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Friday, May 01, 2015

"प्रश्नवाचक चिह्न (?) कहाँ से आया" (चर्चा अंक-1962)

आज की चर्चा में आपका हार्दिक अभिनन्दन है। 
वीरेन्द्र कुमार शर्मा 
भले विभिन देशों समाजों और राजनीतिक व्यवस्थाओं में काम करने की प्रणालियां अलग रहीं होंपर सभी ने अपनी प्रगति दर्शाने के लिए झंडे का सहारा लिया है। और भाषा भेद के बावजूद सबने एक ही मुहावरे का सहारा लिया है :झंडा ऊंचा रहे हमारा।
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रेखा जोशी
प्यार तुमको अब निभाना आ गया 
रफ़्ता रफ़्ता मुस्कुराना आ गया 
छेड़ कर ज़ुल्फ़ें हवाओं ने कहा 
आज मौसम आशिकाना आ गया
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अभिषेक आर्जव
जब 
दुनिया गर्म हो चुकी होगी बहुत 
तब भी 
थोड़ी ठण्डक बची रहेगी 
कविता में।
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पारुल पंखुरी 
दोस्तों एवं परिवार के सदस्यों आप सबकी शुभकामनाओं से आज दिल्ली/एनसीआर के अखबार ट्रू टाइम्स में मेरी दो रचनाओं को प्रकाशित किया गया है
1.
मुझे भाने लगीं तन्हाइयाँ पर यह न जानूं के,
ये आग़ाज़े मुहब्बत है या अंज़ामे मुहब्बत है।
2.
थोड़ी दूरियाँ जो होतीं एहसास यूँ न होता,
के याद करने वाले मुझे भूल जा रहे हैं।
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भावना तिवारी 
जीवन में हर पुरुष का तिरस्कार नहीं किया जा सकता ...नहीं की जा सकती उसकी उपस्थिति ख़ारिज़ ...तब जबकि ,मेरा भाई एक पुरुष है ..मेरा पिता एक पुरुष है ..मेरा पति एक पुरुष है ...मेरा शिक्षक भी कई बार कोई पुरुष ही रहा ....
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सदा 
कर्तव्य की कोई भी राह लो 
उस पर चलते जाने की शपथ 
तुम्‍हें स्‍वयं लेनी होगी 
राहें सुनसान भी होंगी 
कोशिशें नाक़ाम भी होंगी
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अंतर सोहिल 
उस अनजाने शहर में कम से कम सौ लोगों से पूछताछ की, जहां तुम पिछली बार रहती थी, किराये पर रहती थी। दर-दर किवाड खटखटाये। कहीं पैदल कहीं रिक्शा में पूरे 4-5 घंटे कुछ सुराग नहीं मिला। 
फिर मुन्ना टायर वाले को ढूंढा, दुकान मिली, उसका लडका मिला, घर मिला, फिर मुन्ना मिल गया। बोला तुम्हारे पिताजी एक ठेली पर तुम्हारी मां को डालकर ......
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हिमकर श्याम 
राख, कितनी राख
बिखरी है चारों ओर!
ये सिसकियाँ-दहशतें, कांपता सन्नाटा
मलबे में दबी,
सड़ी-गली लाशें,
हर्षवर्धन त्रिपाठी 
विदेश सचिव, गृह सचिव और रक्षा सचिव- इन तीनों की एक साथ प्रेस कांफ्रेंस किसी भी खास मौके पर होने का उदाहरण भारत में ध्यान में नहीं आता। लेकिन, ये तीनों महत्वपूर्ण सचिव लगातार मीडिया से एक साथ मुखातिब हो रहे हैं और नेपाल में भारत के राहत कार्यों का पूरा विवरण देते हैं।
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अर्पणा त्रिपाठी 
वो चुपचाप सहती रही 
देती रही जीवन
करती रही पालन
अपने कर्तव्यों का
माफ करती रही
भूल जो अंजानी नही थी
स्वप्न मञ्जूषा 
नज़रों की तमाज़त से, मेरे ख़्वाब जल गए 
बेशर्म से कुछ सच थे, बच के निकल गए 

अंधों के गाँव में अब, मनने लगी दीवाली 
गूँगों की बातें सुन-सुन लंगड़े भी चल गए
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(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
दोहों में यदि आपके, होगी पैनी धार।
निश्चित वो कर जायेंगे, दिल पर सीधा वार।१।
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कम शब्दों में जो करें, अपना सीधा काम।
इसीलिए है सार्थक, इनका दोहा नाम।२।
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तुलसीदास-कबीर ने, बाँटा इनसे ज्ञान।
साथ बिहारीलाल के, रहिमन चतुर सुजान।३।
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संजीव वर्मा 
जो हुआ सो हुआ
बाँध लो मुट्ठियाँ
चल पड़ो रख कदम
जो गये, वे गये
किन्तु बाकी हैं हम
है शपथ ईश की
सुशील कुमार जोशी 
नाम से लिखने पर 
बबाला हो जाता है 
इस और उस से 
काम चलाया जाये 
तो क्या जाता है 
अंधे देख रहे हैं
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भरत
गीत ग़ज़ल हो या हो कविता 
नज़र है उस पर चोरो की 
सेंध लगाये बैठे तैयार 
कॉपी पेस्ट को मन बेक़रार 
लिखे कोई और, पढ़े कोई और
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कुछ अलग सा पर गगन शर्मा 
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दोनों में अन्तर बहुत, आंखों से पहचान। 
स्वाभाविक मुस्कान या, व्यवसायिक मुस्कान... 
मनोरमा पर श्यामल सुमन 
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My Photo
'आहुति' पर sushma 'आहुति' 
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Akanksha पर Asha Saxena 

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