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Saturday, March 31, 2012

"सच्चाई का दमन" (चर्चा मंच-835)

मित्रों!
मैंने वादा किया था कि शनिवार को कुछ लिंकों के साथ आपसे रूबरू हूँगा। पेश-ए-खिदमत हैं कुछ लिंक!
कल फिर किसी चट्टान को फोड़ने की कोशिश होगी * *कल फिर किसी ईमान को निचोड़ने की कोशिश होगी * *सूरज तो दिन में हर रोज की तरह दमकेगा लेकिन सच्चाई का दमन तो होता ही रहेगा। मैं हूँ आईना. तुम्हारे.......* *कल,आज और कल का* *जिसमें तुम्हें नज़र आएगा* *अपना बीता हुआ कल* *साथ ही उससे जुडी स्मृतियाँ....। आना जितना आसान रहा... क्या जाना भी आसान ?प्रिये ! कुछ बात मेरी भी मान प्रिये ! तुम प्रकृति नटी से लगती हो इन बासन्ती परिधानों में....! सुन्दर दोहे रच रहे, रविकर जैसे मित्र। अनुशंसा की रीत भी, होती बहुत विचित्र।।.... रिश्ते रिसियाते रहे, हिरदय हाट बिकाय लोकिन आपके लिए है-विशिष्ट आमंत्रण...!अभिव्यंजना में देखिए- कुछ श्रणिकाएँ!... १ लोगों को पहले हाथ जोड़ कर, रिश्ते जोड़ते देखा है, फिर दिल जीतकर उनका, विश्वास तोड़ते देखा है....। क्योंकि..."मोहन के बापू का हाथ ज़रा तंग है "....! शाम-ऐ- तन्हाई में . हमको तुम्हारी याद आती हे, तेरे प्यार की बाते हमे अब तक रुलाती हे, तुन गई तो जीस्त के सब लुत्फ़ चले गए ,ख़ाक मेरे बदन की अब हवा उडाती है....! राजेश उत्साही के ब्लाग गुल्लक पर देखिये भवानी प्रसाद मिश्र की तीन कविताएं...! बस एक ही मन्त्र है । सुखी एवं खुश रहने का मूल मन्त्र - कभी किसी से कोई अपेक्षा मत रखिये। अपेक्षाएं कभी पूरी नहीं होतीं। पूरी ना हो पाने की अवस्था में मन को दुखी एवं अवसादित करती हैं....। पानी रे पानी - रहीम खानखाना लिख कर गए हैं, "रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून. पानी बिना ना ऊबरे मोती, मानस, चून." ....! बेचारा मत्ला!!! - समस्या पूर्ति- वक़्त है लिक्खूँ मगर लिक्खूँ भी क्या? वक़्ते-गर्दिश के जुनूँ का ख़ामिजा?..... वक्र मुखी सांसदों का दुस्साहस .वक्र मुखी सांसदों का दुस्साहस . ये वक्र मुखी सांसद कभी किसी राज्यपाल को बूढी गाय कहकर तो कभी राष्ट्रपति की संविधानिक....! घर की सफाई करते कूड़े़ को भी उलट-पुलट देख लेता हूं कई बार.. बिना जांचे-परखे कूड़ेदान में फेंकने का मलाल रह जाता है जीवनभर..जीवन का कूड़ेदान....! बदलते मौसम में हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है, जिससे बीमारियों का हमला शुरू हो जाता है। लेकिन अगर आप अपनी इस क्षमता को थोड़ा मजबूत कर लें तो ..खान-पान और प्रतिरोधक क्षमता .! रिश्‍तों में एक खुशबू होती है, बस उसे मुठ्ठी में भरने की जरूरत है ....रचना को जन्मदिन की बधाई व शुभकामनाएं --- *‘ हमारी फ़ितरत ही ऐसी है कि* *एक जैसी ठहर नही पाती है * * हर नये दिन के साथ वो भी बदल जाती है!’...तुझे उम्मीदे वफ़ा हो..... - * * * * * * *यूँ खेलते हैं मेरे दिल से जो, वो क्या जाने...* *गर मेरा दिल बुझा तो फिर न जला पाऊँगी ! सौम्य भारत में सोमालिया रहता है , ओढ़ता,पहनता, बिछाता है दर्द ,सहता है ....! झुर्रियों पर सिंगार अच्छा नहीं लगता हर वक़्त त्यौहार अच्छा नहीं लगता। रूठना तो बड़ा अच्छा लगता है उनका गुस्सा बार बार का अच्छा नहीं लगता। ....गांधी की बात गोड़से का काम .... - आज बिना किसी भूमिका के कुछ सीधी सपाट बातें करना चाहता हूं। पहले मैं आपको बता दूं कि मैं भी चाहता हूं कि संसद में साफ सुथरी छवि के लोग आएं।....जो भी आगे कदम बढ़ायेंगे। फासलों को वही मिटायेंगे।। तुम हमें याद करोगे जब भी, हम बिना पंख उड़ के आयेंगे। यही हसरत तो मुद्दतों से है, हम तुम्हें हाल-ए-दिल सुनायेंगे... ! रामनवमी के उपलक्ष्य में माँ की एक उत्कृष्ट रचना आपने सामने प्रस्तुत करने जा रही हूँ ! आशा है आपको उनकी यह रचना अवश्य पसंद आयेगी ...! बन्दर बाँट - दो बिल्ली एक राह जा रहीं नजर आयी उनको एक रोटी. आपस में वे लगीं थी लड़ने, पहले देखी मैंने यह रोटी. कोई फैसला हुआ न उनमें, उसी समय एक बन्दर आया.....! बातें खुद से - आगाज भी होगा अंजाम भी होगा नाम उसी का गूंजेगा गुमनाम जो होगा ....... अस्तित्व बचाना खुद का सीमा मिट न पाए करीब किसी के इतना भी न होना कि.....? सात चिरंजीवियों में से एक हैं परशुराम - परशुराम भार्गव वंशी महर्षि जमदग्नि के पांच पुत्रों में सबसे छोटे थे। इनकी माता कामली रेणुका इक्ष्वाकु वंशी राजा की पुत्री थीं। इनका नाम ‘राम’ था........।
"उल्लूक टाईम्स " देखता है क्या - कोई कुछ देखता है कोई कुछ देखता है कोई कुछ भी कभी यहाँ नहीं देखता है तू जहर देखता है वो शहर देखता है बैचेनी तुम्हारी कोई बेखबर देखता है....! कर्म की बाती,ज्ञान का घृत हो,प्रीति के दीप जलाओ...* लो आज छेड़ ही देते हैं.......! सपने क्या हैं? सपने खिलोने होते है, थोड़ी सी देर खेल लो, फिर टूट जाते हैं,आँखों के खुलने पर सपने पीडायें है, दबी घुटन है मन की....! तखने जीयब शान सँ - समय के सँग सँग डेग बढ़ाबी तखने जीयब शान सँ ऊपर सँ किछु रोज कमाबी तखने जीयब शान सँ काका, काकी, पिसा, पिसी अछि सम्बन्ध पुरान यौ हुनका सब केँ दूर भगाबी तखने जी...! आज सुबह दरवाजे की घंटी बजी। द्वार खोल कर देखा तो पांच से दस साल की चार-पांच बच्चियां लाल रंग के कपड़े पहने खड़ी थीं। छूटते ही उनमें सबसे बड़ी लड़की ने ..... अंकल, कन्या खिलाओगे'? *मुक्त परीक्षा से होकर,* *हम अपने घर में आये।* *हमें देखकर दादा-दादी, * *फूले नहीं समाये।।* ** *लगा हुआ था काशीपुर में,* *बाल सुन्दरी माँ का मेला...फूले नहीं समाये" ....! निर्झर के निर्मल जल-सी मैं .. कभी चंचल, कभी मतवाली मैं .. कभी गरजती बिज़ली -सी मैं ...मैं की परिभाषा .... कभी बरसती बदरी -सी मैं ..... कभी सलोनी मुस्कान-सी मैं ...! मुक्ति बंधन सुनो आदम! युगों से बंधी बेड़ियों से बंधन मुक्ति के लिए मैंने जब भी आवाज उठायी ..! चाहत - तुझे चाहा है तेरी ही पूजा की है इसके सिवा न है तलाश कोई न है चाहत मेरी । तेरी तलाश तू ही मेरी चाहत मेरा जीवन अर्पित है तुझको तुझ बिन मैं नहीं । * * * * *सुना है तुम सभ्य हो.. -हिन्दुस्तान की समस्या यह नहीं है कि हम क्या करते हैं? जो हम करते हैं वह मानव स्वभाव है, वो कोई समस्या नहीं.. सारी दुनिया वही करती है मगर समस्या यह है कि ...नकल का अधिकार - 'भैया, पास न भयेन तो बप्पा बहुतै मारी' अर्थ था कि भैया, यदि परीक्षा में पास न हो पाये तो पिताजी बहुत पिटायी करेंगे। “क्रोध पर नियंत्रण” प्रोग्राम को चलाईए अपने सिस्टम पर तेज - कुछ ट्रिक और टिप्स -पिछले अध्याय में पाठकों नें कहा कि क्रोध बुरी बला है किन्तु इस पर नियंत्रण नही चलता। ‘क्रोध पर नियंत्रण’ एक जटिल और हैवी सॉफ्ट्वेयर है जिसे आपके सिस्टम पर...! मौसमके उपहार ... प्रीति -डोर में हमें बाँधने को आया मौसम |
बिखरे रिश्ते, इन्हें साधने को आया मौसम||

मर्मस्पर्शी रचनाओं का संकलन है*** *“**कर्मनाशा**”* * **लगभग दो माह पूर्व डॉ. सिद्धेश्वर सिंह द्वारा रचित मुझे एक कविता संग्रह मिला जिसका नाम था कर्मनाशा...!
अब देखिए ये शानदार कार्टून!
ITNI SI BAAT

Friday, March 30, 2012

अत्यधिक समझदार और कुछ लातों के भूत : चर्चा-मंच 834


 (१-A)


संध्या शर्मा का नमस्कार... यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम, लोचनाभ्याम विहीनस्य दर्पणा: किम करिष्यति……। तुलसी इस संसार में भांति भांति के लोग……… तुलसी बाबा 500 बरस पहले लिख गए थे। इन भांति भांति के लोगों में कुछ समझदार, कुछ अत्यधिक समझदार और कुछ लातों के भूत होते हैं। लातों के भूत वो होते हैं जिन्हे कई बार समझाने से समझ नहीं आता। मूर्ख अपने को समझदार मानता है, और समझदार उसे मूर्ख ।  

 (१-B)

  विद्वान पाठक गण !!

  तुलसी के / पर  प्रस्तुत दोहे का क्या कोई और अर्थ निकल सकता है  ??

कृपया अवगत कराएँ ।।

छंद दिखे छल-छंद जब, संध्या जनित प्रभाव। 

दृष्ट जलन्धर की गई, तुलसी प्रति दुर्भाव ||

भावार्थ: माता तुलसी के छंद = रंग-ढंग ( भगवान् विष्णु को प्रसन्न करने की रीति) को जलंधर सायंकाल के बढ़ते अंधियारे की वजह से (रतौंधी = मतान्ध ) दृष्टि-हीन होकर (भगवान् को नहीं पहचान पाता) कपट और छल समझ लेता है एवं  तुलसी माता के प्रति अपना दुर्भाव प्रदर्शित करता है ।।

 (२-A)

दाही दायम दायरा, दुःख दाई दनु दित्य ।
कच्चा जाता है चबा , चार बार यह नित्य ।


चार बार यह नित्य, रात में ताकत बढती ।
तन्हाई निज- कृत्य, रोज सिर पर जा चढती ।

इष्ट-मित्र घर दूर, महानगरों की *हाही ।
कभी न होती पूर, दायरा **दायम दाही ।।
*जरुरत **हमेशा

B

गायत्री मंत्र रहस्य भाग 3 The mystery of Gayatri Mantra 3

 इस लेख का पिछला भाग यहां पढ़ें-
http://vedquran.blogspot.in/2012/03/3-mystery-of-gayatri-mantra-3.html

टंगड़ी मारे दुष्ट जन, सज्जन गिर गिर जाय ।
विद्वानों की बात को, दो दद्दा विसराय ।

 दो दद्दा विसराय,  आस्था पर मत देना ।
रविकर नहीं सुहाय, नाव बालू में खेना ।

मिले सुफल मन दुग्ध, गाय हो चाहे लंगड़ी । 
वन्दनीय अति शुद्ध, मार ना "सर-मा" टंगड़ी ।।   
  my dreams 'n' expressions..याने मेरे दिल से सीधा कनेक्शन..

काश यही आकाश का, एकाकी एहसास ।
बरसे स्वाती बूंद सा, बुझे पपीहा प्यास ।।



  नीला अम्बर - 

दो सौ का यह आँकड़ा, मात्र आँकड़ा नाय ।
 अथक कड़ा यह आपका, श्रम नियमन बतलाय । 


श्रम नियमन बतलाय, बधाई देता रविकर ।
कविता आँसू भाव, बहाए है जो मनभर ।

बना सितारे टांक, रहा यह नीला-अम्बर ।
रहा ताक अनुशील, निखारा जिसने तपकर ।।

रेंगे वक्षस्थल  कीड़ा ।
क्या गैर उठाएगा बीड़ा ?
मजा गुदगुदी जो लेता-
सहे वही दंशी पीड़ा ।
  नारद
नारद तो बदनाम है, लगा लगा के चून ।
रंगा-बिल्ला खुब बचे, होत व्यर्थ दातून ।

होत व्यर्थ दातून, मगर हमने मुँह धोया ।
टांग वायलिन खूब, गीत-संगीत डुबोया ।
तपता रेगिस्तान, हरेरी  दिखी मदारी ।
दोस्त खींचते टांग, ताकता रहा करारी ।।
   जो मेरा मन कहे -

अंत सुनिश्चित देह का, कहते श्री यशवंत ।
अजर-अमर है आत्मा, ग्यानी गीता संत ।।

(३)
कोई सर मुड़ा कर नाई की दुकान से निकला ही हो और आसमान से ओले गिरने लगे हों ऐसा छप्पन साल की जिन्दगी में न तो सुना और न ही अखबार में पढ़ा। इस से पहले की किताब में भी इस तरह की किसी घटना का उल्लेख नहीं द...


 (४)

  बस्तर की अभिव्यक्ति -जैसे कोई झरना....

नदी के किनारे
यह कहकर
कि वे कभी नहीं मिलते
लोगों ने उतार दिया उन्हें
खलनायक की भूमिका में।
वे निभाते रहे.....  
अपनी भूमिका का चरित्र
बिना किसी परिवाद के
और नदी
बहती रही।
एक दिन लोगों ने देखा
किनारे एक हो गये हैं
पर नदी
अब वहाँ कहीं नहीं थी। 


(५)
  डा. श्याम गुप्त 
* * * * * * * ’ इन्द्रधनुष’* ------ स्त्री-पुरुष विमर्श पर एक नवीन दृष्टि प्रदायक उपन्यास ....*पिछले अंक सात से क्रमश:...*... ...


(६)
गांधी और गांधीवाद-105
धार्मिक जिज्ञासा
GhandiZarz12

मनोज 
गांधी जी की जहां एक ओर आत्मा के आंतरिक जीवन के प्रति उत्सुकता बनी रहती थी, वहीं दूसरी ओर वे शारीर की उचित देखभाल के प्रति भी काफ़ी जिज्ञासु थे। जब हम थोड़ा गहरे जाकर उनको समझने का प्रयत्न करते हैं तो पाते हैं कि उनकी चाहे जो भी व्यावसायिक और राजनीतिक प्रतिबद्धताएं रही हों, नैतिक नियमों के अनुरूप कर्म करना और स्वास्थ्य या प्रकृति के नियमों के अनुसार जीवन जीने के उनके विचार को सत्य की खोज के अंगों के रूप में ही देखा जा सकता है।


(७)
पल - पल ,
बीतते वक़्त के साथ 
बीत जाते हैं 
हम भी ,


(८)

"कालजयी रचना कहाँ?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


लुप्त हुआ है काव्य का, नभ में सूरज आज।
बिनाछन्द रचना रचें, ज्यादातर कविराज।१।

जिसमें हो कुछ गेयताकाव्य उसी का नाम।
रबड़छंद का काव्य में, बोलो क्या है काम।२।

अनुच्छेद में बाँटिए, कैसा भी आलेख।
छंदहीन इस काव्य का, रूप लीजिए देख।३।

चार लाइनों में मिलें, टिप्पणियाँ चालीस।
बिनाछंद के शान्त हों, मन की सारी टीस।४।


(९)

साक्षात्कार: वरिष्‍ठ जनगीतकार नचिकेता के साथ अवनीश सिंह चौहान की बातचीत

नचिकेता

क्रांति का बीज बोकर नया सवेरा लाने की चाह रखने वाले नचिकेता जी के गीतों में मजदूर-किसान और मेहनतकश इंसान की आवाज़ को जाना-समझा जा सकता है, शायद तभी वे कहते हैं- "हम मज़दूर-किसान चले, मेहनतकश इंसान चले / चीर अंधेरे को हम नया सवेरा लायेंगे ! / ताकत नई बटोर क्रान्ति के बीज उगायेंगे!" और यह सब वे कैसे करेंगे उसका संकेत भी देते हैं इसी गीत में- "श्रम की तुला उठाकर उत्पादन हम बाँटेंगे / शोषण और दमन की जड़ गहरे जा काटेंगे / करते लाल सलाम चले, देते यह पैग़ाम चले / समता और समन्वय का संसार बसायेंगे !"


(१०)

  लो क सं घ र्ष !
कारपोरेट एवं बैंकर्स फाउन्डेशन के सबसे बुद्धिमान एवं सर्वश्रेष्ठ पश्चिमी विचारकों ने सिफारिश की है कि विभिन्न देशों के संसाधनों, वित्त एवं राष्ट्रीय बजटों को नियंत्रित करने एवं उनके हाईड्रोकार्बन एवं खनिज पदार्थों को हड़पने का सबसे अच्छा तरीका युद्ध है। इसके माध्यम से वे अफगानिस्तान के नारकोटिक्स व्यापार को भी नियंत्रित कर रहे हैं जिससे प्राप्त आय को वे पश्चिमी बैंकों एवं प्रमुख आर्थिक संस्थाओं में जिनमें कि साख निर्गमन की सर्वाधिक शेयर होल्डिंग रखने वाली संस्थाएँ भी सम्मिलित हैं, लगाते हैं। 

(११)

रस्ता होवे पार, प्रभु उस नाव चढ़ाओ-

दिनेश की टिप्पणी - आपका लिंक 

कलम माँगती दान है, कान्हा दया दिखाव ।
ऋतु आई है दीजिये, नव पल्लव की छाँव ।

नव पल्लव की छाँव, ध्यान का  द्योतक पीपल।
फिर से गोकुल गाँव, पाँव हो जाएँ चंचल ।

छेड़ो बंशी तान, चुनरिया प्रीत उढ़ाओ ।
रस्ता होवे पार, प्रभु उस नाव चढ़ाओ ।।


B
 ram ram bhai 
दर्शन जीवन का लिए, गीता-गीत-सँदेश |
अगर कुरेदे दिन बुरे, बाढ़े रोग-कलेश |

बाढ़े रोग-कलेश, आज को जीते जाओ |
जीते रविकर रेस, भूत-भावी विसराओ |

मध्यम चिंता-मग्न, जान जोखिम में डाले | |
दोनों ग्यानी मूर्ख, करें मस्ती मत वाले |


C
  स्वास्थ्य-सबके लिए  
साँसत में न जान हो, रखो साँस महफूज  ।
सूजे ब्रोंकाइल नली, गए फेफड़े सूज ।

 गए फेफड़े सूज, चिलम बीडी दम हुक्का ।
प्राण वायु घट जाय, लगे गर्दन में धक्का ।

रंगे हाथ फँस जाय, करे या धूर्त सियासत ।
उलटी साँस भराय, भेज दे जब *घर-साँसत ।
* काल-कोठरी
अगर टिप्पणी अनर्गल लगे तो माफ़ करें ।








Thursday, March 29, 2012

ब्लैकमेलिंग (चर्चा - 833 )

आज की चर्चा में आप सबका हार्दिक स्वागत है 
नेट बार-बार डिस्कनेक्ट हो रहा है पता नहीं कितने लिंक दे पाऊँगा 
सीधे चलता हूँ चर्चा की ओर 

ब्लैकमेलिंग

मौसम ने ली है अंगडाई 

हाँ मैं कृष्ण ----

तिनके का दर्द
My Photo
बेटी बचाओ
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सूखा गुलाब

कुछ हाइगा 

नकल का अधिकार 
image
गीले नयन कोर 

तिब्बत की आग
excessive
अज्ञेय नहीं समीर 

वो रूठ जाते हैं बेवजह 

भूमिका 

अपना घर 

वोडाफोन का कुत्ता  

मैं की परिभाषा

ढंग से जुतियाओ  

ट्रिक और टिप्स 
मिशन लन्दन ओलंपिक हॉकी गोल्ड
हाकी का जूनून 

दादा-दादी फूले नहीं समाए 

गूगल क्रोम एवं नोट पैड 

फितरत 

मैं आकाश हूँ

कोइराला से रोका तक 


धन्यवाद 
दिलबाग विर्क 

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