चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

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Friday, November 20, 2015

"आतंकवाद मानव सम्यता के लिए कलंक" (चर्चा-अंक 2166)


आज की चर्चा में आपका हार्दिक स्वागत है। 
आतंकवाद किसी एक व्यक्ति, समाज अथवा राष्ट्र विशेष के लिए ही नहीं अपितु पूरी मानव सभ्यता के लिए कलंक है । हमारे देश मे ही नहीं बल्कि पूरे विश्व मे इसका जहर इतनी तीव्रता से फैल रहा है कि यदि इसे समय रहते नहीं रोका गया तो यह पूरी मानव सभ्यता के लिए खतरा बन गया है । भारत और समूचे विश्व में आतंकवाद एक गंभीर समस्या बनकर उभरा है। यह किसी भी तरह से लाभदायक नहीं। बल्कि इसने देशों में नई-नई समस्याओं को जन्म देने का काम किया है। आतंकवाद से कोई देश अपना भला नहीं कर सकता। इससे उसकी बर्बादी ही हुई है।कोई नहीं चाहता कि आतंकवाद सिर उठाये। किसी के दिल में आतंक करने वालों के प्रति हमदर्दी नहीं है। सब चाहते हैं कि वे सुकून और शांति से जीवन बितायें। आतंकवाद मानव सम्यता के लिए कलंक है । उसे किसी भी रूप में पनपने नहीं देना चाहिए । विश्व के सभी राष्ट्रों को एक होकर इसके समूल विनाश का संकल्प लेना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी को हम एक सुनहरा भविष्य प्रदान कर सकें ।
डॉ रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
अमर वीरांगना झाँसी की महारानी लक्ष्मीबाई के
188वें जन्म-दिवस पर उन्हें अपने श्रद्धासुमन समर्पित करते हुए
श्रीमती सुभद्राकुमारी चौहान की

यह अमर कविता सम्पूर्णरूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ!
सिंहासन हिल उठे, राजवंशों ने भृकुटि तानी थी,
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी,
गुमी हुई आजादी की कीमत सबने पहचानी थी,
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फ़िरदौस ख़ान
बात साल 2009 की है... लोकसभा चुनाव के लिए चुनावी मुहिम चल रही थी... उस वक़्त हमें एक
सियासी दल के प्रभावशाली शख़्स का फ़ोन आया... उन्होंने एक केंद्र में मंत्री रहे एक शख़्स का हवाला दिया और कहा कि उन्हें हमारी मदद चाहिए. काम मुश्किल नहीं था, उन्हें चुनाव के लिए तक़रीर चाहिए थी.
अनुपमा पाठक 

आँखों में कुछ नहीं था...
सपने टूटे हुए थे...
गड़ते थे...
कितनी सुन्दर व्यवस्था की है प्रकृति ने...
आँसूओं में घुल गए सारे टुकड़े
बह गए...
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अर्पणा खरे 
चलो 
इस चमकती 
रात में 
कहीं तारों के 
झुरमुट से
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कुलदीप ठाकुर 
हर जिंदगी
भी शायद
किसी लेखक की
लिखी हुई
किताब होती है...
पर हम
नहीं जान पाते
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प्रवीण चोपड़ा
 
इस से पहले की मैं आप को एक वाकया सुनाऊं, मैं आप को उस परिवेश से रू-ब-रू करवाना चाहूंगा जिस में हम पले-बढ़े और जिस में डाक्टर और मरीज कैसे हुआ करते थे!
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राजीव कुमार झा 
सदियों से कीमियागिरी एवं कीमियागर के संबंध में एक रहस्यमय धुंध लिपटा रहा है.चर्चित लेखकों और उपन्यासकारों ने अपने कथानक में इसे जगह देकर इसे और जीवंत कर दिया है.
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कविता रावत 
हरेक पैर में एक ही जूता नहीं पहनाया जा सकता है।
हरेक पैर के लिए अपना ही जूता ठीक रहता है।।

सभी लकड़ी तीर बनाने के लिए उपयुक्त नहीं रहती है। 
सब चीजें सब लोगों पर नहीं जँचती है।।
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पल्लवी सक्सेना
 
साधारण लोग सोचते है मृत्यु एक विराम है जिसके आगे सब समाप्त हो जाता है। शेष कुछ भी नहीं रहता सिवाए मिट्टी के पर क्या यही सच है। मेरे अंदर कई प्रश्न उठते है मगर जवाब आजतक नहीं मिला। मृत्यु क्या है एक जीवन का अंत या फिर एक नयी शुरुआत। मृत्यु को लेकर हम यह मानते है कि मरणोपरांत उस जाने वाले व्यक्ति की आत्मा  … 
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यशवंत यश 
आज नहीं तो कल 
उन्हें पता तो चलेगा ही
 कि क्या होता है मतलब
 बिना सच जाने
 सिर्फ झूठ की बुनियाद पर 
सहानुभूति बटोरने का
मदन मोहन सक्सेना 
रिश्तें नातें प्यार बफ़ा से
सबको अब इन्कार हुआ

बंगला ,गाड़ी ,बैंक तिजोरी
इनसे सबको प्यार हुआ
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वीरेन्द्र कुमार शर्मा 
एक पाकिस्तानी चैनल 'दुनिया ' के टीवी एंकर ने जब मणिशंकर अय्यर से पूछा कि दोनों देश के बीच पड़ी संबंधों की बर्फ को पिघलाने के लिए क्या करने की ज़रुरत है तब इस मार्क्सवादी बौद्धिक गुलाम अय्यर ने फरमाया कि सबसे पहले और सबसे ज़रूरी चीज़ है कि मोदी को हटाया जाए।
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पल्ल्वी त्रिवेदी 
कमला के आदमी ने कमला के गाल सुजाये
खींचा पटका और घर से निकाल दिया 
इसने देखा , उसने देखा , सबने देखा
मैंने भी देखा 
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प्रतिभा सक्सेना 
 साँझ-चिरैया उतरती अपने पंख पसार, 
जल-थल-नभ में एक सा कर अबाध संचार.
 मुट्ठी भर-भर कर गगन दाने रहा बिखेर,
 उड़ जायेगी देखना चुन कर बड़ी सबेर.
 श्यामल देह पसार क...
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संध्या शर्मा 
हमारा भारत उत्सव एवं पर्वों का देश है। वैदिकपर्व, पौराणिकपर्व, लोकपर्व, राजकीयपर्व के साथ मनकीयपर्व भी मनाए जाते हैं। मनकीयपर्व से आशय है कि जब मन किया तब उत्सव मना लिया। इस तरह हम चाहे तो वर्ष के प्रत्येक दिन पर्व मना सकते हैं। इसे हमारी उत्सवधर्मिता ही कही जानी 
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न्यबाद,

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