चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

समर्थक

Friday, December 20, 2013

"पहाड़ों का मौसम" (चर्चा मंच:अंक-1467)

मित्रों!
शुक्रवार की चर्चा में मेरी पसंद के लिंक निम्नवत् हैं।
 (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
--
नमन

मुझे कुछ कहना है ....पर अरुणा

--
बेहरूपिये सो रहें हैं- 
समर्थक परजीवी हो रहें हैं
सड़क पर कोलाहल बो रहें हैं----
उम्मीद तो हरी है ... पर jyoti khare
--
कहानी--मौसम
पहाड़ों का मौसम भी बड़ा अजीब होता है. ठीक ज़िंदगी की तरह. अभी धूप, अभी बादल और अभी बरसात. कुछ देर पहले तक आप पसीने से तर बतर हो रहे होंगे, पर अचानक ही तेज़ बर्फीली हवाएं चलने लगेंगी. और आप ठिठुरने कांपने लगेंगे. शाम को आप देखेंगे कि मौसम एकदम खुला और साफ़ है, पर सुबह चरों तरफ सफ़ेद-सफ़ेद बर्फ के फाहे गिरते हुए ...
रात के ख़िलाफ़ पर Arvind Kumar 

--
"आप' रहम करो रहम! (व्यंग्य) 
माननीय आम लाल! आपकी स्थिति ग्राम पंचायत के तुक्के से जीते अनपढ़ रामलाल सरपंच जैसी बनी हुई है। पूर्णतया किंकर्तव्य विमूढ़! दिल्ली और भारत की समस्त भोली भाली जनता की तरफ से कसम है आप सब 'आप" वालों को अपने अपने खुदा की । सरकार बनानी है बनाओ नहीं बनानी है मत बनाओ। पर कम से कम जनता को मत पकाओ...
मेरी सोच, मेरी अभिव्यक्ति पर 

CS Devendra K Sharma "Man without Brain" 
--
बिखरे सितारे 16 - 
बिखरने लगे सारे तारे 
आज ,मै पूजा, खुद आप से रु-b -रु हो रही हूँ...जिन हालातों से गुज़री...जिस मोड़ पे ये दास्ताँ हैं...उस गहराई तक, मुझे ही जाना होगा....अपने मन को टटोल खंगाल के लिखना होगा... मेरे प्रीतम ने जब पहली बार प्यार का इज़हार किया तब एक कविता लिखी थी, जिसे दोहरा रही हूँ...और उसका अंतिम चरण आज बयाँ करती हूँ...
BIKHARE SITARE पर kshama

--
कविता के लिए जरूरी है 
जिन्दगी के पार निकल जाना 
कविता के लिए जरूरी है 
जिन्दगी के पार निकल जाना 
और अन्हादों को गुनगुनाना 
मरा हुआ व्यक्ति कविता नहीं समझता 
मरे हुए शब्द कविता नहीं बनते 
ज़िंदा आदमी कविता समझ सकता ही नहीं 
ज़िंदा शब्द कविता बन नहीं सकते... 
Shabd Setu पर RAJIV CHATURVEDI
--
मुज़़फ्फरनगर का सांप्रदायिक दंगा - भाग-7 -  

 मदरसा गुलज़ारए-मोहम्मदी कैम्प, शाहपुर 
 इस कैम्प में लगभग 4050 शरणार्थी रह रहे हैं। 
सरकार की ओर से कोई सुविधा नहीं ...
लो क सं घ र्ष
--
सिय राम मय सब जग जानी ! 
 राम से राम सिया से सिया ! 
इस धरा पर इनसा कथ जिया !! 
किसको माने राम किसको सिया ! 
सारे कुए में है जब भांग दे दिया ...
स्व रचना पर Girijashankar Tiwari
--
"कुहरा करता है मनमानी"
कुहरा करता है मनमानी।
जाड़े पर छा गयी जवानी।

नभ में धुआँ-धुआँ सा छाया,
शीतलता ने असर दिखाया,
काँप रही है थर-थर काया,
हीटर-गीजर शुरू हो गये,
नहीं सुहाता ठण्डा पानी।
--
तेरा रूप मेरा रंग 

*तू कला मै कविता 
तू सोच मै शब्द 
तू कागज मै कलम ...
चलो बनाएँ एक  
ऐसी बोलती तस्वीर ,,,,,
मेरा मन पंछी सा पर 
Reena Maurya
--
--
आधुनिक मनुष्य को 
जंगली जानवरों से ही 
कुछ सीख लेना चाहिए --
पृथ्वी पर जीवन का आरम्भ मात्र एक कोशिका से होकर आधुनिक मानव के विकास तक की कहानी करोड़ों वर्ष लम्बी है। मानव को स्वयं बन्दरों से विकसित होने में लाखों वर्ष लग गए। आरम्भ में आदि मानव जंगलों में अकेला रहता था , कंद मूल खाता था। जंगली जानवरों की तरह उसका सारा समय भोजन की तलाश में ही गुजरता था। फिर उसने समूह में रहना सीखा और मिलकर शिकार करने लगा। धीरे धीरे उसने रहने के लिए झोंपड़ी बनाना और खेती करना सीखा।  इस तरह उसने समाज में रहना शुरू किया।  समाज बना तो समाज के कायदे कानून भी बने जिनका पालन करना भी उसने सीख लिया। यही समाज विकसित होता हुआ एक दिन आधुनिक मानव के रूप में बदल गया...
अंतर्मंथन पर डॉ टी एस दराल 
--
कांग्रेस के लोकसभा चुनाव 
हारने की आशंका: 

मणि शंकर अय्यर 
--
राजा के कपडे बड़े महीन हैं. पारदर्शी हैं। 
अति सुन्दर हैं कुतुबद्दीन ऐबक ने 
भारत में गुलाम वंश की स्थापना की थी। 
लगता है इतिहास अपने को दोहरा रहा है। 
संसद में लोक पाल बिल पारित होने के बाद से 
गुलाम वंशीय शहज़ादे के पास 
गुलदस्ते लेकर मुस्कुराते हुए पहुँच रहे हैं। 
ये गुलाम वंशी हमेशा ही 
ऐसे मौकों की ताक में रहते हैं।
आपका ब्लॉग पर 
Virendra Kumar Sharma
--
--
डा श्याम गुप्त की ग़ज़ल... 
ये अच्छी बात नहीं ......
गैर के भूल की सज़ा तुझको मिले तो कोई बात नहीं | 
भूल हो तेरी सज़ा और को हो ये अच्छी बात नहीं... सृजन मंच ऑनलाइन
सृजन मंच ऑनलाइन
--
तुम हो तो …मेरी नज़र में
पाथेय प्रकाशन जबलपुर से प्रकाशित कवयित्री प्रतिमा अखिलेश का प्रथम काव्य संग्र "तुम हो तो " छंदमुक्त और छंदबद्ध कविताओं का एक खूबसूरत संकलन है जिसमे प्रेम की प्रधानता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अपने प्रियतम को ही " तुम हो तो " नाम देकर संकलन को समर्पित कर दिया गया है।  संग्रह की विशेषता है कि इसमें जीवन के प्रत्येक पहलू को संकलित करने की कोशिश की गयी है फिर चाहे प्रकृति हो , ईश्वर हो , दलित विमर्श हो या स्त्री विमर्श , सामजिक चेतना हो या राजनितिक विडंबनाएँ सभी विषयों को समाहित करता संकलन वैविध्य की दृष्टि से खुद को विशिष्ठ बनाता है...
ज़ख्म…जो फूलों ने दिये पर 

vandana gupta
--
क्या बात है ??? 
इतनी सख्त हमारी सरकार 
कब से हो गयी ??

नया इंडिया, 19 दिसंबर 2013 : हमारी बाबुओं की सरकार में इतनी हिम्मत अचानक कहां से आ गई? उसने बुलडोजर भेज दिए और चाणक्यपुरी के अमेरिकी दूतावास के आस-पास लगी सीमेंट की बाड़ गिरा दी। उसने अमेरिकी वाणिज्य-दूतावास के अधिकारियों के वे ‘पास’ भी वापस मंगा लिए, जिन्हें दिखाकर वे हवाई अड्डों पर विशेष सुविधाओं के हकदार बन जाते थे...
5TH Pillar Corruption Killer पर 
PITAMBER DUTT SHARMA 
--
--
यह क्या हुआ 

हरे भरे इस वृक्ष को 
यह क्या हुआ 
पत्ते सारे झरने लगे 
सूनी होती डालियाँ...
Akanksha पर Asha Saxena 
--
धर्म के ही नाम पे लड़वा दिया ... 

पाठशाला थी जहाँ तुड़वा दिया 
और इक ठेका नया खुलवा दिया 
खुदकशी का नाम दे के क़त्ल को 
पंचनामा लाश का करवा दिया...
स्वप्न मेरे.... पर Digamber Naswa 
--
तीस फीसदी वोट पा, करे आप व्यभिचार 

रायशुमारी फिर करें, दे सन्देश नकार | 
तीस फीसदी वोट पा, करे आप व्यभिचार | 
करे आप व्यभिचार, तवज्जो पुन: सभा को | 
आप बड़े बेचैन, जरा अंतर्मन झांको ...
रविकर की कुण्डलियाँ
--
कुछ लिंक "आपका ब्लॉग" से
आपका ब्लॉग
--
The girl with three parents: 
Alana was conceived with genetic material from three parents: 
Sharon and Paul Saarinen, 
who provided the egg and sperm, 
and a second woman who contributed 
genes to Alana’s mitochondria, 
the tiny power plants 
that fuel every cell.
--
आरोग्य प्रहरी: 


लहसुन में गुण बहुत है इसमें मौज़ूद रहता है एक यौगिक allicin .
कैंसर रोधी है यह यौगिक डटकर मुकाबला करता है कैंसर का। अलावा 
इसके यह शरीर में ज़मा चर्बी के भंडारों का सफाया करता है। हमारे हृद -
वाहिकीय तंत्र(हृदय और रक्त नालियों ) को सक्षम बनाता है।

वीरेन्द्र कुमार शर्मा
--
गोआ में डोना पौला पर एक शाम [संस्मरण] 
गोवा का डोना पौला टूरिस्ट स्थल ,चारों ओर मौज मस्ती का आलम और टूरिस्ट सेनानियों का जमघट ,ऐसा लग रहा था मानो पूरी दुनियां यहाँ इकट्ठी हो गई हो \सबको इंतजार था सूरज के डूबने का ,बेहद आकर्षक नजारा था \अपने चारों ओर लालिमा लिए सूरज धीरे धीरे क्षतिज की ओर बढ रहा था और सबकी आखें दूर आकाश पर टिकी हुई थी \समुद्र इस रंगीन स्थल को अपने में लपेट कर लहरों की धुन पर ठंडी हवा के तेज़ झोंकों से सबके दिलों को झूले सा हिला रहा था \कई देसी, विदेशी सेनानी ओर भीड़ में कई नवविवाहित जोड़े रंग बिरंगी ड्रेसिज़ और सिर पर अजीबोगरीब हैट पहने ,हाथों में हाथ लिए रोमांस कर रहे थे \कुछ मनचले युवक टोली बना कर घूम रहे थे और कई दम्पति अपने बच्चों सहित छुट्टियाँ मना रहे थे....
रेखा जोशी
--
व्यवहारों का हिसाब 
 गर इंसानी जीवन एक स्वपन समानजिसमें विभिन्न पहलू विद्यमान हैंसंघर्ष भी हर्ष भी आबादी व बर्बादीभी क्षोभ व रौब भी मोह विछोह भी...
--
धन्य हैं वो--पथिक अनजाना 
 धन्य है वो जो दुनिया में परिवारप्रमुख की भूमिका निबाह जिये हैसंलग्न रहते दुनिया व परिवारके लोग बेआबरू करने के लिये है
 पथिक अंजाना
--
आप' ने 
 दर्देदिल,दर्दे जिगर ,दिल में जगाया आप ने 
हम कहीं के ना रहे ,ऐसा हराया आप ने 
खुद तो अट्ठाइस सीटें ,जीत कर गर्वित हुए , 
और हमको , आठ सीटों ,पर जिताया आपने...
*साहित्य प्रेमी संघ* पर Ghotoo 
--
"कठिन बुढ़ापा आया" 
काव्य संग्रह "धरा के रंग" से
 
एक कविता
"कठिन बुढ़ापा आया"
बचपन बीता गयी जवानी, कठिन बुढ़ापा आया।
कितना है नादान मनुज, यह चक्र समझ नही पाया।
"धरा के रंग"
--
मृत्यु के बाद ? 

मौत के बाद क्या होता है? यह सवाल सदा से जिज्ञासा का विषय रहा है,लेकिन आज तक इस सवाल का साफ़ एवं सटीक उत्तर नहीं मिल सका है.पूर्ण मृत्यु के बाद क्या होता है,इसकी विस्तृत जानकारी अभी तक सामने नहीं आई है.लेकिन कुछ देर मृत रहकर,फिर चेतना प्राप्त करनेवाले लोगों ने इस रहस्य भरे प्रश्न के उत्तर अपने-अपने ढंग से दिये हैं. फ़्रांस के डॉ. डेलाकौर ने इसी प्रश्न को अपने अनुसंधान का विषय बनाया.उन्होंने....
देहात पर राजीव कुमार झा 

22 comments:

  1. सूत्र विभिन्न आयाम लिए |मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार (मयंक के कौने में )

    ReplyDelete
  2. सुंदर सूत्र मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार ....

    ReplyDelete
  3. बहुत धन्यवाद ! मयंक जी , मेरी रचना ''उसको कितना करूँ मैं.... '' को शामिल करने के लिए आभार ....

    ReplyDelete
  4. बहुत सुन्दर लिंक्स
    आभार शास्त्री सर…
    :-)

    ReplyDelete
  5. बहुत खूब! हर सही दिशा में उँगली उठी है आज के संयोजन !

    ReplyDelete
  6. सुंदर चर्चा संयोजन.
    मेरे पोस्ट को शामिल किये जाने के लिए आभार.

    ReplyDelete
  7. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
    Replies
    1. सुन्दर चर्चा-
      आभार आदरणीय-
      आज से प्रवास पर हूँ ३० दिसंबर तक-
      सादर

      Delete
  8. सुंदर चर्चा ................ सुन्दर लिंक्स

    ReplyDelete
  9. वाह क्या मौसम है वाकई उल्लूक भी खुश है आभारी है
    आपने उसके पन्ने की तस्वीर जो यहाँ लाकर उतारी है
    "उधर ना जाने की कसम खाने से क्या हो
    वो जब इधर को ही अब आने में लगे हैं"
    को चर्चा में शामिल किया पुन: आभार !

    ReplyDelete
  10. बढ़िया चर्चा प्रस्तुति ....

    ReplyDelete
  11. उलूक के बारे में ही सोच रहे हैं क्या लिखा पढ़ा जा रहा है सब का खाता गढ़े जा रहा है। बढ़िया प्रस्तुति

    बात आये ना आये
    तेरी समझ में कभी भी
    कुछ क्यों नहीं आता है
    “उल्लूक” के बारे में
    भी कुछ सोच
    लिया कर कभी
    उससे भी आँखिर
    कब तक और कहाँ तक
    सब लिखा जाता है !

    ReplyDelete
  12. जीवन और मृत्यु दो दरवाज़े हैं जीव आत्मा एक से निकलके दूसरे में दाखिल हो जाता है। नीअर डेथ एक्सपीरिएंस एक निरंतर अन्वेषण का विषय है। बढ़िया प्रस्तुति।


    मृत्यु के बाद ?

    मौत के बाद क्या होता है? यह सवाल सदा से जिज्ञासा का विषय रहा है,लेकिन आज तक इस सवाल का साफ़ एवं सटीक उत्तर नहीं मिल सका है.पूर्ण मृत्यु के बाद क्या होता है,इसकी विस्तृत जानकारी अभी तक सामने नहीं आई है.लेकिन कुछ देर मृत रहकर,फिर चेतना प्राप्त करनेवाले लोगों ने इस रहस्य भरे प्रश्न के उत्तर अपने-अपने ढंग से दिये हैं. फ़्रांस के डॉ. डेलाकौर ने इसी प्रश्न को अपने अनुसंधान का विषय बनाया.उन्होंने....
    देहात पर राजीव कुमार झा

    ReplyDelete
  13. सुन्दर सौद्देश्य लेखन।


    यही बुढ़ापा अनुभव के, मोती लेकर आया है।
    नाती-पोतों की किलकारी, जीवन में लाया है।।

    मतलब की दुनिया मे, अपने कदम संभल कर धरना।
    वाणी पर अंकुश रखना, टोका-टाकी मत करना।।

    ReplyDelete
  14. माने इसके गूढ़ हैं, इसी बहाने मौत |
    कातिल होती मीडिया, मौत रही नित न्यौत |

    मौत रही नित न्यौत, बनी है निर्णय-कर्ता |
    करता कोई और, यहाँ कोई है भरता |

    बाढ़ी शक्ति असीम, लगी दुनिया बहकाने |
    संवेदना असीम, मीडिया अब तो माने ||

    सटीक मार मारी है इन स्वयं नियुक्त न्यायधीषों पर .

    ReplyDelete
  15. देश के स्वयं नियुक्त सेकुलरिस्टों पर करारा कटाक्ष।

    यही सब तो प्रायोजित करते हैं ये ,

    रोज़ नगर -मुज़फ्फर रचते हैं ,

    गुजरात ने डरते हैं इस शब्द के इस्तेमाल से ,

    हिन्दू नाराज़ हो जाएगा ,

    गोया सेकुलर का मतलब ,

    मुस्लिम वफादारी हो ,मुस्लिम परस्ती हो।

    जय हो दिगंबर नासवा के सशक्त लेखन की।

    ReplyDelete
  16. सुंदर और सार्थक रचनाओं का बहुत खूब संकलन
    सभी रचनाकारों को बधाई
    संयोजन के लिये साधुवाद
    मुझे सम्मलित करने का आभार
    सादर

    ReplyDelete
  17. तमाम सामाजिक आनुवंशिक कारणों को खंगालता बढ़िया आलेख। यह विकृति को ग्लैमराइज़ करने का दौर है इस को ही कलिकाल कहा जाता। वोट भुख्खड़ नकारा सरकार ने पुनर्विचार याचिका ठोक दी है।

    आधुनिक मनुष्य को
    जंगली जानवरों से ही
    कुछ सीख लेना चाहिए --
    पृथ्वी पर जीवन का आरम्भ मात्र एक कोशिका से होकर आधुनिक मानव के विकास तक की कहानी करोड़ों वर्ष लम्बी है। मानव को स्वयं बन्दरों से विकसित होने में लाखों वर्ष लग गए। आरम्भ में आदि मानव जंगलों में अकेला रहता था , कंद मूल खाता था। जंगली जानवरों की तरह उसका सारा समय भोजन की तलाश में ही गुजरता था। फिर उसने समूह में रहना सीखा और मिलकर शिकार करने लगा। धीरे धीरे उसने रहने के लिए झोंपड़ी बनाना और खेती करना सीखा। इस तरह उसने समाज में रहना शुरू किया। समाज बना तो समाज के कायदे कानून भी बने जिनका पालन करना भी उसने सीख लिया। यही समाज विकसित होता हुआ एक दिन आधुनिक मानव के रूप में बदल गया...
    अंतर्मंथन पर डॉ टी एस दराल

    ReplyDelete
  18. मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार

    ReplyDelete

"चर्चामंच - हिंदी चिट्ठों का सूत्रधार" पर

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथा सम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin