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Tuesday, September 09, 2014

वह दारुल इस्लाम, किन्तु हैं लोग जुनूनी ; चर्चा मंच 1731

रविकर 

खूनी धरती झेलती,  युगों युगों का शाप । 
काले झंडे के तले, रही मनुजता काँप । 

रही मनुजता काँप, क़त्ल कर जश्न मनाता। 
बग़दादी का वार,  गोश्त जिन्दों का खाता  । 

वह दारुल इस्लाम, किन्तु क्यूँ लोग जुनूनी । 
गैर धर्म कर साफ़, खेल क्यूँ खेलें खूनी ॥ 


chandan bhati 

Prakashchand Bishnoi 


प्रतुल वशिष्ठ 

shashi purwar
Virendra Kumar Sharma 
कालीपद "प्रसाद" 

Shalini Kaushik 

Onkar 




5 comments:

  1. सुप्रभात
    बारिश क़यामत ढा गयी |इससे निवटने में कितना समय लगेगा यह तो वहां के लोग ही जानते हैं |
    हमारी संवेदनाएं उनके साथ हैं |
    उम्दा लिंक्स आज चर्चा मंच में |
    मेरी रचना शामिल करने के लिए धन्यवाद सर |

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  2. सुंदर सूत्र. मेरी रचना को जगह देने के लिए शुक्रिया

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  3. बहुत सुंदर सूत्र संयोजन सुंदर मंगलवारीय चर्चा रविकर जी ।

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  4. बहुत बढ़िया चर्चा प्रस्तुति
    आभार!

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