चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

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Friday, December 26, 2014

‘जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि’ (चर्चा अंक-1839)

नमस्कार मित्रों, आज की चर्चा में आप सब का हार्दिक अभिनन्दन है। आप सभी को क्रिस्मस पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ ! प्रस्तुत है आज के कुछ चुनिंदा लिंको की चर्चा। सर्वप्रथम द्विजेन्द्र 'द्विज' की एक सुन्दर ग़ज़ल को देखते हैं।
अँधेरे चंद लोगों का अगर मक़सद नहीं होते
यहाँ के लोग अपने आप में सरहद नहीं होते

न भूलो, तुमने ये ऊँचाईयाँ भी हमसे छीनी हैं
हमारा क़द नहीं लेते तो आदमक़द नहीं होते

फ़रेबों की कहानी है तुम्हारे मापदण्डों में
वगरना हर जगह बौने कभी अंगद नहीं होते

तुम्हारी यह इमारत रोक पाएगी हमें कब तक
वहाँ भी तो बसेरे हैं जहाँ गुम्बद नहीं होते

चले हैं घर से तो फिर धूप से भी जूझना होगा
सफ़र में हर जगह सुन्दर घने बरगद नही होते
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यशवंत यश 
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निवेदिता दिनकर 
कभी कभी ख़ुशी का कारण भी बनना, कितना सुखदायक होता है, न। आज फूटपाथ पर फेरी लगाकर बैठने वाले से जब मैंने ऊनी दस्ताने ख़रीदे या जब पैसे देने की जगह उस पतले ...
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साधना वैद
कैसा लगता है 
जब गहन भावना से परिपूर्ण 
सुदृढ़ नींव वाले प्रेम के अंतर महल को 
सागर का एक छोटा सा ज्वार का रेला 
पल भर में बहा ले जाता है । 
अनीता शर्मा 
प्रखर राष्ट्रवादी भारतमाता के सपूत पं. अटल बिहारी वाजपेयी जी का जन्म दिवस '25 दिसंबर' को 'सुशासन दिवस' के रूप में मनाने का निर्णय अति प्रशंसनिय है। आदरणीय अटल जी अनुशासन के परिचायक हैं।
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श्यामल सुमन
तेरा हो या मेरा हो
हृदय प्रेम का डेरा हो
खुद को पात्र बना ले यूँ
जैसे कुशल ठठेरा हो
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ऋता शेखर 'मधु'
मन के अपरिमित वितान पर
बिछे हुए हैं शब्द अथाह
कुछ कोमल कुछ तपे हुए
कुछ हल्के कुछ सधे हुए
अधर द्वार पर टिक जाते
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 (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
मधुमक्खी है नाम तुम्हारा।
शहद बनाना काम तुम्हारा।।

छत्ते में मधु को रखती हो।
कभी नही इसको चखती हो।।

कंजूसी इतनी करती हो।
रोज तिजोरी को भरती हो।।
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रश्मि शर्मा
' मेरे घर के आंगन में आकर सुस्‍ताया था शाम सूरज
कहा-कल 'बड़ा दि‍न' है, बहुत देर तक चलना होगा ''
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जी.के. अवधिया

क्रिसमस (Christmas) ईसु मसीह के जन्म की याद में मनाया जाने वाला त्यौहार है।
बाइबिल में ईसु मसीह के जन्म के विशिष्ट दिन के बारे में कोई भी उल्लेख नहीं है।
क्रिसमस (Christmas) का त्यौहार प्रतिवर्ष 25 दिसम्बर को मनाया जाता है।
प्रबोध कुमार गोविल 
वो आ रहा है। हम खुश हों, कि वो आ रहा है, या हम उदासीन हो जाएँ, वो तो आ रहा है। क्योंकि वो हमारी नहीं, अपनी चाल से आता है, इसलिए हरबार आता है। इस बार भी आ रहा है।
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अपर्णा त्रिपाठी 
मनोहर भइया आज हमार जी मा बार बार रहि रहि के जाने काहे ई बिचार आ रहा है जइसन हम कउनो दगा करा है। हमका कुच्छौ समझ नही आ रहा, का सही है का गलत। अब आपै हमाका रास्ता दिखाओ।
प्रतिभा वर्मा 
माँ तेरे लिए वो ख़ुशी
कहाँ से लाऊँ
कहाँ से वो तेरा
सुकून लाऊँ
हाँ मैंने वादा किया था
बाबा से..
कि तुझे हर ख़ुशी दूँगी
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शिखा कौशिक 'नूतन '
ओमप्रकाश बाबू के घर में गर्मियों की छुट्टियाँ आते ही रौनक आ गयी .विवाहित बेटा सौरभ व् विवाहित बेटी विभा सपरिवार अपने पैतृक घर जो आ गए थे .ओमप्रकाश बाबू का पोता बंटी व् नाती चीकू हमउम्र थे और सारे दिन घर में धूम मचाते .एक दिन चीकू दौड़कर विभा के पास रोता हुआ पहुंचा और सुबकते हुए बोला -'' ''मम्मा चलो यहाँ से ......
विशाल चर्चित
काल के कपाल पर भी
लिख चुके हैं नाम आप,
इतिहास नहीं भूलेगा
कर चुके वो काम आप...
सत्ता में आते ही
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नीरज कुमार नीर 
सितारों से सजे बड़े बड़े होटलों में, 
नरम नरम गद्दियों वाली कुर्सियां,
 करीने से सजी मेजें, मद्धिम प्रकाश,
 अदब से खड़े वेटर, 
खूबसूरत मेन्यू पर दर्ज, 
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(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मानवता के लिए,
सलीबों को जिसने अपनाया।
लोहे की कीलों से,
अपना तन जिसने बिंधवाया।
आओ उस यीशू को,
हम प्रणाम करें!
उस बलिदानी का,
आओ गुणगान करें!!
कालीपद "प्रसाद"
कुछ ही दिन पहले मैंने ब्लॉग में एक लेख पढ़ा l एक महिला ने नारी की दयनीय दशा का जिम्मेदार हिन्दू धर्म ग्रंथों को माना है l उन्होंने कहा कि पुरुषप्रधान समाज में पुरुषों द्वारा रचित धर्मग्रंथों के आधार पर पुरुषों के सुविधानुसार नारी को कभी पूजनीय कहा है, तो कभी बुद्धिहीन,पतित ,अपावित्र , ताड्निया कहा हैl
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सुशील बाकलीवाल 
डेंगू की बीमारी एक बार फिर देश भर में पैर पसार रही है । यह एक बड़ी समस्या के तौर पर उभर रही है, पूरे भारत में ये बड़ी तेजी से बढ़ती जा रही है
प्रवीण चोपड़ा 
आप ने नोटिस किया होगा जब रात के वक्त सोते समय हमें अपने अपने मोबाइल पर कोई मैसेज देखना या पढना पड़ता है, तो हमें कितना भारी लगता है यह सब। कम से कम मुझे तो ऐसा लगता है।

14 comments:

  1. अद्यतन लिंकों के साथ व्यवस्थित चर्चा।
    आपका आभार आदरणीय राजेन्द्र कुमार जी।

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  2. कितने सारे लिंक ... बहुत ही श्रमसाध्य कार्य आपका राजेंद्र जी ... हार्दिक आभार मेरी रचना को शामिल करने के लिए .....

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  3. सुन्दर चर्चा, बहुत सारे लिंक अच्छे लग रहे है, दिन मे आराम से पढेगे। मेरी रचना को स्थान देने के लिये धन्यवाद

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  4. माननीय कालीप्रसाद जी के लेख पुरुष ,नारी ,दलित और शास्त्र के ऊपर मैंने उनके ब्लॉग पर जो टिप्पणी लिखी उसे यहाँ भी शेयर करना चाहता हूँ ।
    मान्यवर ये विचार आपके हैं या उस ब्लॉग लेखिका के ? खैर किसी भी हालत में शास्त्रों के ज्ञान का अभाव इसमे स्पष्ट परिलक्षित होता है। ईश्वर के अस्तित्व के संबंध में शास्त्रों में वृहत चर्चा है , आवश्यकता है उन्हे गहनता से पढ़ने की । जहां तक अवतार का प्रश्न है तो अवतार की परिकल्पना के सबंध में समाज में व्यापक भ्रांतियाँ है। देखिये ईश्वर अगोचर , अजन्मा , नित्य है , जो नित्य है उसकी जन्म और मृत्यु कैसी ? इन विषयों पर किसी भी निष्कर्ष पर पहुचने से पहले , अपनी ओर से जानकारी प्राप्त करने की पूरी कोशिश की जानी चाहिए। जहां तक अर्द्ध नारीश्वर का प्रश्न है, जो पूर्ण है वही पुरुष है वही नारी है या यूं कहें वह पुरुष भी है वह नारी भी है, परेशानी क्या है कि लोग चित्र के हिसाब से ईश्वर को ढूँढने लग जाते है, ईश्वर चित्रों में नहीं बसा करता ..... :) और चित्रों में ईश्वर नहीं है ऐसी बात भी नहीं :)
    और जहां तक मनुस्मृति की बात है , तो हमारा धर्म कभी किसी भी व्यक्ति पर कोई विचारधारा थोपता नहीं है , यह इस्लाम या ईसाइयत की तरह नहीं है , जहां जो बात है सबको मानना होगा, यहाँ, विचार और उसके अनुसार अमल की स्वतन्त्रता है ॥ यहाँ ईश्वर को मानने की या नहीं मानने की ॥ उसे पत्थरों में देखने की या निराकार समझने की पूरी स्वतंत्रता है और यह आज से नहीं है वरन सहस्राब्दियों से है। जो पूर्ण है वही शून्य है जो शून्य है वही पूर्ण है ........। मुझे नहीं लगता अधिकांश लोग जो शास्त्रों के संबंध में ऐसे निर्णय पर पहुचते , ऐसे किसी निर्णय से पहले उन्हे संपूर्णता में पढ़ते है ॥ बस कहीं अखबार में पढ़ लिया , कहीं पत्रिका में पढ़ लिया या कहीं सुन लिया और अपनी धारणा बना ली ......... सबसे बड़ी बात हमारा धर्म हमे पूरी स्वतन्त्रता देता है कि हम किसी बात को पहले उस पर विचार करें , समझे और तब फिर माने ... यह स्वतंत्रा अन्यत्र उपलब्ध नहीं है, अन्यत्र सर काट लाने का फतवा की व्यवस्था है... अपने यहाँ कभी सुना कि मेजोरिटी विचार से अलग विचार रखहने पर उनका सर काट दिया गया। यहाँ गुरुनानक के लिए भी जगह है और दयानन्द सरस्वती का भी दर्शन स्वीकार्य है .... इसलिए अपने धर्म के प्रति गौरवान्वित होइए .... यह सबसे विशिष्ट एवं व्यापक धर्म है ।


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  5. सुन्दर सार्थक लिंक्स राजेन्द्र कुमार जी ! मेरी रचना को सम्मिलित करने के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद एवं आभार !

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  6. बहुत सुन्दर चर्चा प्रस्तुति ...आभार!

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  7. सुन्दर सामयिक चर्चा और सूत्र राजेंन्द्र कुमार जी |

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  8. मेरी रचना शामि‍ल करने के लि‍ए धन्‍यवाद....सुंदर चर्चा।

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  9. एक सुंदर गजल और सुंदर सूत्रों से सजी सुंदर चर्चा ।

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  10. Achchha hota hai aapka chayan.Kafi sochte honge!

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  11. सुन्दर चर्चा
    आभार आदरणीय-

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  12. सुन्दर सूत्रों से सजी सुव्यवस्थित चर्चा...मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार !!

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