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श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

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Monday, December 23, 2013

"प्राकृतिक उद्देश्य...खामोश गुजारिश" (चर्चा मंच : अंक - 1470)

मित्रों!
सोमवार की चर्चा में मेरी पसंद के लिंक निम्नवत् हैं-
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व्योम के उस पार 

दूर क्षितिज तक पसरे 
तुम्हारे कदमों के निशानों पर 
अपने पैर धरती 
तुम तक पहुँचना चाहती हूँ...
Sudhinama पर sadhana vaid
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एहसासों के "जनरल डायर". 

हमे गुस्सा है उन लेखकों से 
जो अपने एहसासों की लहरें 
बस डायरी के सफ़ेद पन्नो मे उड़ेल कर 
अपने मेज़ के कोने मे झटक देते....
खामोशियाँ...!!! पर मिश्रा राहुल
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प्राकृतिक उद्देश्य 

मैं जमीन पर ही कल्पना करती हूँ 
जमीन पर ही जीती हूँ यूँ 
कई बार हौसलों की खातिर 
क्षितिज से मिल आती हूँ :) … 
ले आती हूँ थोड़ी चिंगारी 
जंगल में फैली आग से 
समेट लाती हूँ कुछ कतरे 
जमीन पर खड़े रहने के लिए...
मेरी भावनायें...पर रश्मि प्रभा... 
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काँटों भरी फूलों से सजी ..... 
दुनियां है ये !!! 

क्यों बैठा उदास , 
यूँ हैरान सा क्यों है कुछ तो बता , 
यूँ परेशान सा क्यों है... 
गुलों से गुलज़ार था ये चमन तेरा 
लगता ये आज वीरान सा क्यों है...
यादें...पर Ashok Saluja 
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अभिनव चिकित्सा प्रोद्योगिकी 
और हमारे माहिरों के हुनर ने 
२५ वें हफ्ते में एक साथ पैदा 
गम्भीर रोग ग्रस्त शिशु त्रयी को बचाया 
गर्भावस्था की सामान्य  अवधि ४० सप्ताह बतलाई गई है। 
लेकिन जो शिशु ३९ सप्ताह से पहले ही पैदा हो जाते हैं 
उन्हें समय से पहले पैदा premature babies कहा जाता है। 
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जो लोग नियमित व्यायाम करते हैं 
उनमें लिंगोत्थान अभाव (erectile dysfunction )की सम्भावना 
एक तिहैया ही रह जाती है 
बरक्स उनके जो व्यायाम कसरत आदि से दूर ही रहते हैं। 
ज़ाहिर है उनकी पेनाइल आर्टरी पूरा रक्त नहीं उठा पाती है 
व्यायाम शिश्न धमनियों को भी 
कुछ तो खुला रखने में सहायक सिद्ध होता ही है। 
सेहत 
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मारते पथ्थर अपने पहले -- 
पथिक अनजाना (सतनाम सिंह साहनी ) 
पूछ रही है तुम्हारी निगाहें 
बस दिल में मात्र इक सवाल है 
तुम्हारे प्रति मानव गैर या 
अपनों के दिल में क्या ख्याल है 
प्राय: पाया अपने सबसे पहले 
पथ्थर मारते व उपहास करते हैं 
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एक गीत - 
खिड़कियों के पार का मौसम 

छान्दसिक अनुगायन पर 

जयकृष्ण राय तुषार 
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हाइकू 

(१) 
शिक्षा की देन 
अभिनव अनूप 
वह है यहीं | 
(2) 
थे जब साथ 
कितना सुहाना था 
यह मौसम ...
Akanksha पर Asha Saxena
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"कैसे भाव भरूँ...?" 
 काव्यसंग्रह "सुख का सूरज" से
एक गीत
"कैसे भाव भरूँ...?"
कैसे मैं दो शब्द लिखूँ और कैसे उनमें भाव भरूँ?
तन-मन के रिसते छालों केकैसे अब मैं घाव भरूँ?
मौसम की विपरीत चाल है,
धरा रक्त से हुई लाल है,
दस्तक देता कुटिल काल है,
प्रजा तन्त्र का बुरा हाल है,
बौने गीतों में कैसे मैंलाड़-प्यार और चाव भरूँ?...
सुख का सूरज
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स्कूटर पर जाती महिला 
का सड़क से गुज़रना हो 
या गुज़रना हो काँटों भरी संकड़ी गली से , 
दोनों ही बातें एक जैसी ही तो है। 
लालबत्ती पर रुके स्कूटर पर बैठी महिला के 
स्कूटर के ब्रांड को नहीं देखता कोई भी ... 
नयी उड़ान + पर Upasna Siag
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अनन्य प्रीती...! 
हे जीवन! तुमने कह लिया... 
अब सुनो हमसे... 
जो तुम अब कह पाये शब्दों में, 
वह हमें पहले से ज्ञात है... 
तुम्हें क्या लगता है 
कोई रहस्योद्घाटन किया है तुमने...
अनुशील पर अनुपमा पाठक
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जानते हो मेरे इंतज़ार की इंतेहा 
इश्क और इंतज़ार 
इंतज़ार और इश्क 
कौन जाने किसकी इंतेहा हुयी 
बस मेरी मोहब्बत कमली हो गयी 
और मेरे इंतज़ार के पाँव की फटी बिवाइयों में 
अब सिर्फ तेरा नाम ही दिखा करता है 
खुदा का करम इससे ज्यादा और क्या होगा 
देखूँ जब भी अपना चेहरा तेरा दिखा करता है...
ज़ख्म…जो फूलों ने दिये पर 
vandana gupta
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"ग़ज़ल-नाम तुम्हारा, काम हमारा"

काम तो हमारे हैं, नाम बस तुम्हारा है
पाँव तो हमारे हैं, रास्ता तुम्हारा है


लिख रहे हैं प्यार की इबारत को
बोल तो हमारे हैं, कण्ठ बस तुम्हारा है...
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नयी करवट 
(दोहा-ग़ज़लों पर एक काव्य ) 
(६)ढोल की पोल 
(ख)पेटू पीर
यह सच है कुछ ‘सन्त’ हैं, सच्चे कई ‘फ़कीर’ |
‘आमिल-कामिल’ भी छुपे, होंगे ‘असली पीर’ ||
देवदत्त प्रसून
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:शैल : सफ़र में रहा 
तमाम  उम्र  जिसके  घर  में  रहा  इक  अजनबी  की तरह  

वो चला  तो  चलता  ही  रहा  सफ़र  में हमसफर की तरह  
मैं  ढूंढता  फिरता  रहा,  दर- दर भटका, कहाँ -कहाँ न गया 
धड़कता  रहा   वही शख्स   दिल  में  राहे - रहबर की तरह ..
 शालिमा "शैल"
sanskrit
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17 comments:

  1. सुप्रभात
    चर्चामंच पर आ कर मन जाना नहीं चाहता
    पर क्या करें समय कम पड़ता
    जाना ही पड़ता |
    मेरी रचना शामिल की | आभार |

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  2. बहुत सुंदर चर्चा !
    उल्लूक की 'किताब पढ़ना जरुरी है बाकी सब अपने ही हिसाब से होता है' को शामिल करने के लिये आभार !

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  3. बहुत सुन्दर और पठनीय सूत्र

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  4. उम्दा संग्रह ....आभार..

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  5. सुप्रभात !
    सुंदर चर्चा.

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  6. अच्छी चर्चा. बहुत सुंदर
    मुझे स्थान देने के लिए आभार

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  7. बहुत सुंदर सार्थक चर्चा ! मेरी रचना को सम्मिलित किया आपका धन्यवाद एवँ आभार शास्त्री जी !

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  8. तठस्थ निशानों की तठस्थ चर्चा - बहुत अच्छे लिंक्स ! खुद को देख ख़ुशी हुई,आभार

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  9. काफी सुंदर चर्चा....हमारे लिंक को स्थान देने के लिए आभार....!!!

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  10. बहुत सुन्दर सार्थक चर्चा बहुत बहुत बधाई

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  11. सभी लिंक्स बहुत अच्छे शास्त्री सर !
    मेरी रचना को स्थान देने का आभार
    ~सादर

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  12. बज्हुत ही अच्छा संयोजन प्रस्तुत किया है,साधुवाद ! मेरी रचना को प्रकाशित करने हेतु धन्यवाद !!

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  13. शास्त्री जी ...आभारी हूँ आपके स्नेह का ....

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  14. बहुत अच्छे आज के सूत्र , मंच व शास्त्री जी को धन्यवाद
    || जय श्री हरिः ||

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  15. बहुत सुन्दर लिंक संयोजन |

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