चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

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Thursday, April 10, 2014

"टूटे पत्तों- सी जिन्‍दगी की कड़ियाँ" (चर्चा मंच-1578)

मित्रों!
बृहस्पतिवार के चर्चाकार 
आदरणीय दिलबाग विर्क जी 
चुनाव की ड्यूटी में व्यस्त हैं। 
इसलिए आज की चर्चा में 
मेरी पसंद के कुछ लिंक देखिए।

टूटे पत्तों- सी

जिन्‍दगी की कड़ियाँ

टूटीं- बिखरी।.... 

प्रस्तुतकर्ता 
विचारों की गहनता समझ सामाजिक हालात से जोडते वे यों
तब शायद जानते विचार का महत्व , गिनते शब्द वह क्यों?
--
Junk food may make you lazy: Study 

प्रस्तुतकर्ता 
--
गजल -- मेरी साँसों में तुम बसी हो क्या। 

मेरी साँसों  में तुम बसी हो क्या
पूजता हूँ जिसे वही  हो क्या ...
 अरमानों की डोली आई, जब से मेरे गाँव में।
पवनबसन्ती चलकर आई, गाँव-गली हर ठाँव में।। 
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भाभी-भाभी कहकर बहना, फूली नहीं समाती है,
नयी नवेली नया शब्द सुन, पुलकित हो हर्षाती है,
 सागर से भर लाया माणिक, नाविक अपनी नाव में।
पवनबसन्ती चलकर आई, गाँव-गली हर ठाँव में।।
--
कभी किसी बेखुदी में ऐसा भी हो जाता है  
उलूक टाइम्स
बताने की जरूरत नहीं है उसे 
जिसे पता है वो एक अच्छा वक्ता नहीं है 
बताने की जरूरत नहीं है 
एक अच्छा लेखक होना भी ...
--
बुद्धिवर्धक कहानियाँ -
~ अनमोल रत्न है यह शरीर ~ 


 आशीष भाई की पोस्ट देखें 
--
घने दरख्‍़त तले.... 

कि‍ आ भी जाओ
कोई थमा है
घने दरख्‍़त तले
कि‍सी के इंतजार में......
रूप-अरूप
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जादू की ‘की’ यानी बोले तो मंकी  
# मन की मस्‍त आज चुनाव 
नुक्कड़
इन दिनों जादू की छड़ी की नहीं, 
जादू की चाबी का काला जादू 
उम्‍मीदवारों  के फेस पर मारा जा रहा है। 
वह करें भी तो क्‍या, 
क्‍योंकि ऐसा मौका दोबारा तो मिलने से रहा।
--
निर्धारित शब्द ...  
अनगिनत शब्द जो आँखों से बोले जाते हैं, 
तैरते रहते हैं कायनात में ...  
अर्जुन की कमान से निकले 
तीर की तरह....
स्वप्न मेरे...
--
शंका और समाधान  
कई बार मैं पूछा करता हूँ अपने से 
क्यों ये खुशियों के दिन लगते है सपने से 
और क्यों लम्बी होती है ये दुःख की रातें....
काव्य का संसार
--
--
स्वागत है तुम्हारा ओ छद्मवेषधारियों 
मर्मस्थान पर चोट करना मुझे भी आता है 
मगर 
नहीं करती पलटवार 
क्योंकि  जानती हूँ ये भी एक सत्य 
कि 
नकारात्मकता ही उत्तम सृजन की वाहक होती है 
इसलिए 

स्वागत है तुम्हारा ओ छद्मवेषधारियों ....
ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र
--
--
आभार बंगलुरू 

मेरे लिये ही नहीं, श्रीमतीजी के लिये भी 
बंगलुरू का प्रवास 
कूड़ा प्रबन्धन व बाग़वानी के लिये विशेष रहा। 
यहाँ की जलवायु में पौधों की कई प्रजातियाँ 
उन्होंने गमलों में लगा रखी थीं, 
आगामी नगरों में वे गमले 
इतने हरे भरे नहीं रहेंगे...
न दैन्यं न पलायनम्
--
"सूखे हुए छुहारे, किसको लुभायेंगे अब" 
स्व. अलबेला खत्री जी को श्रद्धाजलि
--

14 comments:

  1. सुंदर चर्चा सुंदर सूत्रों के साथ। 'उलूक' का सूत्र 'कभी किसी बेखुदी में ऐसा भी हो जाता है' को स्थान देने के लिये आभार ।

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    Replies
    1. bahut sundar charcha , sabhi link acche lage , mujhse sthan dene hetu abhaar chacha ji

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  2. बढ़िया चर्चा सूत्र व प्रस्तुति बेहतर ,मेरे सूत्र को स्थान देने हेतु आ. शास्त्री जी व मंच को धन्यवाद !

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  3. आदरणीय शास्त्री जी बहुत ही बढ़िया चर्चा अच्छे लिंक्स ..प्यारे अलबेला जी की श्रद्धांजलि में लिखी आप की रचना मन को छू गयी ये नश्वर देह और मर्त्य संसार ..सब धरा का धरा रह जाना है कल ..मेरी रचना अलबेला जी को श्रद्धांजलि को भी आप ने स्थान दिया यादें बानी रहेंगी
    भ्रमर ५

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    Replies
    1. यादें बनी रहेंगी सदा सदा ....

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  4. बहुत बढ़ि‍या चर्चा....सुंदर लिंक्‍स.....अलबेला जी को श्रद़धांजलि‍....आपकी रचना बहुत अच्‍छी लगी शास्‍त्री जी...मेरी रचना शामि‍ल करने के लि‍ए आभार....

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  5. हर शैर अपना अर्थ और भाव लिए मक्ते का विस्तार लिए खूबसूरत ग़ज़ल कही है :

    मेरी साँसों में तुम बसी हो क्या
    पूजता हूँ जिसे वही हो क्या

    थक गया, ढूंढता रहा तुमको
    नम हुई आँख की नमी हो क्या

    धूप सी तुम खिली रही मन में
    इश्क में मोम सी जली हो क्या

    राज दिल का,कहो, जरा खुलकर
    मौन संवाद की धनी हो क्या

    आज खामोश हो गयी कितनी
    मुझसे मिलकर भी अनमनी हो क्या

    लोग कहते है बंदगी मेरी
    प्रेम ,पूजा,अदायगी हो क्या

    दर्द बहने लगा नदी बनकर
    पार सागर बनी खड़ी हो क्या

    जिंदगी, जादुई इबारत हो
    राग शब्दो भरी गनी हो क्या

    गंध बनकर सजा हुआ माथे
    पाक चन्दन में भी ढली हो क्या
    -------- शशि पुरवार

    चर्चा भी बेहतरीन सजाई है शास्त्रीजी ने ,बधाई सेतु संयोजन और समन्वयन के लिए।

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  6. श्रद्धांजलि विनम्र !

    सहमत जो भी आपने इस नेक पुरुष के विषय में लिखा है :


    कल अचानक फेस बुक पर मिली खबर से दिल झन्न हो उठा कि हमारे प्यारे दुलारे नेक इंसान अलबेला जी हम सब को विलखता सोचता छोड़ इस नश्वर संसार से विदा हो गए कुछ दिनों से फेफड़ों में इंफेक्शन से परेशान थे और सूरत के नानपुरा स्थित महावीर कॉमा अस्प्ताल में कॉमा में अंतिम साँसे ले सब कुछ छोड़ चले !
    अलबेला खत्री जी एक महान हास्य कलाकार थे जो करीब २६ वर्षों से ६००० मंचो पर भारत तथा भारत के बाहर मंचन कर चुके थे वे एक हास्य कलाकार के साथ , कविता लेखन , कहानी और लेख लेखन , अभिनय , गीतों की धुन बनाने में भी माहिर थे और अपने गीत गायन से मन जीत लेने वाले भी थे कोई अहं नहीं था एक सादगी भरे मिलनसार इंसान थे इन्हे टीपा और बागेश्वरी पुरस्कार भी मिल चुका है , इनकी रचनाओं का रसास्वादन इन के ब्लॉग पर भी लिया जा सकता है http://albelakhari.blogspot.in/

    आज के युग में किसी को हँसाना कितना कठिन कार्य है लेकिन वे ये दवा आजीवन बांटते रहे एक महान हास्य कलाकार जहां जिससे मिलते उसके दिल में घर कर लेते कुछ दिनों से जब से हम ओपन बुक्स आन लाईन मंच पर मिले बातें दिलों की सांझा होती रहीं बड़ा आनंद आता था एक अजब मिठास और अब यादें ही यादें सूनापन , एक रिक्त स्थान। . प्रभु उनकी आत्मा को शान्ति दे और उनके करीबी जन को ये दुःख सहने की शक्ति। .
    भ्रमर ५


    दे ऐसा आशीष मुझे माँ आँखों का तारा बन जाऊं

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  7. "आगे शरीर का क्या होगा, यह तो भविष्य ही बतायेगा, पर इस सम तापमान ने मन पर एक विशेष प्रभाव डाला है। मन कहीं अधिक संतुलित और सम हो गया, क्रोध कम हो गया। अब दृष्टिगत असहजता विकार नहीं लाती है अपितु समाधान ढूढ़ने में तत्पर हो जाती है।समत्वता आच्छादित है, स्थितिप्रज्ञता की छिटकी सुगन्ध दे गया बंगलुरू। "

    "वाहनों की गति पैदल के समकक्ष हो गयी, साथ ही वाहनों की अधिकता पैदल यात्रियों की संरक्षा को भयग्रस्त कर बैठी। बाधित यातायात ने औरों की तरह मुझे भी दो गुण सिखाये, धैर्य और अनुशासन। धैर्य इसलिये कि झल्लाने से वाहन उड़ने नहीं लगेगा, अनुशासन इसलिये कि वह तोड़ने से आर्थिक दण्ड और लम्बे जाम। पाँच वर्षों में तो विश्चय ही कुछ माह ट्रैफिक सिग्नल पर बिताये हैं मैंने, पर इन दो गुणों की महत्ता समझने के लिये वह तर्पण भी स्वीकार है जीवन को।"

    "जिस तरह धूप में रहने से उसके प्रति सहनशीलता विकसित हो जाती है, उसी प्रकार आधुनिकता के प्रति भी सहनशीलता विकसित हो गयी है। आधुनिक परिवेश देखकर अब मन भ्रमित नहीं होता है। जहाँ आधुनिकता के सकारात्मक पक्ष के उपयोग का महत्व और क्रियाविधि समझ आ गयी है, वहीं फ़ैशन आदि अन्य नकारात्मक पक्षों को महत्व न देना भी बंगलुरू से ही सीखा है।"

    बंगलुरु शहर एक रिपोर्ताज़ प्रवीण जी की ज़ुबानी बेंगलुरु का सच्चा रोज़नामचा रहा। चैन्नई प्रवास के दौरान हम भी छटे छमाही चलाए आते थे अपने एक मित्र के यहां डेरा डालने। हालाकि की नीयत अब भी मुंबई से भी आने की रहती है आये भी हैं एक आदि बार। पकड़ता है यह शहर कॉस्मोपोलिटन याद आता है यहां का जेकफ्रूट ठेलों मेलों में बिकता।

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  8. सुन्दर सशक्त भाव बोध प्रबंध की रचना

    स्वागत है तुम्हारा ओ छद्मवेषधारियों
    मर्मस्थान पर चोट करना मुझे भी आता है
    मगर
    नहीं करती पलटवार
    क्योंकि जानती हूँ ये भी एक सत्य
    कि
    नकारात्मकता ही उत्तम सृजन की वाहक होती है
    इसलिए

    स्वागत है तुम्हारा ओ छद्मवेषधारियों ....
    ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र

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  9. लेफ्टीयों के रक्त रंगी हाथ आजकल बिलकुल खाली हैं ,

    चलो उनके हाथ कुछ तो आया।
    --
    विकास पुरुष का चेहरा
    सुप्रीम कोर्ट की नजरों में


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  10. आभार आपकी सद्य टिप्पणियों का चर्चा मंच में हमें निरंतर बनाये रहने का। भावपूर्ण काव्यात्मक पुष्पांजलि शब्दांजलि दी है आपने अलवेला को।
    "सूखे हुए छुहारे, किसको लुभायेंगे अब"
    स्व. अलबेला खत्री जी को श्रद्धाजलि

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