चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

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Wednesday, April 25, 2012

तीन फीसदी ब्लॉग पर, होती केवल मार : चर्चा-मंच 860



300 ब्लॉगों  के अनुसरण-कर्ता
 का आकलन 
बत्तिस प्रतिशत दर्द है, केवल दो उपचार 
तीन फीसदी ब्लॉग पर, होती केवल मार । 
होती केवल मार, रूठना गाली-गुप्ता ।
केवल प्रतिशत एक, ब्लॉग पर पाठक हँसता
दर्शन धर्म अतीत, यात्रा नीति सिखाती
दो प्रतिशत ये ब्लॉग, साठ पर साढ़े-साती ।।


अपनी कमली बना लो ना मुझे भी

जरूर राधा ने मोहिनी डारी है तभी छवि तुम्हारी इतनी मतवाली है जो भी देखे मधुर छवि अपना आप भुलाता है ये राधे की महिमा न्यारी है जो तुम पर पडती भारी है तुम सुध बुध अपनी बिसरा देते हो जब राधा नैनन मे उलझते हो जैसी दशा तुम्हारी है मोहन बस वैसी ही दशा हमारी है घायल की गति घायल जाने अब तो समझो गिरधारी मै हूँ  

तुम्हारे साथ के
कुछ भीगे सावन
अब भी गीले पड़े हैं...
उम्र गुजर रही है
मगर होंठ
अब भी सिले पड़े हैं..............


एक असामान्य प्रसव :जब मुरगी ने सीधे- सीधे चूजा पैदा किया

एक असामान्य प्रसव :जब मुरगी ने सीधे- सीधे चूजा पैदा किया   केन्द्रीय श्री लंका के एक मुर्गी खाने में इस विचित्र प्रसव की घटना सामने आई है . जिसमें जननांग मार्ग से अंडे की जगह चूजा ही सीधे -सीधे बाहर आया . वेटनरी सर्जन (पशु शल्य चिकित्सा के माहिर ) पी आर यापा इस प्रसव के चश्मदीद गवाह बने .आप वेल्मिदा टाउन के वेटनरी इंचार्ज हैं

घर के ज़रूरी लेकिन अरुचिकर रोजमर्रा के साधारण कामों में उलझे रहना अल्जाइमर्स से बचाए रह सकता है .खाना बनाना ,रसोई करना ,बर्तन भांडे साफ़ करना रसोई की साफ़ सफाई रखना उम्र दराज़ ८० साला और इससे भी ज्यादा उम्रदराज़ लोगों के लिए अल्जाइमर्स रोग के खतरे के वजन को कम कर सकता है एक नवीन अध्ययन ने यही दावा प्रस्तुत किया है . 




धूप मेरे हाथ से जब से फिसल गई 
जिंदगी से रौशनी उस दिन निकल गई  

लोग हैं मसरूफ अंदाजा नहीं रहा   
 चुटकले मस्ती ठिठोली फिर हजल गई    


दिनेश की टिप्पणी - आपका लिंक

खुद अपने आप से है बेखबर...हमलोग!

डा. अरुणा कपूर
जिम्मेदारी के तले, ऐसे गए दबाय ।
बेसुध की यह बेखुदी, कर ना पाई हाय ।

कर ना पाई हाय, गधे सा खटता रहता ।
उनको रहा सराह, उन्हीं की गाथा कहता ।

खुद को ले पहचान, होय खुद का आभारी ।
कर खुद की तारीफ़,  उठा ले जिम्मेदारी ।।

आभार: Thank you :)


 
कहाँ लिखूं मैं क्या कहूँ , बस कहती आभार ।
नहीं समझ पाई खता, क्यूँ बदला व्यवहार ।।  

आहा मेरा पेड़

Sushil Kumar Joshi at "उल्लूक टाईम्स "
भाई-चारा देख के, चारा भी निर्भीक ।
मीनारों के शहर से, जंगल दिखता नीक ।।

"दोहे-काहे का अभिमान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
 जीवन सूत्रों को रहे, गुरुवर मस्त पिरोय ।
करे आचरण आज से, बुद्धिमान जो होय ।।

यह बाग़ मेरे प्यार का !

  राजेन्द्र स्वर्णकार 

वागा होय विवेक की,  हो माँ का आशीष ।
गति गौरवमय सर्वदा, वैभव सह अवनीश ।।

रेशम निकिता हर्षिता, अलंकार  से साज ।
 दिव्यांशी सा दिव्य यह, राजा रानी राज ।।

अंतिम इच्छा



वाह वाह बस वाह है, नहीं आह का काम ।
सीधी साधी चाह है, निश्चित जब अंजाम ।
 निश्चित जब अंजाम, तयारी पूरी कर लूँ ।
छपा रखे है कार्ड, सही से तिथि को भर लूँ ।
पक्का न्यौता मान, मगर निकले न आंसू ।
मुखड़े पर मुस्कान, जनाजा निकले धांसू ।।

पेड़ बनाम आदमी


भाव सार्थक गीत के, आवश्यक सन्देश ।
खुद को सीमित मत करो, चिंतामय परिवेश ।
चिंतामय परिवेश, खोल ले मन की खिड़की ।
जो थोड़ा सा शेष,  सुनो उसकी यह झिड़की ।
उत्साही राजेश, साधिये हित जो व्यापक ।
बगिया वृक्ष सहेज, तभी ये भाव सार्थक ।।

बैठे बैठे... फल पाऊंगा .. अमां क्या कहती हो...


मैं ही बदल जाऊँगा... अमां क्या कहती हो ...
नए रंग ढल जाऊंगा.. अमां क्या कहती हो.....

गोया एक तनहा ही तो नहीं मैं रंज-ओ-ग़म का मारा....
फिर मैं ही ऐसे मर जाऊंगा... अमां क्या कहती हो...

आलोक मेहता... 


विमल चन्द्र पाण्डेय की कहानी

*आज प्रस्तुत है कवि-कथाकार विमल चन्द्र पाण्डेय की कहानी 'खून भरी मांग'. इन दिनों लमही के कहानी विशेषांक में प्रकाशित विमल की कहानी "उत्तर प्रदेश की खिड़की" अपने अनूठे शिल्प, कथ्य और काव्यात्मक भाषा के चलते चर्चा में है. भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित उनके कहानी-संग्रह 'डर' को ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार प्राप्त हो चुका है. * * *खून भरी मांग : विमल चन्द्र पाण्डेय * उनकी आंखों में जो मुझे दिखायी देता था वह फिर मुझे कभी और कहीं नहीं दिखा। उसकी परिभाषा देना मुश्किल है लेकिन उन्हें समझना कतई मुश्किल नहीं था।

तेरी तस्वीर...

...कल उंगली से रेत पर तेरी तस्वीर बनाई मैंने... .....एक लहर आई अपने साथ ले गई.. ....फिर क्या था हर तरफ, हर जगह बस तुम ही तुम... .....समंदर में तुम उमस में तुम बादलों में तुम बारिश की बूंदों में तुम हर फूटती कोंपल में तुम ताज़ी हवाओं में तुम साँसों में तुम.......... ...आज तुम ही हो जो मुझ को जिंदा रखे हो... हर शै को जिंदा रखे हो... ज़िन्दगी को जिंदा रखे हो... ...कल उंगली से रेत पर तेरी तस्वीर क्या बना दी मैंने.

जनकवि कोदूराम “दलित” 
  कपूत
दाई  -  ददा   रहयँ   तभो  , मेंछा  ला  मुड़वायँ
लायँ  पठौनी अउर उन  डउकी के बन जायँ
डउकी  के  बन  जायँ  , ददा - दाई  नइ भावयँ
छोड़-छाँड़ के उन्हला, अलग पकावयँ-खावयँ
धरम  -  करम सब भूल जायँ भकला मन भाई
बनयँ  ददा  -  दाई   बर   ये    कपूत   दुखदाई.


जनकवि कोदूराम “दलित”
गोरस   काली   गैया   का   अच्छा   होता है
पूजन   काली   मैया     का   अच्छा  होता है
काले    की खूबियाँ   विशेष  जानना  चाहो
तो  चाणक्य-चरित्र  एक  बार  पढ़  जाओ

फेरकर चल दिये मुँह, वह था बेख़ता यारों!
आईना अब भी देखता है रास्ता यारों!!


नहीं ग़रज़ भी रही और भी है वक़्ते-फ़िराक़,
हो तो क्यूँ कर के हो 'ग़ाफ़िल' से वास्ता यारों?

"स्पॉण्डिलाइटिस" में बरतें सावधानी

सरवाइकल या गर्दन वाले भाग में कशेरूक के दो भाग होते हैं, एक मुख्य खंड और इसके पीछे तंत्रिका चाप। मुख्य खंड हड्डी का बना सिलेंडर होता है जो पास वाली हड्डियों के सिलिंडर से स्डिक द्वारा अलग होता है। ये डिस्क कार्टिलेज की बनी परतें होती हैं जो कुशन की तरह काम करती हैं और गति में सहायक होती हैं। इस डिस्क का अपक्षय होता है। यह डिस्क टूटकर बाहर निकल जाती है और बराबर वाली कशेरुक पर एक अतिरिक्त बोझ बन जाती है।

पेशे और देश से ग़ददारी है डाक्टर का विदेश भाग जाना

 
जबकि अपने देश में लोग इलाज की कमी से मर रहे हों. देश में 7 लाख डाक्टरों की कमी है. लोग मर रहे हैं मगर डाक्टर विदेश में चले जाते हैं. एक एमबीबीएस डाक्टर की पढ़ाई में एम्स में 1.50 करोड़ रूपये का ख़र्च आता है. सरकार फ़ीस की शक्ल में सिर्फ़ 1 लाख रूपया ही वसूलती है. 12 से 15 हज़ार डाक्टर स्टडी लीव लेकर अमरीका वग़ैरह में मुनाफ़ा कमा रहे हैं. इनसे भी ज़्यादा वे डाक्टर हैं जो सरकारी नौकरी में जाए बिना सीधे ही विदेश निकल लेते हैं. इनमें से कुछ तो विदेश में बैठकर राष्ट्रवाद की डींगें भी मारते हैं मगर अपनी सेवाएं देने के लिए अपने ही देस वापस नहीं आते. राष्ट्र बीमार हो तो हो, भारत माता की संत...

कुछ ऐसा आज हुआ यारो
पग जहाँ उठे,रंग बरस उठें 
कुछ ऐसा रंग चढ़ा मन पर , 
हम जहाँ उठे, सब झूम उठे 
कुछ मौसम ने अंगडाई ली, गुलमोहर ने रंग बरसाए !
कुछ यार हमारे आ बैठे , महफ़िल में सुर झंकार उठे  !



गंगा चित्र

कोई पूरब से आता है, कोई आता पश्चिम से......... धुलते हैं सब पाप उसी के, जो होते मन के चंगे हर गंगे, हर हर गंगे।

"होगा जहाँ मुनाफा उस ओर जा मिलेंगे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

इन्साफ की डगर पर, नेता नही चलेंगे।
होगा जहाँ मुनाफा, उस ओर जा मिलेंगे।।
दिल में घुसा हुआ है,
दल-दल दलों का जमघट।
संसद में फिल्म जैसा,
होता है खूब झंझट।
फिर रात-रात भर में, आपस में गुल खिलेंगे।

जहां रहता हूँ मैं वहाँ कुछ ही वर्षों में कट गए हरे पेड़.
उग आये हैं अब नए - नए पेड़, बाग़, उपवन और बगीचे.


सजीव लताओं के नहीं, पत्थरों कक्रित, मौरंग सीमेंट के. 
यहाँ हरियाली भी है क्योकि लोगों ने पुतवा रखीं हैं दीवारें.

हनुमान लीला भाग-4

  मनसा वाचा कर्मणा
हनुमान जी का चरित्र अति सुन्दर,निर्विवाद और शिक्षाप्रद है, उन्ही के चरित्र की प्रधानता श्रीरामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड में सर्वत्र हुई है. सुन्दरकाण्ड का पाठ अधिकतर मानस प्रेमी घर घर में करते-कराते हैं.परन्तु ,सुन्दरकाण्ड के मर्म का चिंतन न कर केवल उसका पाठ  यांत्रिक रूप से कर लेने से हमें  वास्तविक  उपलब्धि नहीं हो पाती है जो कि होनी चाहिये.

रामायण  केवल कथा ही नहीं है.इसमें कर्म रुपी यमुना,भक्ति रुपी गंगा और तत्व दर्शन रुपी सरस्वती का अदभुत और अनुपम संगम विराजमान  है. आईये इस् पोस्ट में भी हम हनुमान लीला का  रसपान करने हेतु  श्रीरामचरितमानस के सुन्दरकाण्ड का तात्विक अन्वेषण करने का कुछ प्रयत्न करते हैं.


22 comments:






  1. परम आदरणीय रविकर जी
    प्रणाम !
    चर्चामंच में मेरी ताज़ा प्रविष्टि सम्मिलित करने के लिए आभारी हूं …
    आपके आशीर्वचन से मेरा परिवार धन्य हो गया …
    सबकी ओर से आपको बहुत बहुत धन्यवाद !

    चर्चामंच के विशिष्ट पाठकों को मेरी इस घरेलू प्रविष्टि पर आने का सस्नेह आमंत्रण है…

    शुभकामनाओं-मंगलकामनाओं सहित…
    -राजेन्द्र स्वर्णकार

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  2. अब आया समझ में कुछ
    कल क्यों नजर नहीं आ रहे थे
    कबिरा को बाजार में खड़ा कर
    मुर्गी से सीधे चूजा निकलवा रहे थे
    अच्छा काम करना हो तो
    ध्यान तो लगाना ही पड़ता है
    सुंदर बनी हो चीज तो
    लोगों की नजर लगने से
    भी तो बचाना पड़ता है
    उल्लू इसीलिये जरूरी एक
    सामने से लगाना ही पड़ता है

    आभार !!

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  3. सुन्दर भावनामयी और बहुआयामी रचनाओं का सुगन्धित गुलदस्ता,समस्याओं से रोबरू और गुदगुदाने वाले बोल भी समीलित. भरपूर परिक चित्र देखकर संतोष हुआ की चलो आज भी यह परंपरा अभी अपनी शान से जीवन गुजार रही है. आभार मेरी रचना को स्थान देने के लिए. .

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  4. रोचक और रंगभरी चर्चा..

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  5. उपवन का माली रविकर जैसा हो तो सुन्दर पुष्प खिलने तो अवश्यम्भावी ही हैं। आपकी चहकती-महकती और सतरंगी चर्चा मन को बहुत लुभाती है।
    आभार....!

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  6. होती है श्रम-साधना , तभी निखरते रंग
    कर्म यदि निस्वार्थ हो,किस्मत देती संग
    किस्मत देती संग ,साधना व्यर्थ न जाये
    होता कभी विलम्ब, किंतु ये रंग दिखाये
    श्रम-सीकर अनमोल ,यही हैं सच्चे मोती
    वहीं निखरते रंग, जहँ श्रम-साधना होती.

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  7. बेहतरीन सतरंगी चर्चा,....

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  8. बहुत सुन्दर लिंक्स संजोये हैं।

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  9. बहुत ही अच्‍छे लिंक्‍स का संयोजन किया है आपने ...आभार ।

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  10. कुछ अलग से लिंक्स भी मिले ..आभार.

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  11. आपने चुन चुन कर लिंक परोसे है रवि जी!...बहुत अच्छा लग रहा है!...सभी बहुत सुन्दर है!...मेरी प्रविष्टी आपको पसंद आ गई....धन्यवाद,आभार!

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  12. सर्वश्रेष्ट का ही चयन किया गया है लिंकों में तकरीबन सभी पढ़ें हैं टिप्पणियो भी की हैं .बधाई .

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  13. सुन्दर लिंक्स आभार....!

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  14. आभार रविकर भाई। आप कुछ भी करें,सुखद है।

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  15. बढ़िया लिंक्स के साथ सार्थक चर्चा प्रस्तुति हेतु आभार!

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  16. बहुत अछे लिनक्स ... कोशिश करुँगी सब पर हज़ारी लगाने की .. मेरी रचना अपनी चर्चा में शामिल करने के लिए शुक्रिया ...

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  17. कई काम के लिंक मिले।

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  18. हमेशा की तरह सार्थक चर्चा! बहुत-बहुत आभार रविकर भाई!!

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