चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

समर्थक

Monday, January 05, 2015

"दहेज: एक अभिशाप या हथियार" (चर्चा-1849)

मित्रों।
सोमवार की चर्चा में आपका स्वागत हैष
कल से इण्टरनेट सही ढंग से नहीं चल रहा है।
बस थोड़े से लिंक ही देखिए
आज की चर्चा में।

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आधुनिकता की आड़ में 

पाश्चात्य सभ्यता का अंधाधुन्द अनुसरण 

सुमन आज बहुत दुखी थी ,उसकी जान से भी प्यारी सखी दीपा के घर पर आज मातम छाया हुआ था |कोई ऐसे कैसे कर सकता है ,इक नन्ही सी जान,एक अबोध बच्ची , जिसने अभी जिंदगी में कुछ देखा ही नही ,जिसे कुछ पता ही नही ,एक दरिंदा अपने वहशीपन से उसकी पूरी जिंदगी कैसे बर्बाद कर सकता है... 
Ocean of Bliss पर 
Rekha Joshi
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विरह के तम........ 

विरह के तम में जीते हैं
उम्मीद की किरणे हैं कम
इन गहरे ठंडाये कोहरों ने
आसमान को घेर
सूर्य की मित्रता का
हल्का दिया है रंग... 
आपका ब्लॉग पर इंतज़ार 
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आते जाते 
हर सड़क हर चौराहे पर 
दिख जाती है 
एक चलती फिरती कहानी..... 
कहानी जो भागती है 
तेज रफ्तार वाहनों के साथ 
जो चलती है हमकदम 
हमराहों के साथ 
जो लंगड़ाती है 
किसी की छड़ी के साथ .. 

Yashwant Yash
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कहानी : प्रतीक्षा 

अर्पण गुलमोहर की शीतल छाँव में बैठा , तपन का आभास कर रहा है. शिशिर की शीतल पवन**, ज्येष्ठ - लू जैसे ही मचल रही है. वातावरण हिम बनने से भयभीत है किंतु अर्पण न जाने किन ज्वालाओं में झुलस रहा है. सम्भवत: अब आ ही जायेगी, बस इसी सम्भावना में संध्या आकर चली गई और रजनी की श्यामल पलकें शनै:-शनै...:
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कोहरे में निकली औरत ... 

कोहरे में निकली औरत ठिठुरती , कांपती सड़क पर जाती हुई । जाने क्या मज़बूरी रही होगी इसकी अकेले यूँ कोहरे में निकलने की ! क्या इसे ठण्ड नहीं लगती ! पुरुष भी जा रहें है ! कोहरे को चीरते हुए , पुरुष है वे ! बहुत काम है उनको ! घर में कैसे बैठ सकते हैं ? लेकिन एक औरत , कोहरे में क्या करने निकली है ?... 
नयी उड़ान + पर Upasna Siag 
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...शहद के लिए योगवाहि शब्द का प्रयोग किया जाता है क्योंकि यह अनेक प्रकार के द्रव्यों से मिल कर बनता है और भिन्न भिन्न प्रकार की औषधियों के साथ मिल कर भिन्न भिन्न प्रकार की बीमारियों का नाश करता है.
अब शहद के सामान्य गुणों पर भी निगाह डाली जाए ---
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चौखट पर उकेरे 
कितने ही स्वास्तिक,
मुख्यद्वार पर छोड़े
हाथों के थापे ,
वो मंगल गान 
जिनमें समाहित था कल्याण... 
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"निर्भय होकर चल सकती थी हर लड़की।" 

एक मासूम के साथ हुआ दुशकर्म भी टिवी चैनलों पर नमक मिर्च लगाकर दिखाना टिवी चैनल को प्रसिद्धि दिलाने का ही माधयम बन गया है। अगर ऐसा न होता तो ये चैनल कभी पिड़िता के भाई से कभी पिता से कभी रोती हुई मां को अपने चैनल पर बुलाकर उनकी अंतर वेदना न पूछते... 
मन का मंथन। पर kuldeep thakur 
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जो आस-पास हैं 

उनका तो बस ख़ुदा मालिक 

हैं जो बेहोश 
उन्हें होश भी आ जाएगा 
जो बदहवास हैं 
उनका तो बस ख़ुदा मालिक... 
चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल

6 comments:

  1. सुप्रभात
    उम्दा लिंक्स |

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  2. अधिक व्यस्तता के चलते नव वर्ष में पहली बार इस मंच पर आ सका इस लिये सब से पहले नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं...
    सुंदर संकलन....
    मुझे भी स्थान मिल सका आभार।

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  3. शास्त्री जी, नववर्ष की बहुत-बहुत शुभकामनाए. यह नववर्ष आपके जीवन मे ढेर सारी खुशियां लेकर आए यही शुभकामना... मेरी रचना को स्थान देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.

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  4. बहुत बढ़िया लिंक्स-सह-चर्चा प्रस्तुति हेतु आभार!

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  5. बहुत बढ़िया चर्चा

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  6. नववर्ष की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाए !

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