चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

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Friday, June 06, 2014

रिश्तों में शर्तें क्यों (चर्चा मंच 1635)

आज के इस शुक्रवारीय चर्चा में मैं राजेंद्र कुमार आपका हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। 
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प्रतिभा वर्मा
किसी भी रिश्ते में
शर्तों की क्या जरूरत
आज तक कभी समझ
में न आया.…
 
डॉ संध्या तिवारी 
बहुत ऊँची उड़ान उड़नी थी उसे
नीले आकाश की ऊँचाइयों में
स्वछंद होकर घूमना था
देखी थी उसने नील गगन को
कई बार घोंसले से निकलकर
       
श्वेता रानी खत्री 
अमेरिका के दक्षिणी तट पर मिसीसिपी नदी की लाई जलोढ़ मिट्टी पर बना लुइसियाना नाम का एक स्टेट है. ये स्टेट अपने खूबसूरत तटवर्ती इलाकों और एक अनोखे पक्षी ‘पेलिकन’ के लिए मशहूर है. लुइसियाना के झंडे और सील पर विराजमान इस पक्षी की खासियत, इसकी अनूठी, लम्बी चोंच है जिसके नीचे एक थैलीनुमा संरचना होती है. पेलिकल नदी के ऊपर आराम से उड़ते-उड़ते अचानक पानी में गोता लगाता है और अपने प्रिय आहार मछली को इसी थैली में कैद कर लेता है. 1950 के दशक में अचानक इस पक्षी की संख्या घटने लग गयी.
       

बेटी ऐसा जन्म न चाहे

शालिनी कौशिक 
हुआ है आज भी देखो 
एक और क़त्ल 
पर कहीं किसी चेहरे पर 
विषाद की छाया नहीं !
       
वीरेंदर कुमार शर्मा 
वह टेक्सीवाला भैया कितनी बड़ी बात कह गया था मुंबई की हवा -पानी -मिट्टी के बारे में प्रदूषण के बारे में :यहां चार सौ रुपया रोज़ की दिहाड़ी है टैक्सी का भाड़ा काटके ,साथ में प्रदूषण है गाँव में आक्सीजन ही ऑक्सीजन पैसा नहीं है।
       
चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’
       
बलबीर राणा "अडिग"
माँ बसुन्धरा को नमन करें
दो फूल श्रधा के अर्पण करें
न होने दें क्षरण माँ का
सब मिल कर यह प्रण करें।
       
(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
मखमली लिबास आज तार-तार हो गया! 
मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!! 

सभ्यताएँ मर गईं हैं, आदमी के देश में, 
क्रूरताएँ बढ़ गईं हैं, आदमी के वेश में, 
मौत की फसल उगी हैं, जीना भार हो गया! 
मनुजता को दनुजता से आज प्यार हो गया!!
       
अर्पणा खरे 
पहले जमाने मे मुद्रा
 नही हुआ करती थी.. 
लोग अपने व्यवहार मे लेन देन
 अनाज बदल कर
 किया करते थे.. 
सब के पास खूब सारा
       
निभा चौधरी की एक रचना
 
(प्रस्तोता-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
लिख़ रही हूँ जाना तेरे नाम की अर्ज़ी
जाने हो क्या आगे रब की मर्ज़ी
तू है निर्मोही सनम बड़ा बेदर्दी
जानु मैं जान प्यार तेरा फर्ज़ी
देख मेरे दिल की खुदगर्ज़ी
चाहे तुझे ही फिर भी
पूज़े तुझे जी
       
सुनील दीपक 
जेनेवा, स्विटज़रलैंडः झील के किनारे पर ब्रुन्सविक स्मारक बना है जिसमें एक ओर घोड़े पर बैठा शूरवीर राजकुमार ब्रुन्सविक है और दूसरी ओर मूर्तियों से घिरी हुई उसकी कब्र. यह जर्मनी के ब्रुन्सविक राज्य के देशनिकाले राजकुमार कार्ल द्वितीय का स्मारक है, जिन्हें उनके राज्य की जनता ने उनकी भ्रष्ठता के विरुद्ध क्राँती करके राज्य से भगा दिया था और जिन्हें जेनेवा में शरण मिली थी. व्यक्ति भ्रष्ठ हो या नहीं, अगर पैसेवाला हो तो उसके सुन्दर स्मारक भी बनते हैं और लोग नाम भी याद रखते हैं!
       
साधना वैद 
एक शाम एक बस्ती से निकलते वक्त कुछ दृश्य जो मन को झकझोर गये उन्हें ही आपके सामने प्रस्तुत करने का यह छोटा सा प्रयास है  
रसोई में बैठी गृहणी
चिंतित और संकुचित है
देगची में थोड़ी सी सब्जी है
दिन भर खट के आये
घरवाले के लिये बचा लूँ
या फिर बढ़ती आयु के
बच्चों की थाली में परोस दूँ ? 
       
 रेखा जोशी 
रात चाँदनी शीतल पवन
घर आजा तू मेरे सनम

तुझको बुलाए ठंडी हवाएँ
आँचल मेरा उड़ उड़ जाए
शीतल पवन अगन लगाये
घर आजा तू मेरे सनम
       
यशोदा अग्रवाल 
आओ आंगन-आंगन अपने
चम्पा-जूही-गुलाब-पलास लगाएं
सौंधी-सौंधी खूशबू से अपना
चमन चंदन-सा चमकाएं
हरियाली फैलाकर
ऑक्सीजन बढ़ाएं
       
नवेदिता दिनकर 
एक कोने में बैठकर, 
निहारती रही, 
पूरे कमरे में
 तुम बिखरे हुए हो
      
रेखा श्रीवास्तव 
माँ को हम सबसे अधिक ज्ञानी , अनुभवी और प्यार देने वाली समझते हैं और ऐसा होता भी है लेकिन कई बार ऐसी बातें होती हैं जिनके बारे में हम जानते है और न उसकी जरूरत समझते हैं। फिर अचानक कुछ ऐसा पता चले तो सहसा उसके लिए विश्वास नहीं कर पाते हैं और वास्तविकता जानने के बाद भी.रविन्द्र जी
      

अब रोने चिल्लाने 
पर कैसे गीत 
या गजल 
लिखी जाये 
बस यूँ ही ऐसे ही 
क्यों ना कुछ 
रो लिया जाये 
चिल्ला लिया जाये 
वैसे भी कौन 
पढ़ या गा रहा है 
रोने चिल्लाने को 
सब फालतू है
(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
जिन्हें पाला था नाज़ों से, वही आँखें दिखाते हैं।
हमारे दिल में घुसकर वो, हमें नश्तर चुभाते हैं।।

जिन्हें अँगुली पकड़ हमने, कभी चलना सिखाया था,
जरा सा ज्ञान क्या सीखा, हमें पढ़ना सिखाते हैं।

भँवर में थे फँसे जब वो, हमीं ने तो निकाला था,
मगर अहसान के बदले, हमें चूना लगाते हैं।
हर्षवर्धन 
आज विश्व पर्यावरण दिवस ( World Environment Day ) है। विश्व पर्यावरण दिवस प्रत्येक वर्ष 5 जून को मनाया जाता है। ऐसा पहला दिवस सन 1972 ई. में मनाया गया था। विश्व पर्यावरण दिवस संयुक्त राष्ट्र द्वारा पर्यावरण के संरक्षण के लिए दुनिया भर में मनाया जाता है।
      
हितेश राठी 
कभी कभी हमें यह जानने की जरुरत पड़ती हे की हमारे computer में कोनसी Microsoft DOTNET framework इनस्टॉल हे ! लेकिन बिना तकनिकी जानकारी के हम यह पहचान नहीं पा...
      

15 comments:

  1. बहुत सुन्दर लिंकों को आपने आज चर्चा मंच की माला में पिरोया है।
    आदरणीय राजेन्द्र कुमार जी आपका आभार।

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  2. Behad khubsurat sutron se saja manch...nice effort

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  3. शुभ प्रभात भाई राजेन्द्र जी
    अच्छी हलचल दी रचनाओं की आज
    साधुवाद
    सादर

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  4. मेरी पोस्ट को शामिल करने के लिए शुक्रिया!

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  5. बहुत ही सुन्दर लिंक्स ... आभार राजेन्द्र जी .

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  6. bahut sundar links rajendra ji ..........mujhe shamil karne ke liye dhanyvad..........

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  7. सुन्दर प्रस्तुति-
    बहुत बहुत शुभकामनायें आदरणीय-

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  8. सुंदर सार्थक सूत्रों से सुसज्जित आज का चर्चामंच ! मेरी रचना को इसमें सम्मिलित किया हृदय से धन्यवाद एवं आभार आपका !

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  9. बढ़िया लिंक्स व शानदार प्रस्तुति , राजेंद्र भाई व मंच को धन्यवाद !
    I.A.S.I.H - ब्लॉग ( हिंदी में समस्त प्रकार की जानकारियाँ )

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  10. बहुत बहुत शुक्रिया राजेन्द्र जी मेरी पोस्ट यहाँ तक पहुँचाने के लिए।

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  11. sabhi links ek se badhkar ek .aabhar

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  12. धन्यवाद राजेंद्र कुमार जी, आपके प्रोत्साहन भरे शब्दों के लिए। आशा करती हूँ कि मेरी रचना सबको पसंद आये, सादर
    http://niveditadinkar.blogspot.in/

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  13. बहुत बढ़िया चर्चा प्रस्तुति !
    आभार !

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  14. बहुत ही अच्छा है श्रीमानजी आपका लिन्क सराहनिय तथा प्रशसनीय है
    हितैश गर्ग

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