।

हमने अपना कर्म कर लिया। आब आपकी आप जानें …!


अगले हफ़्ते फिर मिलेंगे। कुछ नए विचार और नई पोस्टों के साथ। तब तक के लिए हैप्पी ब्लॉगिंग।

Saturday, May 28, 2011

वो कितनी पास थी,मै कितना दूरः-(शनिवासरीय चर्चा)....Er. सत्यम शिवम

*ॐ साई राम*
पर उसका स्पर्श ना कर सका मै,
जी करता है खींच लाऊँ वो पल,
पर एक विचार है मन में,
जो कभी सोचा न था,
कि तुम्हें ढ़ुँढ़ने कब तक पथिक बन,
-----सत्यम शिवम----
"स्पेशल काव्यमयी चर्चा"
ब्लॉगः-"बिखरे मोती"
 ब्लॉगरः-यज्ञ दत मिश्रा जी
नमस्कार दोस्तों मै सत्यम शिवम आज शनिवार को फिर आपके समक्ष लेकर आया हूँ......."स्पेशल काव्यमयी चर्चा" और साथ ही अपनी दिनचर्या वाली "शनिवासरीय चर्चा"।

आज की "स्पेशल काव्यमयी चर्चा" में ब्लाग "बिखरे मोती" की सुंदर पोस्टों की चर्चा की जा रही है,यज्ञ दत मिश्रा जी के ब्लाग से।

"स्पेशल काव्यमयी चर्चा" के बारे में अधिक जानकारी हेतु इस लिंक पर जाये...
आप भी अपनी काव्यमयी प्रस्तुति आज ही मुझे भेज दे....
मेरा ईमेल है :-satyamshivam95@gmail.com

अब शुरु करते है,आज की शनिवासरीय चर्चा....
सर्वप्रथम कविताओं से महकी अपनी क्यारी....
*काव्य-रस*
1.)यशवंत माथुर जी के "जो मेरा मन कहे" पर
2.)"वटवृक्ष" पर रजनीश तिवारी जी के
3.)स्वराज्य करुण जी के "मेरे दिल की बात" पर
4.)मेरी "काव्य कल्पना" पर 
5.)आशा जी की "अकांक्षा" को
6.)संगीता स्वरुप जी की "गीत....मेरी अनुभूतियाँ" पर देखे
7.)वंदना गुप्ता जी "एक प्रयास" पे
8.)शिखा कौशिक जी के "नन्हे फरिश्तों के लिए;हम तो हर पल जिए:" पर
9.)आलोकिता जी को "देखिये एक नजर इधर भी" 
10.)मनोज कुमार जी के "विचार"
11.)शाहिद मिर्जा शाहिद जी के "जज्बात"
12.)कुश्वंश जी के "अनुभूतियों का आकाश" पर 
मुझे भूल ही जाओ
13.)अमित चंद्रा जी के "एहसास...." ने बनाया
14.)आरती जी की "चाहत" 
15.)बाबुषा जी के "कुछ पन्ने...." पर
16.)"मुशायरा:::नॉन-स्टॉप" पर 
17.)"मधुरमित्र....नीलकमल" पर
18.)"साहित्य प्रेमी संघ" पर मदन मोहन बहेती 'घोटू' के द्वारा
19.)संजय भास्कर जी प्रस्तुत कर रहे है "श्याम कोरी उदय जी" की रचना 
20.)नीलांश की प्रस्तुति....
21.)"दीप्ति शर्मा" जी की रचना
22.)माहेश्वरी कनेरी जी की "अभिव्यंजना" पर
23.)सुनील कुमार जी की "दिल की बातें" पर
24.)उदय वीर सिंह जी के "उन्नयन" पर
25.)ॠचा जी के "लम्हों के झरोखे से....." 
26.)"स्वप्न मेरे......" से दिगम्बर नासवा जी कहते है
अब कुछ उम्दा लेखों वाली पोस्ट....
*गद्य-रस*
27.)अमित श्रीवास्तव जी "बस यूँ ही"
28.)"उड़न तश्तरी"  समीर लाल जी कहते है
29.)"काव्य मंजूषा" पर अदा जी पूछती है
30.)"मनोज" पर आचार्य परशुराम राय जी का लेख
31.)"मिसफिट:सीधीबात" पर गिरीश मुकुल जी बता रहे है
32.)मेरी "गद्य सर्जना" पर
33.)"हिंदी ब्लॉगर्स फ़ोरम" पर महेश बारमाटे "माही" जी बता रहे है
34.)पूजा उपाध्याय जी की "लहरें" पर
35.)"अजित गुप्ता का कोना" पर
36.)"दिल की बात" पर डॉ. अनुराग जी 
37.)"देशनामा" पर
38.)"राजभाषा हिन्दी" रंजना जी बता रही है
39.)ललित शर्मा जी के "ललित डाट काम" पर
अब लोट पोट होने की बारी....
*हास्य-रस*
40.)"रचनाकार" पर
41.)"हास्य फुहार" पर 
42.)"बामुलाहीजा" पर 
43.)"सृजन संसार" पर मनोज कुमार जी लाये है
कुछ जिह्वा स्वाद की कहानी.... 
*स्वाद-रस*
44.)"खाना मसाला" पर उर्मी चक्रवर्ती जी बना रही है
बाल कोणे की सैर....
*बाल-रस*
45.)"पाखी की दुनिया" में देखिये
अब कुछ तकनीकि जानकारी....
*तकनीक-रस*
46.)"Computer Duniya" पर मयंक भारद्वाज जी बता रहे है
47.)"Hindi Tech-तकनीक हिंदी में" पर आया
48.)"प्रेम रस" पर शाह नवाज जी बता रहे है
अंत में अवसान की ओर....
*अध्यात्म-रस*
50.)"सत्य की खोज...आत्मज्ञान" पर राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ जी कह रहे है
51.)"आज का राशि फल" पर संगीता पूरी जी से जानिये अपना भविष्य


चलते चलते...मेरी एक छोटी सी उपलब्धि पर नजर डालिये...


"२३ मई को हरियाणा के "सिटी किंग" अखबार में मेरे बारे में प्रकाशित.......
also available on e- पेपर .....www.citykingnews.com"

चलिए पूरी हुई आज की चर्चा,आप सब आज की चर्चा का आनंद लीजिये.....साथ ही "स्पेशल काव्यमयी चर्चा" के लिए अपने पोस्ट भेजना मत भूलिए....

फिर मिलते है अगले शनिवार को,आपके विचारों के लिए प्रतीक्षारत रहूँगा.....धन्यवाद।
-----सत्यम शिवम-----

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