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Wednesday, August 26, 2015

"कहीं गुम है कोहिनूर जैसा प्याज" (चर्चा अंक-2079)

मित्रों।
बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

दोहे "सावन की महिमा" 

सावन आने पर धराकरती है शृंगार।
हरा-भरा परिवेश हैसावन का उपहार।१।
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चोटी-बिन्दी-मेंहदीआपस में बतियाय।
हर्ष और अनुराग मेंसुहागिनें बौराय।२।
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तीजों के त्यौहार परकर सोलह सिंगार।
आज नारियाँ हर्ष सेगातीं मेघ-मल्हार।३।...
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मुश्किल रास्ता 

कैसे घूरता हैं वोह नुक्कड़ पर खड़ा लड़का 
घर से स्कूल जाती नव्योवना को 
नीली चुन्नी को देह पर लपेटे 
छिपाने की कोशिश में 
अपने अंग-प्रत्यंग को 
अक्सर मिल जाती हैं उसकी नजर
उन घूरती नजरो से
और टूट जाता हैं
उसके साहस का पहाड़... 
निविया पर Neelima sharma 
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ग़ाफ़िल ने भी क्या क्या मंज़र देखे हैं 

बड़बोलापन जिनके अन्दर देखे हैं 
रोते धोते उनको अक़्सर देखे हैं 
आँख लड़ाई में जाने कितनों की ही 
टूटी टाँगें औ फूटा सर देखे हैं... 
अंदाज़े ग़ाफ़िल पर चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 
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साथी तेरे नाम ... 

गुज़ारिश पर सरिता भाटिया 
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प्यार 

प्यार का एक नूरानी असर माँ के चेहरे पर झुर्रियों में लिखी आयतों में पढ़ने की कोशिश करता हूँ, और माँ को हर एेसे ख़ूबसूरत चेहरे के पीछे छुपे ख़ूबसूरत दिल से, आँखो से झाँकते हुए देखता हूँ... 
पथ का राही पर musafir 
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अबोला 

आजकल तुमसे कह नहीं पाती दिल की कोई बात यही वजह सब अनकहा कागज़ पे ख़ुद चला आता है मेरे लिखे लफ़्ज़ों में तुम हो स्याही में घुली हर बात बहती है खुद को कहती है पहले तुमसे सब बोल देती थी रीत जाती थी अब अंदर ही अंदर घुटती हूँ भीतर से भरी रहती हूँ कलम से कागज़ तक का सफ़र सिर्फ़ तुमसे अपनी कहने का इक नया तरीका भर है अबोला...  
ज़िन्दगीनामा पर Nidhi Tandon 
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नेह का बंधन 

कहानी लेखन की पहली कोशिश
सु-मन (Suman Kapoor) 
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कुछ अफ़साने : लाजिमी हैं 

'' कौन सा रास्ता भूल जाता है तू ?
    '' मैं कल घाट गया था ,भटक गया ''
     ''शमशान घाट ?"
     ''तेरा दिमाग खराब है?''

.... ''अब तू इतने घाट जाता है , 
हिसाब भी नहीं रखा जाता मुझसे तो .. 
मुझे लगा ये आखिरी घाट होगा  ''
      ''तू चलेगी न मेरे साथ ..... ?... 
Vandana KL Grover 
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बेवजह 

Sudhinama पर sadhana vaid 
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तुम्हारे बिना 

सजी महफ़िल के लिए चित्र परिणाम
सजी महफ़िल
गीत गुनगुनाए 
इन्तजार हर पल  रहा 
पर तुम न आए ,,, 
Akanksha पर Asha Saxena 
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हिन्दी सोशल मीडिया पर मेरे प्रयोग 

यह पूरी पोस्ट पढ़िए
अंतर्जाल पर अपनी उपस्थिति के बारे में मैं आरंभ से ही बहुत सजग रहा हूँ। बरेली ब्लॉग और पिटरेडियो (Pitt Radio) के अरसे बाद 2008 में शुरू किए इस ब्लॉग "बर्ग वार्ता" पर भी स्मार्ट इंडियन (Smart Indian) के छद्मनाम से ही आया। उद्देश्य परिचय छिपाने का नहीं था बल्कि नाम की इश्तिहारी पर्चियाँ उड़ाने से बचने का था। जिसे अधिक जानकारी की इच्छा और आवश्यकता होती उससे कुछ छिपाने की ज़रूरत मैंने कभी महसूस नहीं की, लेकिन खबरों में रहने की कोई इच्छा भी कभी नहीं थी। कालांतर में विचार करने पर ऐसा लगा कि इस हिन्दी चिट्ठास्थल पर अपना नाम और परिचय सामने रखना ही मेरे पाठकों के हित में है।

व्यवहार से संकोची व्यक्ति हूँ। भीड़ जुटाने या खबरों में रहने का कभी शौक नहीं रहा। यत्र-तत्र तैरते-उतराते मठों और उनके महंतो से मेरा कोई लेना-देना नहीं था तो भी कुछ आशंकित मठाधीशों ने शायद मुझे विपक्षी मानकर जो दूरी बनाई वह मेरे जैसे रिजर्व प्रकृति वाले व्यक्ति के लिए लाभप्रद ही सिद्ध हुई। किसी से जुडने, न जुडने के प्रति "तत्र को मोहः कः शोक: एकत्वमनुपश्यतः" वाली धारणा चलती रही लेकिन समय गुजरने के साथ एक से बढ़कर एक मित्र मिले और अपनी हैसियत से कहीं अधिक ही प्रेम मिला। बेशक, एकाध लोग मेरी स्पष्टवादिता से खफा भी हुए, लेकिन यह तय है कि वे लोग जिस प्रकार किसी को पहले शत्रु बनाकर, फिर उन्हें व्यूह में बुलाकर, घेरकर मारने में लगे थे, वैसा कोई काम मैंने न कभी किया, न ही उसे समर्थन दिया। कमजोर अस्थाई अवरोधों से बाधित हुए बिना मेरी हिन्दी ब्लॉगिंग लेखन, वाचन, पठन-पाठन के साथ निर्विघ्न चलती रही। इस ब्लॉग के अतिरिक्त सामूहिक ब्लॉगों में निरामिष और रेडियो प्लेबैक इंडिया (जो पहले हिंदयुग्म पर आवाज़ के नाम से चल रहा था) पर सर्वाधिक सक्रियता रही। हाल के दिनों में भारत मननशाला द्वारा कुछ काम की बातें सामने रखने का भी प्रयास किया जो कि मित्रों की और अपनी दुनियादारी के झमेलों के कारण अभी तक शैशवावस्था में ही रहा। 

आज तो हिन्दी ब्लॉगिंग में टिप्पणी मॉडरेशन आम हो चुका है लेकिन मेरे आरंभिक ब्लॉगिंग के दिनों में बहुत से लोग मोडरेशन लगाने के कारण खफा हुए। एक संपादक जी ने यह भी कहा कि मॉडरेशन से उन्हें ऐसा लगता है जैसे किसी ने घर बुलाकर दरवाजा बंद कर दिया हो। लेकिन मेरा दृष्टिकोण ऐसा नहीं था। मेरा दरवाजा सदा खुला था, बस इतनी निगरानी थी कि कोई अवैध या जनहित-विरोधी वस्तु वहाँ न छोड़ी जाये। और यह बात मैंने अपने टिप्पणी बॉक्स पर स्पष्ट शब्दों में लिखी थी। अपने ब्लॉग के प्रति हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि वहाँ कोई क्या छोडकर जाता है उसे जनता के सामने प्रकाशित होने से पहले हम जाँचें और समाज के लिए हानिप्रद बातों को अवांछित समझकर हटाएँ।

सूचना प्रोद्योगिकी, कंप्यूटर, और डिजिटल जगत लंबे समय से मेरी रोज़ी होने के कारण उसकी अद्यतन जानकारी भी मेरे लिए महत्वपूर्ण विषय था और वहाँ व्यावसायिक उपस्थिति भी थी। लेकिन पुरानी कहावत, "मजहब उत्ता ही पालना चाहिए जित्ते में नफा अपना और नुकसान पराया हो" का अनुसरण करते हुए सेकंड लाइफ, ट्विटर आदि से जल्दी ही सन्यास ले लिया। ख़ानाबदोश ब्राह्मणों के साधारण परिवार की पृष्ठभूमि होने के कारण देश-विदेश में बिखरे परिजनों से जुड़े रहने के लिए ऑर्कुट ठीकठाक युक्ति थी, सो चलती रही। समय के साथ कुछ साथी ब्लॉगर भी मित्र-सूची में जुडते गए। गूगल द्वारा ऑर्कुट की हत्या किए जाने से पहले ही जब फेसबुक ने उसे मृतप्राय कर दिया तो अपन भी फेसबुक पर सक्रिय हो गए। 
   
पिछले साल तक मैं अपनी फेसबुक फ्रेंडलिस्ट के प्रति बहुत सजग था। जहां मेरे कई मित्र 5000 का शिखर छू रहे थे वहीं 200 के अंदर सिमटा मैं फेसबुक पर केवल अपने परिजनों, सहकर्मियों और मित्रों से संपर्क बनाए रखने के लिए यहाँ था। मेरी मित्र-सूची में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं था जिसकी वास्तविकता से मैं परिचित न होऊं। अधिकांश (99%) मित्रों से मेरी फोन-वार्ता या साक्षात्कार हो चुका था। हिन्दी ब्लॉग जगत के अधिकांश मठाधीशों का मुझसे कोई संपर्क नहीं था, मुझे तो उनसे जुड़ने की क्या आकांक्षा होती। ज़्यादातर से, "कैसे कह दूँ के मुलाक़ात नहीं होती है,रोज़ मिलते हैं मगर बात नहीं होती है" वाला संबंध था। सो वे किसी तीसरे की वाल पर आमने-सामने पड़ जाने के बावजूद अपने-अपने गुटों में सीमित रहकर मुझसे अलग ही रहे।

मेरी सूची में घूघूती बासूती अकेली ऐसी व्यक्ति हैं जिन्हें मैंने पूर्ण अपरिचित होते हुए भी, उनका वास्तविक चित्र देखे बिना, उनका नाम तक पता न होते हुए खुद मैत्री अनुरोध भेजा। नारीवाद जैसे कुछ विषयों पर हमारे अनुभव, पृष्ठभूमि और निष्कर्ष आदि में अंतर होते हुए भी समस्त हिन्दी ब्लोगिंग में अगर कोई एक व्यक्ति विचारधारा में मुझे अपने सबसे निकट दिखा तो ये वे ही थीं। जानने वालों से भी अक्सर बचकर निकलने वाले किसी व्यक्ति के लिए किसी को जाने बिना इतना विश्वसनीय समझना सुनने में शायद अजीब लगे, लेकिन मेरे लिए बिलकुल सामान्य सी बात है।

अंजान व्यक्ति से मैत्री-अनुरोध आने पर मैंने कभी उनके स्टेटस/व्यवसाय/शिक्षा आदि पर ध्यान न देकर केवल इतना देखा कि समाज और मानवता के प्रति उनका दृष्टिकोण कैसा है। फिर पिछले दो वर्षों में वह समय आया जब उनमें से भी कुछ लोग अपनी खब्त के आधार पर कम करने शुरू किए। कई सिर्फ इसलिए गए क्योंकि वे अपने को ज़ोर-शोर से जिस उद्देश्य के लिए लड़ने वाला बताते थे उसी उद्देश्य का गला घोंटने वालों के कुकर्मों पर न केवल चुप थे बल्कि उनके साथ हाथ में हाथ डाले घूम रहे थे। तड़ीपार की कुछ क्रिया दूसरी ओर से भी हुई, खासकर नियंत्रणवादी विचारधाराओं के ऐसे प्रचारक जो अपनी असलियत बलपूर्वक छिपाए रखते हैं, मेरे साथ संवाद नहीं रख सके। व्हाट्सऐप पर आए मेसेजों को ब्लॉग पर चेप-चेपकर नवलखी साहित्यकार बने एक व्यक्ति द्वारा जब एक जाति-विशेष के विरुद्ध विषवमन करने पर मैंने उनसे एक प्रश्न किया तो उन्होने उसकी ज़िम्मेदारी किसी और पर डाली, कुछ बहाने बनाए फिर वे बहाने गलत साबित किए जाने पर वह पोस्ट तो हटा ली लेकिन तड़ से मुझे ब्लॉक कर दिया। अच्छी बात ये हुई कि उस दिन के बाद उन्होने अपने ब्लॉग से वे लघुकथाएं हटा दीं जिनका स्वामित्व स्पष्ट था और कॉपीराइट की चोरी सिद्ध होने में कोई शंका नहीं थी। फेसबुक वाल से हटीं या नहीं, यह मैं नहीं कह सकता। कुछ लोगों को मैंने भी ब्लॉक किया है लेकिन उसका कारण कोई व्यक्तिगत परिवाद नहीं है। ऐसे किसी भी व्यक्ति से फेसबुक पर मेरा संवाद नहीं रहा है। बस उनकी एकतरफा कड़वाहट मेरे मन में खीझ उत्पन्न न करे इसीलिए उनसे बचना ही श्रेयस्कर समझा। इसके अलावा कुछ अन्य मित्रों का सूची से हटना ऐसा रहस्य है जहां न मुझे उन्हें हटाना याद है, न उन्हें मुझे हटाना। लंबे समय बाद जब हमारी मुलाक़ात हुई तो पता लगा कि एक दूसरे की सूची में नहीं हैं। अब मुझे लगता है कि शायद हम फेसबुक पर कभी मित्र रहे ही नहीं होंगे, और हमें ऑर्कुट की दोस्ती की वजह से यह गलतफहमी हुई होगी।

ऐसे मुक्तहस्त और उदार मित्र भी मिले जिन्होने फिर से मैत्री अनुरोध भेजे और मैं अपनी भूल स्वीकारते हुए उनसे फिर जुड़ा। 2014 के अंत में जब बहुतेरे पाँच हजारी हर तीसरे दिन "ऐसा किया तो लिस्ट से बाहर कर दूंगा/दूँगी", "कभी लाइक/कमेन्ट नहीं करते तो फ्रेंडशिप क्यों?" और "आज मैंने अपनी सूची इतनी हल्की की" के स्टेटस लगाने में व्यस्त थे, मैंने तय किया कि समय देकर पेंडिंग पड़े मित्रता अनुरोधों का अध्ययन करके उन सभी को स्वीकृत कर लूँगा जो किसी भी प्रकार का द्वेष फैलाने में नहीं जुटे हुए हैं। मित्र सूची में रिस्टरिक्टेड  विकल्प प्रदान करके फेसबुक ने यह काम और आसान कर दिया। मेरे नव वर्ष संकल्प का एक भाग यह भी था कि अंतर्जाल पर अक्सर सामने पड़ते रहे उन सभी लोगों को मित्रता अनुरोध भेजूँगा जो अपनी किसी भी सार्वजनिक या गुप्त गतिविधि के कारण मेरी अवांछित व्यक्ति (persona non grata) सूची में नहीं हैं।

आरंभ उन लोगों से करने की सोची जिन्हें मैंने ही यह सोचकर अनफ्रेंड किया था कि जिनसे व्यक्तिगत परिचय नहीं, मित्र-सूची में होने न होने से संवाद में कोई अंतर नहीं, वे मेरे पोस्ट्स पढ़कर मित्र सूची के बाहर रहते हुए भी कमेन्ट कर सकते हैं और मैं उनकी पोस्ट्स पर। सुखद आश्चर्य की बात है कि उनमें से अनेक तक मेरा निवेदन पहुँच भी न सका क्योंकि वे अभी भी फेसबुक की मित्र सीमा से आगे थे। उसके बाद उन लोगों का नंबर आया जिनसे किसी को कोई शिकायत नहीं, लेकिन मेरी उनसे मैत्री या परिचय का अब तक कोई मौका नहीं पड़ा। उन्हें शायद मेरे बारे में जानकारी न हो लेकिन मैंने उन्हें पढ़ा, सुना हो। इनमें भी बहुत से अपनी मित्र-सीमा के कारण निवेदन पा न सके। जिन तक निवेदन पहुंचे उनमें से कुछ 8 महीने बाद आज भी पेंडिंग हैं लेकिन अधिकांश की सूची में जुडने पर मुझे गर्व है। जो महान साहित्यकार मेरे निवेदन के बाद कट-पेस्ट कवियित्रियों से लेकर निश्चित-फेक सुकन्याओं के निवेदन लगातार स्वीकारते हुए भी मेरा निवेदन लंबित रखे रहे उन्हें कष्ट से बचाने के लिए मैं ही पीछे लौट आया। मैं अपनी सूची में अपने जैसे विश्वसनीय लोगों को ही रखना चाहता हूँ। और फेक-प्रोफाइल की खूबसूरती देखते ही निवेदन स्वीकार करना मेरी नज़र में उनकी विश्वसनीयता भी कम करता है। 

मैंने अभी भी मित्र निवेदन भेजना रोका नहीं है, और साथ ही आए हुए निवेदन स्वीकार कर रहा हूँ। दुविधा तब आती है जब आपके प्रोफाइल पर चित्र, नाम, पता या कोई भी जानकारी सामने नहीं होती है। कई रिक्वेस्ट शायद वे भी हैं जब यूजर ने बिना देखे ही फेसबुक को अपनी कांटेक्ट लिस्ट में उपस्थित हर व्यक्ति को फ्रेंड रिक्वेस्ट भेजने का विकल्प चुना होता है। ब्लोगिंग के ऐसे साथी जो फेसबुक पर मेरे मित्र नहीं बने, कभी मेरे ब्लॉग पर नहीं आए, जब लिंक्डइन नेटवर्क पर मैत्री-निवेदन भेजते हैं तो अचंभा होता है।

खैर, ये थी मेरी सोशल मीडिया दास्ताँ। नए जमाने की नई दोस्ती के ये दौर चलते रहेंगे। मेरी दास्ताँ मेरे सोचने के तरीके से प्रभावित है। आपकी दास्ताँ आपके व्यक्तित्व की एक खिड़की खोलती है। मेरा अनुरोध यही है कि जब किसी व्यक्ति को मैत्री अनुरोध भेजें तो अपना संक्षिप्त परिचय भी भेज दें ताकि उन्हें स्वीकारने/अस्वीकारने में आसानी हो जाये। और जो लोग केवल अपना आभामंडल बढ़ाने के लिए निवेदन भेजते/स्वीकारते हैं, उन्हें याद रहे कि सूर्य को भी ग्रहण लगता है, वे तो अभी ठीक से चाँदमियाँ भी नहीं हो पाये हैं। कभी-कभी अपने भक्तों की वाल पर भी झांक लें तो उनकी चाँदनी कम नहीं हो जाएगी।...  
पर Smart Indian 

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