चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

समर्थक

Saturday, November 09, 2013

गंगे ! : चर्चामंच : चर्चा अंक : 1424


 गंगे !
मेरा जलपात्र
अपनी सोमधार 
से भर दे
परम सुख-सौभाग्य 
के लिए
रहेगा 
आजीवन पर्याप्त
एक ही कण मात्र !

मन कहीं 
नहीं टिकता
न कहीं 
कोई ओट
चारों ओर 
जगत की रिक्तता
जहाँ अनफूटा 
तेरा जल-स्रोत !

(साभार : चेक कवि – ओदोलोन स्मेकल)   
नमस्कार  !
मैंराजीव कुमार झाचर्चामंच चर्चा अंक :1424 में,  कुछ चुनिंदा लिंक्स के साथ,आप सबों का स्वागत करता हूँ.  

एक नजर डालें इन चुनिंदा लिंकों पर............................

श्यामल सुमन
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निहार रंजन   
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पूनम   
मेरा फोटो


अनुपमा पाठक
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रामजी तिवारी      
 













Shikha Kaushik 'Nutan'
 व्यवस्थापक

रेवा टिबरेवाल  
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हर्षवर्द्धन श्रीवास्तव   
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दर्शन कौर धनोय   
मेरे अरमान..  मेरे सपने..

                                   सूर्योपासना के महापर्व  छठ  की मंगलकामनाएँ !!                                  
धन्यवाद !!
आगे देखिए "मयंक का कोना"
--
छठ पर्व

ॐ ..प्रीतम साक्षात्कार ..ॐ पर सरिता भाटिया 

--
श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद 

Kashish - My Poetry पर Kailash Sharma

--
अभी तो बस शुरू हुआ है सफर

कविता-एक कोशिश पर नीलांश 

--
एक चिट्ठी प्यारी सी

हिन्दी-हाइगा पर ऋता शेखर मधु 

--
फसल तो होती है किसान ध्यान दे जरूरी नहीं होता है
ना कहीं खेत होता है ना ही कहीं रेत होती है 
ना किसी तरह की खाद की 
और ना ही पानी की कभी कहीं जरूरत होती है 
फिर भी कुछ ना कुछ उगता रहता है....
उल्लूक टाईम्स पर सुशील कुमार जोशी

--
मेरे मन की मधुशाला
मेरे मन की मधुशाला का 
जो एक घूँट तुम भर लेते
फिर चाहे उम्र भर होश में ना आते
इक जीवन तो हम जी लेते ..........प्रिये !
ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र पर vandana gupta -
--
भ्रम - द्रष्टिभ्रम
जैसा दीखता है वैसा होता नहीं है 
व्यक्ति व्यवस्था व्यथा वो जैसे दीखते हैं 
उनको पता है वैसे नहीं हैं वे जैसे भी हैं 
वे वैसे दीखते नहीं है...
मेरी कविताएं पर Vijay Kumar Shrotryia

--
देख कर अखबार माएं क्यों सिहरती जा रही हैं
हादिसों से आज जिंदगियाँ गुजरती जा रही हैं 
शबनमी बूंदे ज्यों ख़ारों से फिसलती जा रही हैं...
HINDI KAVITAYEN ,AAPKE VICHAAR पर

Rajesh Kumari
--
अ. भा. हिन्दी कवि सम्मेलनों के 
हास्यकवियों की मानधन सूचि

Albela Khtari 

--
बढ़ने लगा फेसबुक से 
फेस टू फेस रूबरू का दौर

ज्ञान दर्पण पर Ratan singh shekhawat

--
छिड़ी चुनावी जंग

Akanksha पर Asha Saxena 

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"ग़ज़ल-खेत घटते जा रहे हैं"

आम, जामुन, नीम सारे, जल गये हैं आग में
कुछ कँटीले पेड़ अब तो, रह गये हैं बाग में

सुमन तो मुरझा गये, अब सिर्फ काँटे ही बचे,
प्रीत पहले सी नहीं, अब तो रही अनुराग में

बढ़ रहे हैं आज जंगल, कंकरीटों के यहाँ
खेत घटते जा रहे हैं, उर्वरा भूभाग में...
उच्चारण
--
कार्टून:- मोटापा बड़े काम की चीज़ है

काजल कुमार के कार्टून
--
कुछ लिंक "आपका ब्लॉग" से..
आपका ब्लॉग
--
यह पढ़ाया जा रहा है आपके बच्चों को : 
(१)महभारत और रामायण कल्पित महाकाव्य हैं।
(कक्षा ११ पृष्ठ १०७ मध्य कालीन इतिहास आर. एस. शर्मा। )
विकर भाई कुंडलिकार 
कम्युनल नेहरू कहें, जब निजाम-संताप |
रिश्ते में लगने लगे, लौह-पुरुष तब बाप |

--
भूल गये आंसू के अक्षर, 
आहिस्ता-आहिस्ता लोग
होते गये फूल से पत्थर, 

आहिस्ता-आहिस्ता लोग...
--
गज़ल ( अहसास)
ऐसे कुछ अहसास होते हैं 

हर इंसान के जीवन में 
भले मुद्दत गुजर जाये , 
बे दिल के पास होते हैं ...
--
Got milk ?Limit it to 2 cups
Young children who drink cow's milk should be limited to 2 cups a
day ,according to a study published in Pediatrics .Researchers
assessed the amount of milk that more than 1,300 children ages 2
to
5 drank .They found that drinking two cups of milk was sufficient
to maintain their vitamin D levels without decreasing their iron..

26 comments:

  1. सुन्दर चर्चा।
    छठ पूजा की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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  2. छट पूजा बिहार में बड़ी धूमधाम से मनाई जाती है |उसपर लिंक्स अच्छी लगीं |मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार |
    आशा

    ReplyDelete
  3. राजीव भाई बेहद श्रम करके सजाई है आपने चर्चा। सेतुओं का रंग निराला है विविधता और नवीनता दोनों एक साथ। बधाई।

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  4. बढ़ रहे हैं आज जंगल, कंकरीटों के यहाँ
    खेत घटते जा रहे हैं, उर्वरा भूभाग में...

    पर्यावरण सचेत प्रस्तुति।

    --
    "ग़ज़ल-खेत घटते जा रहे हैं"

    आम, जामुन, नीम सारे, जल गये हैं आग में
    कुछ कँटीले पेड़ अब तो, रह गये हैं बाग में

    सुमन तो मुरझा गये, अब सिर्फ काँटे ही बचे,
    प्रीत पहले सी नहीं, अब तो रही अनुराग में

    बढ़ रहे हैं आज जंगल, कंकरीटों के यहाँ
    खेत घटते जा रहे हैं, उर्वरा भूभाग में...
    उच्चारण

    ReplyDelete
  5. हो गयी अन्धेर नगरी और चौपट राज है
    लूटते आनन्द काने, विश्व के अनुभाग में

    वाह राजनीतिक व्यंग्य विडंबन भी।

    ReplyDelete
  6. हाँ इस उलटे झाड़ का बीज ऊपर है स्व्यं परमात्मा है। बहुत सुन्दर भावानुवाद सहज सुभाउ।


    श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद

    Kashish - My Poetry पर Kailash Sharma

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  7. हाँ इस उलटे झाड़ का बीज ऊपर है स्व्यं परमात्मा है। बहुत सुन्दर भावानुवाद सहज सुभाउ।

    चार दिवसीय छट पर्व को आपने पञ्चआयामीय बना दिया।

    --
    छठ पर्व

    ॐ ..प्रीतम साक्षात्कार ..ॐ पर सरिता भाटिया
    --


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  8. अच्छा बिम्ब है

    कुकुरमुत्ते भी तो
    उगाये नहीं जाते हैं
    उग आते हैं अपने आप
    कब कहाँ उग जायें
    किसी को भी
    पता नहीं होता है
    पर कुछ कुकुरमुत्ते
    मशरूम हो जाते हैं

    शब्दों की फसल काटते हैं कुछ लोग

    और संसद में घुसके देश के लिए खतरा बन जाते हैं।

    --
    फसल तो होती है किसान ध्यान दे जरूरी नहीं होता है
    ना कहीं खेत होता है ना ही कहीं रेत होती है
    ना किसी तरह की खाद की
    और ना ही पानी की कभी कहीं जरूरत होती है
    फिर भी कुछ ना कुछ उगता रहता है....
    उल्लूक टाईम्स पर सुशील कुमार जोशी

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  9. अब्र तुझको क्या मिलेगा यूँ समंदर पे बरस के
    देख नदियाँ आज सहरा में सिमटती जा रही हैं

    वाह बहुत सशक्त बिम्ब और अर्थ की धार है।

    देख कर अखबार माएं क्यों सिहरती जा रही हैं
    राजेश कुमारी

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  10. सन 1877 ई. में टेस्ट क्रिकेट की शुरुआत के 1882 ई. में आस्ट्रेलिया की टीम ने एक टेस्ट मैच खेलने के इंग्लैंड का दौरा किया। ओवल में हुए इस रोमांचक टेस्ट मैच में इंग्लैंड को जीतने के लिए चौथी पारी में केवल 85 रन बनाने थे। इंग्लैंड की टीम ने 7 विकेट खोकर 75 रन बना लिए, लेकिन अंतिम 3 खिलाड़ी मात्र 2 रन जोड़कर आउट हो गए। आस्ट्रेलिया ने ये मैच 7 रन से जीत लिया। इंग्लैंड की टीम की हार से इंग्लैंड के समर्थक इतने नाराज़ हुए कि इंग्लैंड के एक अखबार में इंग्लैंड क्रिकेट की मौत पर शोक सन्देश तक लिख दिया गया कि

    आस्ट्रेलिया की टीम इंग्लिश क्रिकेट को दफनाकर उसके अवशेष अपने साथ आस्ट्रेलिया ले गई।

    दरअसल हुआ ये था कि कुछ क्रिकेट प्रशंसक महिलाओं ने इस टेस्ट मैच में प्रयोग की गई बेल्स (गिल्ली) को जलाकर उसकी राख (एशेज) को एक डिब्बी में रखकर आस्ट्रेलियाई टीम के कप्तान को भेंट कर दिया था।

    तब से लेकर आज तक इस राख (एशेज) को हासिल करने के नाम पर आस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच "एशेज" नाम से टेस्ट श्रृंखला (सीरीज) का आयोजन होता है।

    रोचक दिलचस्प।

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  11. नायाब संकलन में अपना लिखा पढ़ना बहुत अच्छा लगा।
    बहुत आभार !

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  12. प्लेट-फॉर्म बिन आ रहे, प्लेटफॉर्म पर लोग
    है चुनाव बन जायेगा, इस पर भी आयोग
    यमक अलंकार का सुन्दर प्रयोग। जब एक शब्द किसी पद में एक से ज्यादा बार आये और हर बार नया अर्थ लाये राहुल गांधी की तरह एक आयामी न हो तब यमक अलंकार होता है।

    जैसे "सोनिया" का सोनिया- भाषण झूठ का पुलिंदा था मनरेगा को लेकर सारे आंकड़े झूठे पिरोये गए थे।सन्दर्भ छत्तीस गढ़ में सोनिया।

    प्रयोगात्मक यमकीय दोहे:
    संजीव
    #
    रखें नोटबुक निज नहीं, कलम माँगते रोज
    नोट कर रहे नोट पर, क्यों करिये कुछ खोज
    #
    प्लेट-फॉर्म बिन आ रहे, प्लेटफॉर्म पर लोग
    है चुनाव बन जायेगा, इस पर भी आयोग
    #
    हुई गर्ल्स हड़ताल क्यों?, पूरी कर दो माँग
    'माँग भरो' है माँग तो, कौन अड़ाये टाँग?
    #
    एग्रीगेट* कर लीजिये, एग्रीगेट का आप
    देयक तब ही बनेगा, जब हो पूरी माप
    #
    फेस न करते फेस को, छिपते फिरते नित्य
    बुक न करे बुक फोकटिया, पाठक सलिल अनित्य

    #
    सर! प्राइज़ किसको मिला, अब तो खोलें राज
    सरप्राइज़ हो खत्म तो, करें शेष जो काज


    * एग्रीगेट = योग, गिट्टी

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  13. एक सी होती है
    हर कविता की आत्मा
    आदर्शों को पालने की चाह
    और न पा सकने की विवशता
    पर उम्मीद से भरी उसकी आँखें
    नहीं थकतीं... तो नहीं ही थकतीं !

    जीवन

    मन के एक अँधेरे सूने
    गह्वर के तल में
    घनी गुल्म लताओं के घेरे के पीछे
    किसी एकांत कोने में
    कभी अचानक.. विधु की आभा
    एक पल के लिए
    जगती तल पर स्थित कोई
    फूल हो जैसे !

    गीत

    न सुलाए मोद में जो
    गीत वह जो प्राण भर दे,
    युग-युगों से सुप्त उर में

    सुन्दर भाव कणिकाएं और एक साबुत कविता।

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  14. (१)
    बारी बारी से करें, दरबारी स्तुतिगान |
    गरिमा से गणतंत्र की, खेल रहे नादान |

    खेल रहे नादान, अधिकतर गलतबयानी |
    खानदान वरदान, सयानी रविकर रानी |

    कई पालतू सिंह, पाय के मनसबदारी ।
    जी हुजूर आदाब, बजाते कुल- दरबारी ।

    बहुत ज़ोरदार कोड़ा लगा दिया नकली सिंह को ,शहज़ादा सलीम को।

    बहुत ज़ोरदार कोड़ा लगा दिया नकली सिंह को ,शहज़ादा सलीम को।

    कुलकी रीत सदा चली आई ,

    प्राण जाए पर सीट (कुर्सी )न जाई।

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  15. बहुत सुंदर चर्चा !
    उल्लूक का
    फसल तो होती है किसान ध्यान दे जरूरी नहीं होता है
    दिखाई दिया आभार !
    वीरेंद्र जी की टिप्पणी के लिये पुन : आभार !

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  16. बहुत सुन्दर , विस्तृत व अच्छी चर्चा
    हम सबकी रचनाओं को स्थान देने हेतु , राजीव भाई व चर्चा मंच को धन्यवाद

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  17. बढ़िया प्रस्तुतीकरण है भाई राजीव जी-
    शुभकामनायें शनिवारीय चर्चा पर-

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  18. बहुत बढ़िया चर्चा प्रस्तुति ...आभार!

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  19. राजीव कुमार झा जी शानदार उम्दा चर्चा हेतु बधाई ,मुझे भी शामिल किया तहे दिल से आभार आपका.

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  20. सुन्दर प्रस्तुति!
    आभार!

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  21. बहुत सुन्दर लिंक संयोजन...आभार

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  22. मेरे पोस्ट को शामिल करने के लिए धन्यवाद.

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  23. sundar charcha say saja manch....meri rachna ko shamil karne kay liye shukriya

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  24. राजीव जी, बहुत श्रम से लगायी चर्चा, बधाई व बहुत बहुत आभार !

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  25. गुरु जी प्रणाम
    राजीव जी बहुत बढ़िया सूत्र संकलन
    मेरी रचना को मयंक कोना में स्थान मिला धन्यवाद

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  26. धन्यवाद... मयंक जी....

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