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Monday, September 30, 2013

गुज़ारिश खाटू श्याम से :चर्चामंच 1384

शुभम दोस्तो 
सितम्बर महीने की 
आखिरी गुज़ारिश
आज के चर्चामंच 1384 पर 
लेकर आई हूँ 
मैं 
सरिता भाटिया 
आइये बढिए चर्चा की तरफ 

पार्टी की थूक 

टीस 

बिना किरण 

दर्पण काला काला क्यों?

दिल के जज्बात 

काठमांडू की ओर 

धूम्रपान की लत 

मर्ज जो अच्छा नहीं होता 

छोटी सी जिंदगी 

झरने लगे हैं पुष्प हर श्रृंगार के 

महीने के दिन 

नरेंद्र मोदी का भाषण 

भविष्य का बचपन 

खंडित साँसें 

सुबह के लोग 
Street persons, Manila, Philippines - images by Sunil Deepak, 2011

बड़ों को नमस्कार 
छोटों को प्यार 
शुभविदा 
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"मयंक का कोना"
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मुड़ मुड़ के देखना एक उम्र तक 
बुरा नहीं समझा जाता है
समय के साथ बहुत सी आदतें 
आदमी की बदलती चली जाती हैं 
सड़क पर चलते चलते 
किसी जमाने में गर्दन 
पीछे को बहुत बार अपने आप मुड़ जाती है ...
उल्लूक टाईम्स पर Sushil Kumar Joshi 

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मेरे सीने पे अलाव ही लगाकर देखो...अहमद नदीम क़ासमी

किस क़दर सर्द है यह रात-अंधेरे ने कहा मेरे दुशमन तो हज़ारों हैं...
मेरी धरोहर पर yashoda agrawal
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नैनोनाइफ़ जिसमें न कोई चीरा है न चाक़ू, 
सिर्फ बिजली की ताकत (विद्युत ऊर्जा ,
विद्युत धारा ),Electric current का इस्तेमाल किया जाता है।आपका ब्लॉगपरVirendra Kumar Sharma
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खो गए सभी

अंतर्नाद की थाप पर Kaushal Lal 

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बचपन की यादें

हायकु गुलशन..*HAIKU GULSHAN

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सीमा रेखा

मर्यादा की सीमा रेखा जिसने किया अनदेखा निकल गया वह सुरक्षा के दायरे से इतिहास गवाह है अमर्यादित हँसी ने महाभारत का लेख रचा लक्षमण रेखा लाँघते ही सिया हर ली गईं महाविद्वान रावण स्वर्ण खान का नृप अमर्यादित सोच ने ही उसे विनाश के कगार पर पहुँचाया भाई की रक्षिता शूर्पनखा मर्यादा उसने न गँवाई होती जग में उसकी न हँसाई होती प्रकृति नियम पर चलती तभी दिन के बाद रात ढलती पौ फटते ही खगों की चहचह... 
मधुर गुंजन
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भारत के रत्न मान पायें भारत के बाहर .
नवाज शरीफ ने वैसे ''देहाती औरत ''शब्द नहीं कहा किन्तु यदि उन्होंने हमारे प्रधानमंत्री जी को देहाती औरत कहा है तो उन्होंने उनकी सही पहचान की है देहात में औरत जितनी ईमानदारी और मेहनत से काम कर अपने घर व् खेत के लिए काम करती है वैसे शहरी औरत कर ही नहीं सकती क्योंकि यहाँ वह दूसरों के लिए काम करती है और देहाती औरत अपने घर व् खेत के लिए काम करती है . साथ ही औरत शब्द का उच्चारण उनके लिए करना उनके सम्मान को बढ़ाना ही है क्योंकि ये कहा भी गया है की अगर औरत में आदमी के गुण आ जाएँ तो वह कुलटा हो जाती है और अगर आदमी में औरत के गुण आ जाएँ तो वह देवत्व पा जाता है...
! कौशल ! पर Shalini Kaushik

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"30 सितम्बर दादी जी का जन्मदिवस"

काग़ज़ की नाव

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मेरे प्रियवर ओ मेरे प्रियवर....
डगर डगर तम नगर नगर घर घर, 
दर दर आडम्बर कर कृपाण अब धारण कर 
युग रचो नया, नव संवत्सर 
मेरे प्रियवर ओ मेरे प्रियवर.......
मीठा भी गप्प,कड़वा भी गप्प पर निर्दोष दीक्षित

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"अमर भारती जिन्दाबाद"
तुमसे है उपवन आबाद।
अमर भारती जिन्दाबाद।।

तुम हमको प्राणों से प्यारी,
गुलशन की तुम हो फुलवारी,
तुम हो जीवन का उन्माद।
अमर भारती जिन्दाबाद।।
उच्चारण

Sunday, September 29, 2013

तुकबन्दी: चर्चामंच - 1383

"जय माता दी" रु की ओर से आप सबको सादर प्रणाम. चलते हैं आप सभी के चुने हुए प्यारे लिंक्स पर.

प्रस्तुतकर्ता : (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

प्रस्तुतकर्ता : सदा

प्रस्तुतकर्ता : Upasna Siag
प्रस्तुतकर्ता : Akshitaa Yadav


प्रस्तुतकर्ता : रविकर

प्रस्तुतकर्ता : आनंद कुमार द्विवेदी
प्रस्तुतकर्ता : Hitesh Rathi
प्रस्तुतकर्ता : Aamir Dubai
प्रस्तुतकर्ता : स्वप्न मञ्जूषा
प्रस्तुतकर्ता : Rekha Joshi
प्रस्तुतकर्ता : Anita
प्रस्तुतकर्ता : ऋता शेखर मधु
प्रस्तुतकर्ता : Yashoda Agrawal

प्रस्तुतकर्ता : Anu

प्रस्तुतकर्ता : Amit Srivastava


प्रस्तुतकर्ता : Punam


इसी के साथ आप सबको शुभविदा मिलते हैं रविवार को. आप सब चर्चामंच पर गुरुजनों एवं मित्रों के साथ बने रहें. आपका दिन मंगलमय हो
जारी है 'मयंक का कोना'
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इसे कहते हैं खुला खेल भोपाली झमूरा विलायती। 
कल को ये झमूरा सुप्रीम कोर्ट के बारे में भी कुछ भी प्रलाप कर सकता है -
"ये सुप्रीम कोर्ट वोर्ट कुछ नहीं होता मैं फाड़के फांकता हूँ इसके निर्णय को "
आपका ब्लॉग
आपका ब्लॉग पर Virendra Kumar Sharma 

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ये नक्काशी करने वाले....
आपका ब्लॉग
प्रस्तुतकर्ता 
एहसासों पर नक्काशी करने का अजब हुनर है उनमें
जाने कब से एहसासों को पत्थर
मान बैठे है और
तैयार है हर बार एक नया चित्र
उकेरने को...

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हाँ कुछ....

Rhythm of words...पर Parul kanani 

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जख्मों का हिसाब (दर्द भरी हास्य कविता)
फटी-सी एक डायरी में, लिख रखा है मैंने; 
है पाई-पाई का तेरे, हर जख्मों का हिसाब | 
कब तूने तोड़ा दिल, कब की थी रुसवाई; 
कब हुई थी बेवफा, हर तारीख है जनाब...
मेरा काव्य-पिटारा  पर  ई. प्रदीप कुमार साहनी 

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डर या रोमांच
 मुझे याद है डर से मेरा पहला परिचय हुआ था जब मैं शायद दूसरी या तीसरी में पढ़ती थी। उस समय ये अफवाह जोरो से फैली थी कि कुछ लोग आँखों में देख कर सम्मोहित कर लेते है...
कासे कहूँ? पर  kavita verma

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एक ही समय पर दोनों बात होती है!
लिख जाने पर सुकून मिलता है, कह जाने पर मन हल्का हो जाता है लेकिन एक वो भी बिंदु है जब इतना उद्विग्न होता है मन कि न लिखा जाता है न कुछ कह पाने की ही सम्भावना बनती है... बस महसूस हो सकती है हवा की तरह... 
अनुशील पर अनुपमा पाठक

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पुष्पांजलि

मुझे कुछ कहना है ....

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"देशी फ्रिज" 
बालकृति 
"हँसता गाता बचपन" से
 
बालकविता
"
पानी को ठण्डा रखती है,
मिट्टी से है बनी सुराही।
बिजली के बिन चलती जाती,
देशी फ्रिज होती सुखदायी।।
हँसता गाता बचपन
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मात्र दिखावा हैं ये आयोजन हिंदी दिवस पर 
‘पखवाड़ा’ 
के आयोजन का कोई औचित्य है 
या बस यूं ही चलता रहेगा यह सिलसिला?
मेरा फोटो
! कौशल !परShalini Kaushik

Saturday, September 28, 2013

"इस दिल में तुम्हारी यादें.." (चर्चा मंचःअंक-1382)

मित्रों।
आज शनिवार की चर्चा में 
मेरी पसंद के कुछ लिंक देखिए
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lalit-sharma-girish-pankaj-bspabla
ज़िंदगी के मेले पर बी एस पाबला 

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पंडित जी बहुत ही * *व्यस्त हो जाते हैं * 
*श्राद्ध सामग्री के लिये * 
*एक लम्बी सूची भी * 
*प्रिंट कराते हैं * 
*दूध दही घीं शहद * 
*काजू किशमिश बादाम * 
*फल मिठाई कपड़े लत्ते * 
*अच्छी क्वालिटी और *
 *अच्छी दुकान से * 
*लाने का आदेश * 
*साथ में दे जाते हैं * 
*खुद ही खा कर * 
*पितर लोगों तक * 
*खाना पहुंचाते हैं...
उल्लूक टाईम्स पर  Sushil Kumar Joshi 

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MyBigGuide पर Abhimanyu Bhardwaj

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आपका ब्लॉग
चलो फिर एक बार
अनजान हो जाए

मिटा दें वो सभी यादें

जो केवल हमारी—तुम्हारी थी
जिनमें सिर्फ मैं और तुम थे...
आपका ब्लॉग पर Swati Jain

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श्रीमद भगवदगीता चौथा अध्याय :श्लोक चौदहवाँ 


न मां कर्माणि लिम्पन्ति , न मे कर्मफले स्पृहा 
इति मां योअभिजानाती ,कर्मभिर न स बध्यते 
मुझे कर्म का बंधन नहीं लगता ,क्योंकि मेरी इच्छा कर्म फल में नहीं रहती है। इस रहस्य को जो व्यक्ति भलीभांति समझकर मेरा अनुसरण करता है ,वह भी कर्म के बंधनों से नहीं बंधता है...
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आंगन में खड़े—2 
बरसो बीत गए

अब बंधन तोड़ 

देना चाहती हूं
कई सालों से 
बोझ सा लिए
जी रही हूं
अब आराम चाहती हूं...
swatikisoch पर Swati Jain 

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मन की पीड़ा मन की उलझने बढती जा रही हैं निरंतर , 
मन क्लांत तन शिथिल हो गया है , 
लग रहा है एक प्रश्न चिन्ह जी रही हूँ मैं, 
सब कोशिशे नाकाम हो रही हैं 
दिशाहीन सा महसूस हो रहा है...
Love पर Rewa tibrewal 

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माँ के आंचल में मिले ,ममता की ही छाँव 
शुभाशीष पाओ मधुर, नित्य दबाकर पाँव...
गुज़ारिश पर  सरिता भाटिया 

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शंखनाद पर पूरण खण्डेलवाल 

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"लिंक-लिक्खाड़" पर  रविकर 

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इस जिन्दगी में क्या रखा है कब बिखर जाए 
कुछ काम ऐसे करो जीवन सँवर जाए...
Akanksha पर Asha Saxena 

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कुटनी के करतूत से, कूटनीति नाकाम | 
चालू है अब धूर्तता, पाई शक्ति तमाम...

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 अपराधी जननेता होंगे युग के यही प्रणेता होंगे | 
राजव्यवस्था को कुचलेंगे नियम संहिता सब बदलेंगे | 
गुंडों की सरकार बनेगी सहमी हुई अदालत होगी , 
बुक्का फाड़ प्रजा रोएगी सच पूछो क्या हालत होगी ...
छान्दसिक अनुगायन पर जयकृष्ण राय तुषार 

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मेरी धरोहर पर yashoda agrawal 

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"नया निर्माण"
काव्य संग्रह 'धरा के रंग' से एक गीत

"नया निर्माण"
पतझड़ के पश्चात वृक्ष नव पल्लव को पा जाता।
विध्वंसों के बाद नया निर्माण सामने आता।।
भीषण सर्दी, गर्मी का सन्देशा लेकर आती ,
गर्मी आकर वर्षाऋतु को आमन्त्रण भिजवाती,
सजा-धजा ऋतुराज प्रेम के अंकुर को उपजाता।
विध्वंसों के बाद नया निर्माण सामने आता।।...
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"चमत्कार, अन्धविश्वास या इत्तफाक"
    सितारगंज कस्बे से 6 कि0मी0 दूर नया-गाँव पडता है। वहाँ रोड के किनारे कुछ ईंटें पड़ी हुई थी। शायद किसी मजार के निर्माण के लिए ही ट्रक वाले उतार देते होंगे। जैसे ही कार यहाँ पँहुची।...
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"एक मुक्तक"
सृजन मंच ऑनलाइन

युवराज-सन्त चल पड़ेगली-हाट में,
निर्वाचन के दौर नेये दिन भी दिखाया है।
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समरथ काहुना दोषु गोसाईं ,
रबि पावका सुरसरि कि नाईं

श्रीमद भगवदगीता चौथा अध्याय :श्लोक चौदहवाँ न मां कर्माणि लिम्पन्ति , न मे कर्मफले स्पृहा इति मां योअभिजानाती ,कर्मभिर न स बध्यते मुझे कर्म का बंधन नहीं लगता ,क्योंकि मेरी इच्छा कर्म फल में नहीं रहती है। इस रहस्य को जो व्यक्ति भलीभांति समझकर मेरा अनुसरण करता है ,वह भी कर्म के बंधनों से नहीं बंधता है...
आपका ब्लॉग
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gambhir samsya


madhu singh

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छत्तीसगढ़ी काव्य में अमर कवि कोदूराम ‘दलित’

अरुण कुमार निगम (हिंदी कवितायेँ)

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मेरे दुलरुआ आज तुम्हारे जन्मदिन पर .....

ये है हमारा छोटा बेटा अभिषेक और आज इसके जन्मदिवस पर एक दुआ ….
झरोख़ापरनिवेदिता श्रीवास्तव 
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आज के लिए इतना ही...।

जानवर पैदा कर ; चर्चामंच 2815

गीत  "वो निष्ठुर उपवन देखे हैं"  (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')     उच्चारण किताबों की दुनिया -15...