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Friday, October 31, 2014

"धैर्य और सहनशीलता"(चर्चा मंच-1783)

आज के इस चर्चा में आप सभी का हार्दिक अभिनन्दन है।
प्रिये मित्रों, जीवन में ऊचां उठने और तरक्की करने का महामंत्र है धैर्य एवं सहनशीलता। जो अपने आदर्श से नहीं हटता, धैर्य और सहनशीलता को अपने चरित्र का भूषण बनाता है, उसके लिए शाप भी वरदान बन जाता है। प्रतीक्षा, लगन, सहनशीलता, हौसला..! धैर्य के बड़े गुण को आप कोई भी छोटा नाम दें, परिणाम सुखद ही होते हैं। इतिहास के पन्नों में झांकें, तो इस एक गुण के बल पर बड़े बदलाव अंजाम दिए गए। लेकिन, आजकल यह आम जिंदगी से कम होता जा रहा है, फिर बात चाहे देव दर्शन की हो या राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मुद्दों की। अगर धैर्य की कला खुद में विकसित कर ली जाए, तो खुशी जिंदगी का स्थायी हिस्सा बन जाती है। सहनशीलता जिसमें नहीं है, वह शीघ्र टूट जाता है. और, जिसने सहनशीलता के कवच को ओढ़ लिया है, जीवन में प्रतिक्षण पड़ती चोटें उसे और मजबूत कर जाती हैं।
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डॉ. मोनिका शर्मा जी की प्रस्तुति 
परम्पराएँ ज़मीन से जोड़ती हैं । बांधती नहीं बल्कि हमें थामें रखती हैं । इनमें जो विकृति आई है वो हमारा मानवीय स्वाभाव और स्वार्थ ही लाया है । गहराई से देखें तो रीत रिवाज़ और परम्पराओं ने हमें बिखरने नहीं दिया ।
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 डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी की प्रस्तुति 
हमको प्राणों ,से प्यारा, हमारा वतन!
सारे संसार में, सब से न्यारा वतन!!
गंगा-जमुना निरन्तर, यहाँ बह रही,
वादियों की हवाएँ, कथा कह रही,
राम और श्याम का है, दुलारा वतन!
सारे संसार में, सब से न्यारा वतन!!
योगी सारस्वत जी की प्रस्तुति 
काँगड़ा माता को नगरकोट वाली माता भी कहते हैं और ब्रजेश्वरी देवी भी ! ब्रजेश्वरी का नाम मुझे कांगड़ा में ही पता चला ! ब्रजेश्वरी मंदिर , ऐसा कहा जाता है कि सती के जले हुए स्तनों पर बनाया गया है ! ये मंदिर कभी ....... 
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अनीता जी की प्रस्तुति 
सद्गुरु में ज्ञान की सुगंध होती है जो हमें अपनी ओर खींचती है. उसमें प्रेम की आध्यात्मिक सुरभि होती है जो हमें आकर्षित करती है. एक पवित्र गंध ईश्वर की याद का साधन होती है. जो रब की याद दिलाये उसका विश्वास कराए, जिसे देखकर सिर अपने आप झुक जाये. वही तो सद्गुरु होता है.
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फ़िरदौस खान जी की प्रस्तुति 
प्रिय पाठकों !
बहुत लोग हमें इनबॊक्स मैसेज करके कहते हैं-
आपकी दर्द से लबरेज़ तहरीर दिल में उतर जाती है...
आपकी तहरीर ने हमें रुला दिया...
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निहार रंजन जी की प्रस्तुति 
कब तक मिथ्या के आवरण में
रौशनी भ्रम देती रहेगी
कब तक भ्रामक रंगों में बहकर
उम्मीद अपनी नैया खेती रहेगी ?
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अर्पणा त्रिपाठी जी की प्रस्तुति 
शायद उसने किसी का कत्ल भी कर दिया होता तो भी उसका परिवार उसको माफ कर देता, मगर उसका गुनाह तो इससे भी कही बडा था । एक ऐसा गुनाह जो उसके परिवार को आज समाज में सम्मान से जीने का अधिकार नही देता।
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साधना वैध जी की प्रस्तुति 
संध्या के चेहरे पर पड़ा
खूबसूरत सिंदूरी चूनर का
यह झीना सा अवगुंठन
आमंत्रित कर रहा है
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नीरज कुमार नीर जी की प्रस्तति 
कोमल फेन
 हाथ आते ही बन जाता जल 
भीतर रहता 
हिल्लोल लेता 
महासागर अतल 
प्रवीण चोपड़ा जी की प्रस्तुति 
यह ५०- ५५ वर्ष की महिला के दांतों की तस्वीर है.....आई तो थी ये दांत दिखाने नीचे वाले दांत....
वीरेन्द्र कुमार शर्मा जी की प्रस्तुति 
हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर ,बैठ शीला की शीतल छाँव 
एक पुरुष भीगे नयनों से देख रहा था ,प्रलय प्रवाह ,
नीचे जल था ऊपर हिम था ,एक तरल था एक सघन ,
एक तत्व की ही प्रधानता ,कहो इसे जड़ या चेतन।
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रचना त्रिपाठी जी की प्रस्तुति 
औरत होकर ये तेवर 
किसने दी तुम्हें इजाजत 
चीखने -चिल्लाने की 
ये तो है मर्दों का हुनर
कविता रावत जी की प्रस्तुति 
31 अक्टूबर 1875 ईं. को गुजरात के खेड़ा जिला के करमसद गांव में हमारे स्वतंत्रता-संग्राम के वीर सेना नायक सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म हुआ। इसी दिन पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि भी है,
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कुँवर कुसुमेश जी की प्रस्तुति
वो भी अमृत-सा नज़र आयेगा जो विष होगा। 
हरिक जिरह पे कभी दैट कभी दिस होगा।
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चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ जी की प्रस्तुति
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गरिमा जी की प्रस्तुति 
नया सवेरा आया
बहुत सारी खुशियाँ लाया
पर्वत पर छायी लाली
दुनिया में एक नया दिन आया
सब तरफ छायी खुशियाँ
नया सवेरा आया
सबके घर में आने वाली ढेर सारी खुशियाँ
भागेगा अँधेरा आयेगा उजाला
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प्रतुल वशिष्ठ जी की प्रस्तुति 
भूल गए हो क्रिया 'बाँधना'
जबसे गाँठ पड़ी मन में 
कोमल धागे खुले रह गए 
इस बारी फिर सावन में।
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मोहन श्रीवास्तव (कवि ) जी की प्रस्तुति 
होगी जब उनसे मुलाकात मेरी,
दो दिल खुशियों से तो भर जाएंगे । 
वो जब लेंगे अपनी बाहों में ,
मेरे पलकों को शरम आएंगे ॥ 
होगी जब उनसे......
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परी ऍम 'श्लोक' जी की प्रस्तुति
बड़ी रोशनी है 
आपकी सीरत में
चौंधिया गए इरादे हमारे
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महीने के अंतिम साँस 
लेने की आवाजें 
आनी शुरु होती ही हैं 
अंतिम सप्ताह के 
अंतिम दिनों में
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Wednesday, October 29, 2014

आइये मनाते हैं बासी दीपावली : चर्चा मंच 1781

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पंकज सुबीर 
2
smt. Ajit Gupta 
3
चरित्र  (पुरुषोत्तम पाण्डेय) 
4
5
shikha kaushik 
6
7
Asha Joglekar
8
Admin Deep
9
विशाल चर्चित 
11
13



आप आकर मिले नहीं होते
प्यार के सिलसिले नहीं होते

बात होती न ग़र मुहब्बत की
कोई शिकवे-गिले नहीं होते.. 
14
Anita 
15

16
कार्ट्रून:-अब बच कर कहां जाएगा कालाधन

Kajal Kumar 

Tuesday, October 28, 2014

"माँ का आँचल प्यार भरा" (चर्चा मंच-1780)

मित्रों।
आदरणीय रविकर जी उत्तरप्रद्श के प्रवास पर हैं।
मंगलवार की चर्चा में मेरी पसन्द के लिंक देखिए।
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जन गण मन के 5 पद...  

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा 1911 में रचित इस रचना के पहले पद को भारत का राष्ट्रगान होने का गौरव प्राप्त है। रचना में कुल पाँच पद हैं। राष्ट्रगान के गायन की अवधि लगभग 52 सेकेण्ड है । कुछ अवसरों पर राष्ट्रगान संक्षिप्त रूप में भी गाया जाता है, इसमें प्रथम तथा अन्तिम पंक्तियाँ ही बोलते हैं जिसमें लगभग 20 सेकेण्ड का समय लगता है। संविधान सभा ने जन-गण-मन को भारत के राष्ट्रगान के रुप में 24 जनवरी 1950 को अपनाया था। इसे सर्वप्रथम 27 दिसम्बर 1911 को कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया गया था। इस रचना की भाषा संस्कृत-मिश्र बांग्ला है... 

रवीन्द्रनाथ ठाकुर

आपका ब्लॉग पर kuldeep thakur
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चौराहा 

Kailash Sharma 
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गर्दनों पे आरियाँ चारों तरफ हैं 
खून की पिचकारियाँ चारों तरफ हैं 
ना किलेबंदी करें तो क्या करें हम 
युद्ध की तैयारियाँ चारों तरफ हैं... 
स्वप्न मेरे... पर Digamber Naswa 
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पशोपेश में हूँ 

जिस तरह 

संदेह के  बादलों से नहीं नापी जा सकती पृथ्वी की गहराई
दम्भ के झूठे रागों से नहीं बनायीं  जा सकती मौसिकी 
उसी तरह 
संदिग्ध की श्रेणी में रखा है खुद को ...
एक प्रयास पर vandana gupta
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बबन विधाता 

बबन विधाता लेके छाता, 
निकल पड़े बरसात में। 
फिसले ऐसे गिरे जोर से, 
कैसे चलते रात में। 
कीचड़ में भर गए थे कपड़े, 
देखे बबन विधाता। 
इसी बीच में उड़ गया उनका, 
रंग-बिरंगा छाता... 
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आज आप सब को एक नई जानकारी देता हूँ मेरे शरारती बच्च १८५७ को अंग्रेज गदर मानते है पर हम लोग उसे स्वतंत्रता का प्रथम युद्द मानते है -- उस युद्द में जहा देश के सारे लोगो ने अपने प्राणों की आहुति दी वही पर महारानी लक्ष्मी बाई की बुआ महारानी तपस्वनी और देवी चौधरानी ये दो महान बलिदान को भुलाया नही जा सकता है... 
शरारती बचपन पर sunil kumar 
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इरादा 

उसकी सारी कोशिशे सारी जिद अनसुनी कर दी गईं। लाख सिर पटकने पर भी उसकी माँ ने उसे तैरना सीखने की अनुमति नहीं दी। मछुआरे का बेटा तैरना ना जाने , बस्ती के लोग हँसते थे पर वो डरी हुई थीं... 
कासे कहूँ? पर kavita verma
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"गुस्ताख़ी" 

आज पन्ना है सहमा हुआ 
डरा स्याही का क़तरा हुआ 
गम ए इश्क़ आ सीने से लग जा ज़रा 
दिल को आघात बहुत गहरा हुआ... 
तात्पर्य पर कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र
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सुनो पथिक अनजाने तुम 

कविताओं में "तुम " शब्द का प्रयोग 
कविता को व्यापक विस्तार देता है... 
उसी विषय पर आधारित रचना...  
सुनो पथिक अनजाने तुम 
लगते बड़े सुहाने तुम 
कविताओं में आते हो 
अपनी बात सुनाने तुम... 
मधुर गुंजन पर ऋता शेखर मधु 
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यूँ तो टूट जाती है कसमें

वक़्त के सलीबों से टकरा कर
वादें भूल जाते हैं
या फिर जान-बूझ कर
भुला दिए जातें है
मगर
तुम्हे इक मौका है
आओ!
मेरी यकीन को हवा दे दो... 

© परी ऍम. "श्लोक
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... "प्रिय मित्र.. 
यूँ अंतर्मन की लकीरों को 
आपसे बेहतर कौन पढ़ सकता है..?? 
इन आड़ी-तिरछी बेबाक़..अशांत.. 
अविरल लहरों का माप और ताप.. 
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कुछ इस कदर, कुछ इस तरह का, गुमाँ है उन्हें 'उदय' 
शाम, शमा, दीप, रौशनी, सब खुद को समझते हैं वो ? 
सच ! तेरे इल्जामों से, हमें कोई परहेज नहीं है 
हम जानते हैं, तू आज भी मौक़ा न चूकेगी ?? 
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तुझे   मेरे  आँसुओं  की   कसम।
मुझे  माफ़  कर  दो  ओ  सनम।।
कभी दिल न दुखाऊँगा वादा मेरा।
मुझे   तेरे   गेसुओं   की   कसम।। 
मेरी सोच मेरी मंजिल पर 
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"सब कुछ अभी ही लिख देगा क्या" (चर्चा अंक-2819)

मित्रों! शनिवार की चर्चा में आपका स्वागत है।  देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक। (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')   -- ...