चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

समर्थक

Wednesday, October 16, 2013

"ईदुलजुहा बहुत बहुत शुभकामनाएँ" (चर्चा मंचःअंक-1400)

मित्रों।
बुधवार के चर्चाकार आदरणीय रविकर जी
15 दिनों के अवकाश पर हैं। 
इसलिए बुधवार की चर्चा में 
अपनी पसन्द के कुछ अद्यतन लिंक 
आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ।
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बक़रीद के अवसर पर पाठकों को 
बहुत बहुत शुभकामनाएँ!

Blog News पर DR. ANWER JAMAL

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हायकु गुलशन..पर sunita agarwal

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 बंद है इन लिफाफों में...
अभी तक, तुमने खोले ही नही...... 
कितने रंग-बिरंगे पन्नो पर, सजे मेरे शब्द..... 
तुमने कभी पढ़े ही नही.....

'आहुति' पर sushma 'आहुति' 

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एक शक्ल एक सूरत एक बनावट 
एक अक्ल एक आदमी के लिये एक दूसरे के लिये 
अलग खेलते कूदते फांदते बच्चे 
पर अलग अलग एक गुब्बारे का झुंड 
कहां होते है किसके होते हैं कोई परवाह नहीं करता है 
सब कुछ अलग अलग होकर भी एक होता है 
एक ही झुंड की रंग बिरंगी तितलियां 
उड़ते उड़ते कब ओझल हो जाती हैं अंदाज नहीं आता ...

उल्लूक टाईम्स पर Sushil Kumar Joshi 

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कुछ लिंक आपका ब्लॉग से-
आपका ब्लॉग

योग आसन और सामान्य कसरत में क्या फर्क है ?
कसरत का सारा दारोमदार सारा फॉकस ,सारी तवज्जो काया को लाभ पहुंचाना है।
कसरत के बिना पेशीय अपव्यय होता है ,अस्थियाँ कमज़ोर पड़ती हैं ,
ऑक्सीजन ज़ज्बी की क्षमता घटने लगती है।
अचनाक कोई शारीरिक क्षमता का काम आ पड़े
देर तक काम करना पड़ जाए तो पहाड़ सा लगने लगे।
लेकिन कसरत पेशी से काम लेती है...
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दीगर है कि योग के पूरे दोहन के लिए 
इसका ध्यान मनन वाला पक्ष भी सक्रिय किया जाना चाहिए। 
भले कई पढ़े लिखे उसे पेसिव मेडिटेशन कहते हैं।
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अब मैं नाच्यो बहुत गोपाल। 
नाच्यो बहुत गोपाल ,अब मैं नाच्यो बहुत गोपाल 
                                           -सूरदास 
आपका ब्लॉग पर Virendra Kumar Sharma
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कुछ शेर
उसे हम दोस्त क्या मानें  दिखे मुश्किल में मुश्किल से
मुसीबत में भी अपना हो उसी को दोस्त मानेगें
जो दिल को तोड़ ही डाले उसे हम प्यार क्या जानें
दिल से दिल मिलाये जो उसी को प्यार जानेंगें 
गज़लकार ,कबि और लेखक
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दोहावली
ठहर न इस ठांव मनुवा, जाना दूसरे ठांव ।
मिटे जहां ठाठ मनुवा, जहां हैं शितल छांव ।।
तुम होगे हंसा गगन, काया होगी ठाट ।
तुम तो हो पथिक मनुवा, जीवन तेरा बाट ।
प्रस्तुतकर्ता 
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शाम का चेहरा जब धुँधला हो जाता है 
मन भारी भीगा-भीगा हो जाता है...
मेरी धरोहर पर yashoda agrawal
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झूठ नामां

सुना था झूठ के पैर नहीं होते 
आज नहीं को कल मुखोटा उतर जाता है वह छुप नहीं पाता | 
पर अब देख भी लिया भेट हुई एक ऐसे बन्दे से 
थी जिसकी झूठ से गहरी यारी...
Akanksha पर Asha Saxena
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"होली का मौसम"
बालकृति 
"हँसता गाता बचपन" से
 
बालगीत
रंग-गुलाल साथ में लाया।
होली का मौसम अब आया।
पिचकारी फिर से आई हैं,
बच्चों के मन को भाई हैं,
तन-मन में आनन्द समाया।
होली का मौसम अब आया।।
हँसता गाता बचपन
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हम अधूरे एक दूजे बिन ओ पिया
 मैं हूँ चाँदनी ऐसा है अपना मिलन ओ रे पिया 
आइना तुम हो अगर मैं तस्वीर हूँ 
अक्स तुझमें मेरा ही दिखता है पिया  ...
गुज़ारिश पर सरिता भाटिया

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एक प्रश्न
हमारे जीवन की तमाम उलझनों से हम प्रतिदिन रूबरू होते रहते हैं, हमारा प्रतिदिन का लगभग 98 प्रतिशत कार्यक्रम भी पूर्व में ही निर्धारित किया हुआ होता है । अर्थात यदि व्यस्क हैं तो प्रातःकाल जल्दी जागना, तैयार होना, ईश वन्दना फिर रोजगार के दस धन्टे और शाम को घर परिवार का मिलन, टी वी या अन्य साधन से कुछ मनोरंजन या सूचनाएं एकत्र कर अपने दिमाग में भरना, भोजन और फिर सो जाना...
Chitransh soul पर durga prasad Mathur

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बदला सा सब ..

ना फिज़ा बदली ना शहर बदला * 
*इस जगह से मेरा ठिकाना बदला...
बावरा मन पर  सु..मन
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" चूड़ी " .....

 इसके बारे में सोचते ही सबसे पहले एक मीठी सी आवाज़ " खन्न " की गूँज जाती है और इसके बाद तो इतने ढेर सारे रंग निगाहों में लहरा जाते हैं ,और वो भी ऐसे सतरंगी कि हर रंग मन में बस जाए ..... इस चूड़ी पर गाने भी तो कितने सारे और कितने प्यारे लिखे गये हैं ....... बोले चूड़ियाँ बोले कंगना ..... चूड़ी नहीं मेरा दिल है ...... चूड़ी मजा न देगी ..... गोरी हैं कलाइयाँ , पहना दे मुझे हरी - हरी चूड़ियाँ ...... हर समुदाय विशेष में इन चूड़ियों के बारे में धारणाएं भी अलग - अलग हैं .......
झरोख़ा पर निवेदिता श्रीवास्तव 
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स्वेटर ...

रूहानी सुहानी पर Aparna Khare

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भारत में स्तन कैंसर- कुछ आंकड़े
- महिलाओं में औसतन 23 फीसदी कैंसर स्तन कैंसर होते हैं। - कैंसर से होने वाली कुल मौंतों में 50 फीसदी का कारण स्तन कैंसर है। - हर साल 1,15,000 नए स्तन कैंसर के मामले सामने आते हैं और 53,000 की मौत हो जाती है। यानी जब दो नए मामले सामने आते हैं तो एक मरीज की मौत हो जाती है...
RAINBOW/इंद्रधनुष पर आर. अनुराधा

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मेला दिलों का …
कल फेस बुक पर दशहरा मेले का एक फोटो डाला बहुत सारे लोगों ने इसे पसंद किया। अपने बचपन को याद करते हुए बचपन के मेलों को याद किया। कुछ लोगों ने तुलना कर डाली उस समय के मेले , उनकी बात ही कुछ और थी , इसी बात ने सोचने को मजबूर कर दिया...
कासे कहूँ? पर kavita verma 

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मेरी बहू -लघु कथा

WORLD's WOMAN BLOGGERS ASSOCIATION

पर
shikha kaushik
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हाइकु ...संवेदना ....

 रैन न बीते .... 
ये क्षण रहे रीते .... 
आस न जाए ..
anupama's sukrity
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"झुकेगी कमर धीरे-धीरे"
 
जवानी ढलेगी मगर धीरे-धीरे
करेगा बुढ़ापा असर धीरे-धीरे

सहारा छड़ी का ही लेना पड़ेगा
झुकेगी सभी की कमर धीरे-धीरे...
उच्चारण
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भव्य झाँकी के साथ माता की मूर्ति का विसर्जन,बगड़

मालीगांव पर 

Surendra Singh bhamboo
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श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (५७वीं कड़ी)

मेरी प्रकाशित पुस्तक 'श्रीमद्भगवद्गीता (भाव पद्यानुवाद)' के कुछ अंश: चौदहवां अध्याय (गुणत्रयविभाग-योग-१४.२१-२७) अर्जुन उनके क्या लक्षण हैं भगवन जो त्रिगुणों से ऊपर उठ जाता. कैसा है व्यवहार वह करता कैसे त्रिगुणों के पार है जाता. (१४.२१) श्री भगवान ज्ञान, कर्म, मोह होने पर वह उनसे है द्वेष न करता. होने पर निवृत्त है उनसे नहीं कामना उनकी करता. (१४.२२) साक्षी रूप से स्थिर होकर नहीं गुणों से विचलित होता. केवल गुण ही कर्म कर रहे ऐसा समझ न विचलित होता....
Kashish - My Poetry पर Kailash Sharma
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जानलेवा लापरवाहियों को 
कब तक लीपापोती में छिपाते रहेंगे !!

शंखनाद पर पूरण खण्डेलवाल 

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हमको सब दिखता है मीलाड!! 
court, law, justice, CBI, government, upa government, congress cartoon, indian political cartoon
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..है जिंदगी एक छलावा -- 
श्रीमती आशा लता सक्सेना जी 

 है जिंदगी एक छलावा पल पल रंग बदलती है 
है जटिल स्वप्न सी कभी स्थिर नहीं रहती | 
जीवन से सीख बहुत पाई कई बार मात भी खाई यहाँ 
अग्नि परीक्षा भी कोई यश न दे पाईययय
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कितनी भारी है यह गठरी 
कर्तव्यों और दायित्वों की ! 
प्राण प्रण से अपनी सामर्थ्य भर दोनों हाथों से 
इसे अब तक सम्हाले रही हूँ
--
*दृश्य 1* 
 गेंदे का पौधा आज बहुत उदास था 
उसने गुलदावदी से कहा 
यार तुम्हारी खुशबू मेरी खुशबू से अच्छी है क्या ?
खामोश दिल की सुगबुगाहट...
--
सच कहने से फ़र्ज़ अदा हो जाता है 
लेकिन सब का दिल खट्टा हो जाता है...
--

22 comments:

  1. बहुरंगी लिंक्स आज
    मन चाहता रमना उनमें
    छोड़ सारे काज |
    |मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार शास्त्री जी

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  2. सुन्दर और पठनीय सूत्रों से सजी चर्चा !!
    सादर आभार !!

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  3. सुंदर सूत्रों से सजे आज के चर्चा मंच में उल्लूक की रचना
    देखता है फिर भी समझना चाहता है
    को स्थान देने के लिये शास्त्री जी का आभार !

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  4. सार्थक सूत्रों से सजा सुसज्जित चर्चामंच ! यहाँ मेरी रचना को भी सम्मिलित करने के लिये आपका धन्यवाद एवँ आभार शास्त्री जी !

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  5. aabhaar.
    tyauhaar par sabko mubarakbaad.

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  6. उत्कृष्ट लिंक चयन शास्त्री जी ....मेरी रचना सम्मिलित की ,हृदय से आभार ...!!

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  7. सुन्दर लिंक्स...रोचक चर्चा...आभार

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  8. उम्दा लिंक्स ... रोचक एवं प्रेरक रचनाये पढने को मिली .. मेरी रचना को यहाँ स्थान देने के लिए हार्दिक आभार आदरणीय :) सादर नमन

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  9. sarthak links se saji charcha .aabhar

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  10. उसे हम दोस्त क्या मानें दिखे मुश्किल में ,

    मुश्किल से,
    मुसीबत में भी अपना हो ,

    उसी को दोस्त मानेगें।
    जो दिल को तोड़ ही डाले ,

    उसे हम प्यार क्या जानें,
    दिल से दिल मिलाये जो ,
    उसी को प्यार जानेंगें।

    बहुत खूब सक्सेना साहब।

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  11. जबरजस्त सजाया चर्चा मंच आपने ,

    बारहा , रिझाया हमको आपने।

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  12. विचारणीय पक्ष रखा है आपने। भीड़ का भी विनियमन होना चाहिए।

    जानलेवा लापरवाहियों को
    कब तक लीपापोती में छिपाते रहेंगे !!

    शंखनाद पर पूरण खण्डेलवाल

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  13. मैं ही अनश्वर ब्रह्म में स्थित
    शाश्वत धर्म और अमृत भी.
    अर्जुन मुझमें ही आश्रय समझो
    एकांतिक अखंड सुख का भी.

    सुन्दरम मनोहरम भावसार भाव शांति पैदा करता है।


    --
    श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (५७वीं कड़ी)

    मेरी प्रकाशित पुस्तक 'श्रीमद्भगवद्गीता (भाव पद्यानुवाद)' के कुछ अंश: चौदहवां अध्याय (गुणत्रयविभाग-योग-१४.२१-२७) अर्जुन उनके क्या लक्षण हैं भगवन जो त्रिगुणों से ऊपर उठ जाता. कैसा है व्यवहार वह करता कैसे त्रिगुणों के पार है जाता. (१४.२१) श्री भगवान ज्ञान, कर्म, मोह होने पर वह उनसे है द्वेष न करता. होने पर निवृत्त है उनसे नहीं कामना उनकी करता. (१४.२२) साक्षी रूप से स्थिर होकर नहीं गुणों से विचलित होता. केवल गुण ही कर्म कर रहे ऐसा समझ न विचलित होता....
    Kashish - My Poetry पर Kailash Sharma

    ReplyDelete

  14. --
    "झुकेगी कमर धीरे-धीरे"

    जवानी ढलेगी मगर धीरे-धीरे
    करेगा बुढ़ापा असर धीरे-धीरे

    सहारा छड़ी का ही लेना पड़ेगा
    झुकेगी सभी की कमर धीरे-धीरे...

    नहीं साथ देगा कुटुम और कबीला
    कठिन सी लगेगी डगर धीरे-धीरे

    यही फलसफा जिन्दगी का है यारों
    कटेगी अकेले उमर धीरे-धीरे

    नहीं “रूप” की धूप हरदम खिलेगी
    अँधेरे में होगा सफर धीरे-धीरे
    बहुत खूब कहा है।

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  15. बहुत सशक्त भाव अभिव्यक्ति अर्थगर्भित।


    संवाद से ही ....
    मुखरित होती है ...
    संवेदनाएं ...

    .संवाद करते से हैं सब के सब हाइकु।


    हाइकु ...संवेदना ....

    रैन न बीते ....
    ये क्षण रहे रीते ....
    आस न जाए ..
    anupama's sukrity

    ReplyDelete

  16. बहुत सशक्त संदेश देती है यह प्रस्तुति दहेज़ खोरों को जो अपने लौंडे को नीलाम करते हैं।कर्तम सो भोगतम। अभिव्यक्ति और लहजा आंचलिकता लिए हुए। अर्थगर्भित।


    --
    मेरी बहू -लघु कथा

    WORLD's WOMAN BLOGGERS ASSOCIATION
    पर
    shikha kaushik

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  17. विचारणीय पक्ष रखा है आपने। मार्मिक प्रस्तुति अपने दौर के मेले क्यों याद आते हैं। तब गर्माहट थी सम्बन्धों की। अब हर तरफ बर्फ है।
    मेला दिलों का …
    कल फेस बुक पर दशहरा मेले का एक फोटो डाला बहुत सारे लोगों ने इसे पसंद किया। अपने बचपन को याद करते हुए बचपन के मेलों को याद किया। कुछ लोगों ने तुलना कर डाली उस समय के मेले , उनकी बात ही कुछ और थी , इसी बात ने सोचने को मजबूर कर दिया...
    कासे कहूँ? पर kavita verma

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  18. बढ़िया बाल गीत होली का मौसम अब आया ,गुंझिया बर्फी लेकर आया।

    बालगीत
    ♥ होली का मौसम ♥
    रंग-गुलाल साथ में लाया।
    होली का मौसम अब आया।

    पिचकारी फिर से आई हैं,
    बच्चों के मन को भाई हैं,
    तन-मन में आनन्द समाया।
    होली का मौसम अब आया।।
    हँसता गाता बचपन

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  19. बेहतरीन चर्चा, सुन्दर लिंक्स!

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  20. आदरणीय शास्त्री सर प्रणाम,
    सुन्दर ब्लॉग लिंक्स के लिए एवं मेरे ब्लॉग को स्थान देने के लिए आपका दिल से आभार ।

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