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Monday, June 15, 2015

"बनाओ अपनी पगडंडी और चुनो मंज़िल" {चर्चा अंक-2007}

मित्रों।
सोमवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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है कितना अंतर 

vridh ashram के लिए चित्र परिणाम
                                                                                          है कितना अंतर 
कल और आज के सोच में
गहरी खाई हो गई है
विचारों में |
आज भी  याद आते है वे लम्हें
जब होते थे बाबा  दादी के साथ
नाना नानी मामा मामी से
कितना प्यार मिलता था
बता नहीं पाते शब्दों में... 
Akanksha पर Asha Saxena 
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पगडंडी 

मत ढूंढो पगडंडियां बनायी औरों की 
सुखद यात्रा को, बनाओ अपनी पगडंडी 
और चुनो अपनी एक नयी मंज़िल... 
Kailash Sharma 
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लड़के 

लड़के नहीं चाहते घर में बैठना 
आपस में बतियाते जाने क्या-क्या 
देर तक धूप में खड़े! .. 
बेचैन आत्मा पर देवेन्द्र पाण्डेय 
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वफ़ा ने हमारी पुकारा बहुत है 

यहाँ साथ तेरा गवारा बहुत है 
हमें आज तेरा सहारा बहुत है … 
Ocean of Bliss पर Rekha Joshi 
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बोल उठा भू का तन प्यासा 

घन बरसो, जग-जीवन प्यासा 
आस लगी इस मानसून पर 
रह जाए न कृषक-मन प्यासा... 
गज़ल संध्या पर कल्पना रामानी 
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इक साथ...!!! 

मैं कब से ढूंढ रही... 
इक साथ... 
जो मेरे डरने से, पहले 
मेरे हाथ थाम ले... 
'आहुति' पर sushma 'आहुति' 
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आधा मन 

मन का पंछी पर शिवनाथ कुमार 
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बजूद 

कल उतारी थी गठरी ताक से. 
झोंके थे उसमें से कुछ तुड़े-मुड़े, 
गीले-सीले अपने वजूद को तलाशते... 
रचना रवीन्द्र पर रचना दीक्षित 
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