चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

समर्थक

Friday, August 31, 2012

दूसरी सूची ; आप की पोस्ट यहाँ है क्या ? चर्चा मंच 988


टिप्पणी : यह चर्चा 23-8-2012 को लगाईं गई ।।

हास्यफुहार

तुम रूठा न करो मेरी जान निकल जाएगी

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बड़ा मस्त अंदाज है, सीधी साधी बात |
अट्ठाहास यह मुक्त है, मुफ्त मिली सौगात |

मुफ्त मिली सौगात, डाक्टर हों या भगवन |
करिए मत नाराज, कभी दोनों को श्रीमन |

भगवन गर नाराज, पड़े डाक्टर के द्वारे |

डाक्टर गर नाराज, हुए भगवन के प्यारे||

धन्य-धन्य भाग्य तेरे यदुरानी ,तुझको मेरा शत-शत नमन

यदुरानी तू धन्य है, धन्य हुआ गोपाल ।
दही-मथानी से रही, माखन प्रेम निकाल ।
माखन प्रेम निकाल, खाय के गया सकाले ।
ग्वालिन खड़ी निढाल, श्याम माखन जब खाले ।
जकड कृष्ण को लाय, पड़े  दो दही मथानी ।
बस नितम्ब सहलाय, हँसे गोपी यदुरानी ।।

खुद को बांधा है शब्‍दों के दायरे में - - संजय भास्कर

संजय भास्कर at आदत...मुस्कुराने की

बड़ा कठिन यह काम है , फिर भी साधूवाद |
करे जो अपना आकलन , वही बड़ा उस्ताद |


वही बड़ा उस्ताद, दाद देता है रविकर |
रच ले तू विंदास, कुशल से चले सफ़र पर |

मात-पिता आशीष, आपकी सुधी कामना |
हो जावे परिपूर्ण, सत्य का करो सामना ||

आए तुम याद मुझे --जिंदगी के ३६ साल बाद --






महत्वपूर्ण है जिंदगी, घर के दर-दीवार |
छत्तीस से विछुड़े मगर, अब तिरसठ सट प्यार |

अब तिरसठ सट प्यार, शिला पर लिखी कहानी |
वह खिडकी संसार,दिखाए डगर जवानी |

आठ साल की ज्येष्ठ, मगर पहला था चक्कर |
चल नाले में डाल, सुझाता है यह रविकर ||

जीने-मरने में क्या पड़ा है, पर कहने-सुनने...

यादें....ashok saluja .
यादें...  
यात्रा का मंचन सदा, किया करे बंगाल ।
मौत-जिंदगी हास्य-व्यंग, क्रमश: साँझ- विकाल ।

क्रमश: साँझ- विकाल, मस्त होकर सब झूमें।
देते व्यथा निकाल, दोस्त सब हर्षित घूमें ।

पर्दा गिरता अंत, बिछ्ड़ते  पात्र-पात्रा ।
पर चलती निर्बाध, मनोरंजक शुभ यात्रा  ।।

पहिये

देवेन्द्र पाण्डेय
बेचैन आत्मा

वैचारिक पहिये चले, सधा-संतुलित वेग |
प्रगट करें पहिये सही, ऊँह उनमद उद्वेग |

ऊँह उनमद उद्वेग, वेग बढ़ता ही जाए |
समय फिसलता तेज, मनुज भागे भरमाये |
 
बिन पहियों के सफ़र, करे कंधे  पर 
लंबा | 
 रहे न चक्कर शेष , कृपा कर देना अम्बा ||

"हमारे घर में रहते हैं, हमें चूना लगाते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सुन्दर प्रस्तुति आपकी, मनभावन उत्कृष्ट |
स्वीकारो शुभकामना, अति-रुचिकर है पृष्ट |

अति-रुचिकर है पृष्ट, सृष्ट की रीत पुरानी |
कहें गधे को बाप, नहीं यह गलत बयानी |
पर पाए संताप, नकारे गधा अगरचे |
करे आर्त आलाप, बुद्धि फिर नाहक खरचे || 

वर-माँ का मिल जाय तो, जीवन सुफल कहाय |
वर्मा जी की कवितई, दिल गहरे छू जाय |

दिल गहरे छू जाय, खाय के इन्नर मीठा |
रोप रहे हैं धान, चमकते बारिस दीठा |

बापू को इस बार, घुमाना दिल्ली भैया  |
बरधा जस हलकान, मिले तब कहीं रुपैया ||

जिद्दी सिलवटें

संगीता स्वरुप ( गीत )
सौ जी.बी. मेमोरियाँ, दस न होंय इरेज |
रोम-रैम में बाँट दे, कुछ ही कोरे पेज |
कुछ ही कोरे पेज, दाग कुछ अच्छे दीदी |
रखिये इन्हें सहेज, बढे इनसे उम्मीदी |
रविकर का यह ख्याल, किया जीवन में जैसा |
रखे साल दर साल, सही मेमोरी वैसा |

अच्छी नींद के लिए....

Kumar Radharaman
स्वास्थ्य
 बरसे धन-दौलत सकल, बचे नहीं घर ठौर |
नींद रूठ जाए विकल, हजम नहीं दो कौर |

हजम नहीं दो कौर, गौर करवाते भैया |
बड़े रोग का दौर, काम का नहीं रुपैया |

करिए नित व्यायाम, गर्म पानी से न्याहो |
मिले पूर्ण विश्राम, राधा-कृष्ण सराहो |।

 आज अमरीका भर में नेशनल 

veerubhai 
एकाधिक से यौनकर्म, ड्रग करते इंजेक्ट  ।
बाई-सेक्सुयल मैन गे, करिए इन्हें सेलेक्ट । 

करिए इन्हें सेलेक्ट, जांच करवाओ इनकी ।
केस यही परफेक्ट, जान जोखिम में जिनकी ।
एच. आई. वी. प्लस,  जागरूक बनो नागरिक ।
वफादार हो मित्र , नहीं संगी  एकाधिक ।

Untitled

 Roshi at Roshi 

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डालो बोरा फर्श पर, रखो क्रोध को *तोप |
डीप-फ्रिजर में जलन को, शीतलता से लोप |
*ढककर
शीतलता से लोप, कलेजा बिलकुल ठंडा |
पर ईर्ष्या बदनाम, खाय ले मुर्गा-अंडा |

दो जुलाब का घोल, ठीक से इसे संभालो |
पाहून ये बेइमान, विदा जल्दी कर डालो ||

गुलदस्ते में राष्ट्रपति..

ZEAL at ZEAL
 खरी खरी कहती रहे, खर खर यह खुर्रैट ।
दुष्ट-भेड़ियों से गले, मिलते चौबिस  रैट ।
मिलते चौबिस  रैट, यही दोषी है सच्चे ।
हो सामूहिक कत्ल, मरे जो बच्ची-बच्चे । 
ईश्वर करना माफ़, इन्हें यह नहीं पता है ।
 बुद्धी से कंगाल, हमारी बड़ी खता है ।।

सच कहो...

Amrita Tanmay

तन्मय होकर के सुनो, अट्ठारह अध्याय |
भेद खोलता हूँ सकल, रहे कृष्ण घबराय |
रहे कृष्ण घबराय, सीध अर्जुन को पाया |
बेचारा असहाय, बुद्धि से ख़ूब भरमाया |
एक एक करतूत, देखता जाए संजय |
गोपी जस असहाय, नहीं कृष्णा ये तन्मय ||

हगने हगने मे अंतर

Arunesh c dave at अष्टावक्र
सेंट्रलाइज ए सी लगे,  चकाचौंध से लैस ।
शौचालय में हग रहे, मंत्री करते ऐश ।
मंत्री करते ऐश, गोडसे नाम धरोगे ।
बापू वादी पैंट, बहुत सी गील करोगे 
रविकर एक सुझाव, अजादी दो हगने की ।
खाद बने या खेत, बात तो है लगने की ।।

आप मुड़ कर न देखते

नीरज गोस्वामी  

धीरे से अपनी कहे, नीरज रविकर-मित्र |
चींखे-चिल्लायें नहीं, खींचे रुचिकर चित्र |


खींचे रुचिकर चित्र, पलट कर ताके कोई |
हालत होय विचित्र, राम-जी सिय की सोई |


पर मैं का मद आज, कलेजा हम का चीरे |
कभी रहा था नाज, भूलता धीरे धीरे ||

हवन का ...प्रयोजन.....!!

Anupama Tripathi
anupama's sukrity.  

 वाह वाह अनुपम हवन, किन्तु प्रयोजन भूल ।
 आँख धुवें से त्रस्त है, फिर भी झोंके धूल ।

फिर भी झोंके धूल , मूल में अहम् संभारे ।
सुकृति का शुभ फूल, व्यर्थ ही ॐ उचारे ।

अहम् जलाए अग्नि, तभी तो बात बनेगी ।
आत्मा की पुरजोर, ईश से सदा छनेगी ।।

कमल का तालाब

देवेन्द्र पाण्डेय 
स्थानः काशी हिंदू विश्व विद्यालय समयः 25-06-2012 की सुबह फोटूग्राफरः देवेन्द्र पाण्डेय।
कमल-कुमुदनी से पटा, पानी पानी काम ।
घोंघे करते मस्तियाँ, मीन चुकाती दाम ।
मीन चुकाती दाम, बिगाड़े काई कीचड़ 
रहे फिसलते रोज, काईंया पापी लीचड़ ।
किन्तु विदेही पात, नहीं संलिप्त  हो रहे ।
भौरे की बारात, पतंगे धैर्य खो  रहे ।।

तारों की घर वापसी

तारे होते बेदखल, सूरज आँखे मूंद |
अद्वितीय अनुकल्पना, आंसू शबनम बूंद |

आंसू शबनम बूंद, सूर्य को तपना भाये |
किन्तु वियोगी चाँद, अकेला रह न पाए |

उतर धरा पर चाँद, इकट्ठा करे संभारे |
छूकर प्रभु के चरण, गगन पुनि चमकें तारे ||

Thursday, August 30, 2012

ओ काले मेघा ( चर्चा - 987 )

आज की चर्चा में आप सबका हार्दिक स्वागत है 
वर्षा का इन्तजार करते-करते किसान बेहाल था , बादल नहीं बरसे मगर अब दिल खोल कर बरस रहे हैं , यहाँ तक की वर्षा मांगने वाले किसानों के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभरने लगी हैं । किसान अब चाह रहा है कि बारिश थम जाए लेकिन ब्लॉग जगत में बर्षा की मीठी-मीठी फुहारों का आनन्द लिया जा रहा है । वर्षा विषय पर हिंदी हाइकु और त्रिवेणी ब्लॉग पर रचनाकारों ने रसभरी बारिश की है ।
त्रिवेणी पर हैं तांका 
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हिंदी हाइकु पर हाइकु 
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***
अब देखते हैं कुछ अन्य लिंक 
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प्रेम सरोवर 
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उच्चारण 
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राम राम भाई 
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अपना पंचू 
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चिन्तन 
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नव्या 
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जील 
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जिन्दगी एक खामोश सफर 
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बैसवारी 
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वर्षा सिंह 
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सुज्ञ
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समीक्षा 
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दिल की बातें 
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एहसास 
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उल्लूक टाइम 
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चुगली 
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बिसरती राहें 
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उन्नयन
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लोक संघर्ष 
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परिकल्पना 
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आकांक्षा 
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म्हारा हरयाणा 
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नीम-निम्बौरी 
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चला बिहारी ब्लोगर बनने 
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तकनीक दृष्ट 
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कासिद 
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मुशायरा 
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ग़ज़ल गंगा 
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आज के लिए बस इतना ही 
धन्यवाद 
**************

Wednesday, August 29, 2012

पहली सूची ; आप की पोस्ट यहाँ है क्या ? चर्चा मंच 986

टिप्पणी : यह चर्चा 20-8-2012 को लगाईं गई ।।


जहर बुझी बातें करें, जब प्राणान्तक चोट ।  
जहर-मोहरा पीस के, लूँ दारू संग घोट ।
लूँ दारू संग घोट, पोट न तुमको पाया।
मुझमे थी सब खोट, आज मै खूब अघाया ।
प्रश्न-पत्र सा ध्यान, लगाकर व्यर्थे ताका ।
हल्का जी हलकान, जाय घर-बाहर डांटा ।।  


BALAJI
 यात्री का परिवार जब,  कर स्वागत संतुष्ट ।
मेरा घर सोता मिले, बेगम मिलती रुष्ट ।
बेगम मिलती रुष्ट, नहीं टी टी की बेगम ।
बच्चे सब शैतान, हुई जाती वो बेदम ।
 नियमित गाली खाय, दिलाये निद्रा टेन्सन ।   
चार्ज-शीट है गिफ्ट,  मरे पर भोगे पेन्सन ।


रमिया का एक दिन.... (महिला दिवस के बहाने)


रमिया घर-बाहर खटे, मिया बजाएं ढाप ।
धर देती तन-मन जला, रहा निकम्मा ताप । 
रहा निकम्मा ताप, चढ़ा कर देशी बैठा |
रहा बदन को नाप, खोल कर धरै मुरैठा ।
पति परमेश्वर मान, ध्यान न देती कमियां।
लेकिन पति हैवान, बिछाती बिस्तर रमिया ।।


स्वास्थ्य-लाभ अति-शीघ्र हो, तन-मन हो चैतन्य ।
दर्शन होते आपके, हुए आज हम धन्य ।
हुए आज हम धन्य, खिले घर-आँगन बगिया ।
खुशियों की सौगात, गात हो फिर से बढ़िया ।
रविकर सपने देख, आपकी रचना पढता ।
नित नवीन आयाम, समय दीदी हित गढ़ता ।। 


आशंका चिंता-भँवर, असमंजस में लोग ।
चिंतामणि की चाह में, गवाँ रहे संजोग । 
 गवाँ रहे संजोग, ढोंग छोडो ये सारे ।
मठ महंत दरवेश, खोजते मारे मारे ।
एक चिरंतन सत्य, फूंक चिंता की लंका ।
हँसों निरन्तर मस्त, रखो न मन आशंका ।। 


 अंकुश हटता बुद्धि से, भला लगे *भकराँध । 
 भूले भक्ष्याभक्ष्य जब, भावे विकट सडांध ।
भावे विकट सडांध, विसारे देह  देहरी ।
टूटे लज्जा बाँध, औंध नाली में पसरी ।।
नशा उतर जब जाय, होय खुद से वह नाखुश ।
   कान पकड़ उठ-बैठ, हटे फिर संध्या अंकुश ।।

*सड़ा हुआ अन्न

कितने हलवाई मिटे, कितने धंधे-बाज ।
नाजनीन पर मर-मिटे, जमे काम ना काज ।
जमे काम ना काज, जलेबी रोज जिमाये ।
गुपचुप गुपचुप भेल, मिठाई घर भिजवाये ।
फिर अंकल उस रोज, दिए जब केटरिंग ठेका ।
सत्य जान दिलफेंक, उसी क्षण दिल को फेंका ।।




बंजारा चलता गया, सौ पोस्टों के पार ।
प्रेम पूर्वक सींच के, देता ख़ुशी अपार ।
देता ख़ुशी अपार, पोस्ट तो ग्राम बन गए ।
पा जीवन का सार, ग्राम सुखधाम बन गए ।
सर मनसर कैलास, बही है गंगा धारा ।
पग पग चलता जाय, विज्ञ सज्जन बंजारा ।


 
 
मिलन आस का वास हो, अंतर्मन में ख़ास ।
सुध-बुध बिसरे तन-बदन, गुमते होश-हवाश । 
गुमते होश-हवाश, पुलकती सारी देंही ।
तीर भरे उच्छ्वास,  ताकता परम सनेही ।
वर्षा हो न जाय, भिगो दे पाथ रास का  ।
अब न मुझको रोक, चली ले मिलन आस का ।।




 एकत्रित होना सही, अर्थ शब्द-साहित्य ।
 सादर करते वन्दना, बड़े-बड़ों के कृत्य ।
बड़े-बड़ों के कृत्य, करे गर किरपा हम पर ।
हम साहित्यिक भृत्य, रचे रचनाएं जमकर ।
गुरु-चरणों में बैठ, होय तन-मन अभिमंत्रित ।
छोटों की भी पैठ, करें शुरुवात एकत्रित ।।


 Naaz
वाह-वाह क्या बात है, भला दुपट्टा छोर ।
इक मन्नत से गाँठती, छोरी प्रिय चितचोर ।
छोरी प्रिय चितचोर, मोरनी सी नाची है ।
कहीं ओर न छोर, मगर प्रेयसी साँची है ।
 रविकर खुद पर नाज, बना चाभी का गुच्छा ।
सूत दुपट्टा तान, होय सब अच्छा-अच्छा ।।


  panchnama -
उदासीनता की तरफ, बढे जा रहे पैर ।
रोको रोको रोक लो,  करे खुदाई खैर ।   
करे खुदाई खैर, लगो योगी वैरागी ।
दुनिया से क्या वैर, भावना क्यूँकर जागी ।
दर्द हार गम जीत,  व्यथा छल आंसू हाँसी ।
जीवन के सब तत्व, जियो तुम छोड़ उदासी ।। 


संजय की दृष्टी सजग, जात्य-जगत जा जाग ।
जीवन में जागे  नहीं, लगे पिता पर दाग ।
लगे पिता पर दाग, पालिए सकल भवानी।
भ्रूण-हत्या आघात, पाय न पातक पानी ।
निर्भय जीवन सौंप, बचाओ पावन सृष्टी ।
कहीं होय न लोप, दिखाती संजय दृष्टी ।।


इष्ट-मित्र परिवार को, सहनशक्ति दे राम ।
रावण-कुल का नाश हो, होवे काम तमाम ।
होवे काम तमाम, अजन्मे दे दे माफ़ी ।
अमर पिता का नाम, बढ़ाना आगे काफी ।
इस दुनिया का हाल, राम जी अच्छा करिए ।
नव-आगन्तुक बाल, हाथ उसके सिर धरिये ।।



प्यार मिले परिवार का, पुत्र-पिता पति साथ ।
देवी मुझको मत बना, झुका नहीं नित माथ ।
झुका नहीं नित माथ, झूठ आडम्बर छाये ।
कन्या-देवी पूज, जुल्म उनपर ही ढाये ।
दुग्ध-रक्त तन प्राण, निछावर सब कुछ करती ।
बाहर की क्या बात, आज घर में ही डरती ।।



भाया ओज मनोज का, उल्लू कहती रोज ।
सम्मुख माने क्यूँ भला,  देती रहती डोज ।
देती रहती डोज, खोज कर मौके लाती ।
करूँ कर्म मैं सोझ, मगर हरदम नखराती ।
मनोजात अज्ञान, मने मनुजा की माया ।
चौबिस घंटे ध्यान, मगर न मुंह को भाया ।।


पिट्सबर्ग का भारती, है गिट-पिट से दूर ।  
करे देश की आरती, देशभक्ति में चूर ।
देशभक्ति में चूर, सूंढ़ हाथी की शुभ-शुभ ।
 औषधि तुलसी बाघ, कैक्टस जाती चुभ-चुभ ।
तरी मसालेदार, बाग़ में सजी रंगोली ।
रेल कमल बुद्धत्व, गजब वो खेले होली ।। 

प्रतियोगी बिलकुल नहीं, हैं प्रतिपूरक जान ।
इक दूजे की मदद से, दुनिया बने महान ।
दुनिया बने महान, सही आशा-प्रत्याशा ।
पुत्री बने महान, बाँटता पिता बताशा ।
बच्चों के प्रतिमोह, किसे ममता ना होगी ।
पति-पत्नी माँ-बाप, नहीं कोई प्रतियोगी ।।



नैनी नैनीताल का, पढ़ सुन्दर वृतान्त ।
जीप भुवाली से चली, सफ़र खुशनुमा शाँत ।
सफ़र खुशनुमा शाँत, खाय फल आडू जैसा ।
कहिये किन्तु हिसाब, खर्च कर कितना पैसा ?
छत पर देखा पेड़, निगाहें बेहद पैनी ।
वाह जाट की ऐड़, अकेले घूमा नैनी  ।।


कन्या के प्रति पाप में, जो जो भागीदार ।
रखे अकेली ख्याल जब, कैसे दे आभार ।  
कैसे दे आभार, किचेन में हाथ बटाई ।
ढो गोदी सम-आयु, बाद में रुखा खाई ।
हो रविकर असमर्थ,  दबा दें बेटे मन्या *। 
  सही उपेक्षा रोज,  दवा दे वो ही कन्या । 
*गर्दन के पीछे की शिरा

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