चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

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Friday, February 19, 2016

"सफर रुक सकता नहीं" (चर्चा अंक-2257)

आज की चर्चा में आपका हार्दिक स्वागत है।
सर्वप्रथम उर्मिला माधव जी की एक खूबसूरत ग़ज़ल को देखते हुए चलते हैं आज की चर्चा के तरफ। 
अदब अब सभी के दफ़ा हो गए हैं,
बुज़ुर्गाने आला ख़फा हो गए है

समेटे नहीं जा सके दिल के टुकड़े,
ये हिस्से भी कितनी दफ़ा हो गए हैं,

सिखाई मुहब्बत-ऑ-तहज़ीब जिनको,
जवां क्या हुए, बे-वफ़ा हो गए हैं,

मुहब्बत के मानी बचे ही कहाँ कुछ,
फ़क़त अब ज़ियाँ और नफ़ा हो गए हैं

वो सर को झुकाना ऑ तस्लीम कहना,
किताबों का बस फ़लसफ़ा होगये हैं!
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"पढ़ना-लिखना मजबूरी है" 
मुश्किल हैं विज्ञान, गणित, 
हिन्दी ने बहुत सताया है। 
अंग्रेजी की देख जटिलता, 
मेरा मन घबराया है।।
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डॉ जाकिर अली रजनीश 
obedient dog
यह एक कुत्ते और आदमी की हैरतअंगेज कहानी है, जो मुझे वाट्सअप पर प्राप्त हुई। यकीन जानिए, मैं इतनी ज़बरदस्त कहानी पहले नहीं पढ़ी। आप भी पढ़ कर देखे: 
रात के दस बज गये थे। एक दुकानदार अपनी दुकान बंद करने की तैयारी कर रहा था। वह लाइट को ऑफ करने ही जा रहा था कि तभी  ....... 
लोकेन्द्र सिंह 
केरल के कन्नूर जिले में बीते सोमवार की रात को वामपंथी गुण्डों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नौजवान कार्यकर्ता की बेरहमी से हत्या कर दी। लेकिन, कहीं से प्रतिरोध की कोई आवाज नहीं आई। असहिष्णुता के नाम पर देश को बदनाम करने का षड्यंत्र रचने वाले बुद्धिजीवी भी  .... 
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अर्पणा खरे 
मुझमे मेरा क्या था
सब तो तुम्हारे द्वारा 
तय 
किया गया था
मेरी बाहर की जिंदगी
कहाँ जाना है
मदन मोहन सक्सेना 
बिरह के कुछ अहसासों को ब्यक्त करती प्रेम कवितायेँ .
(एक )
जुदा हो करके के तुमसे अब ,तुम्हारी याद आती है
मेरे दिलबर तेरी सूरत ही मुझको रास आती है
कहूं कैसे मैं ये तुमसे बहुत मुश्किल गुजारा है
भरी दुनियां में बिन तेरे नहीं कोई सहारा है
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आनंद पाठक 
:1: 
दीवार उठाते हो
 तनहा जब होते 
फिर क्यूँ घबराते हो
 :2: 
इतना भी सताना क्या
 दम ही निकल जाए 
फिर बाद में आना क्या
प्रबोध कुमार गोविल 
आपको याद होगा कि वर्षों पहले तो शादियां भी लड़के-लड़की को एक दूसरे को दिखाए बिना तय हो जाती थीं। लेकिन उस समय भी समाज ने ये व्यवस्था की थी कि दावेदार की पूरी परख हो सके। शादी तय करवाने का काम "नाई" के जिम्मे था। जानते हैं क्यों? क्योंकि बदन मालिश के जरिये आपकी टोह ले लेने में ..... 
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आमिर अली
  Apna Blog kaise bnayen ?
डियर रीडर्स , ब्लॉग को आप टेम्परेरी वेबसाईट भी कह सकते हैं.अगर आपके अन्दर हुनर है ,आप टेलेंटेड हैं.और आप बहुत कुछ लिख सकते...
अशोक पाण्डेय 
आत्मकथा लिखने का मेरा आशय नहीं है. मुझे तो आत्मकथा के बहाने सत्य के जो अनेक प्रयोग मैंने किये हैं, उसकी कथा लिखनी है. उसमें मेरा जीवन ओतप्रोत होने के कारण कथा एक जीवन ओतप्रोत होने के कारण कथा एक जीवन-वृत्तान्त जैसी बन जायेगी,यह सहीं है; लेकिन उसके हर पन्ने पर मेरे प्रयोग ही प्रकट हो तो मैं स्वयं इस कथा को निर्दोष मानूँगा.
रविकर जी 
राष्ट्रवाद का पक्ष लो, या विपक्ष के साथ।
रह सकते निरपेक्ष भी, धरे हाथ पर हाथ।

धरे हाथ पर हाथ, करे क्या देख गिलानी ।
राष्ट्र-विरोधी नाद, सुनो हाफिज की बानी ।
त्रिलोक सिंह ठकुरेला
1. वही प्रबुद्ध
 जिसने जीत लिया
 जीवन युद्ध
 2.
 दौड़ाती रही
 आशाओं की कस्तूरी
 जीवन भर
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आमिर अली 
डियर फ्रेंड्स , इस विडियो में आप देख सकते हैं की किसी भी यूट्यूब चैनल को कैसे सबस्क्राइब किया जाता है , इसमें प्रेक्टिकल आपको बताया गया है , इस विडियो को देख कर आप अपने पसंद के सभी यू ट्यूब चैनल्स को सबस्क्राइब कर सकते हैं .सबस्क्राइब करने के बाद आपको उस चैनल की सभी विडियो ईमेल के जरिये मिल जाती हैं
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(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
सियाह रात है, छाया बहुत अन्धेरा है
अभी तो दूर तलक भी नहीं सवेरा है

अभी तो तुमसे मुझे दिल के राज़ कहने हैं
मगर फलक़ पे लगा बादलों का डेरा है

छटेंगी काली घटाएँ तो बोल निकलेंगे
गमों के बोझ का साया बहुत घनेरा है
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गौतम राजरिशी
शब्दों की बेमानियाँ...बेईमानियाँ भी | लफ़्फ़ाजियाँ...जुमलेबाजियाँ...और इन सबके बीच बैठा निरीह सा सच | तुम्हारा भी...मेरा भी | 
तुम्हारे झूठ पर सच का लबादा
तुम्हारे मौन में भी शोर की सरगोशियाँ
तुम्हारे ढोंग पर मासूमियत की
न जाने कितनी परतें हैं चढी
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क्षणिकाएं
कैलाश शर्मा 
हर खिड़की दरवाज़े से
आ जाते यादों के झोंके
दे जाते कभी
सिहरन ठंडक की
कभी तपन लू की।
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दीपक बाबा 
मेरा फोटो
देश में माहौल गर्म है. ट्विटर/फेसबुक पर धड़ाधढ ख़बरें / विचार आ रहे है, जब तक आप सोचो नयी ट्वीट/पोस्ट आ जाती है. सारा दिन गहमागहमी. कन्हैया से लेकर बस्सी तक. कई ब्यान आये और कई पलट गए. मिनट मिनट में यारलोग भी अपडेट होते रहे/करते रहे.
शारदा अरोड़ा 
विशाल , जिसे मैंने बच्चे से बड़े होते हुये देखा , आज उसी को श्रद्धाँजलि दे रही हूँ। उसके भोलेपन और सादगी को मैं बार-बार प्रणाम करती हूँ।
चिरनिद्रा में सो गये तुम
माँ का दिल ये कैसे माने
तुम्हारी जैकेट , तुम्हारी दवा की खुली शीशी
तुम्हारे बिस्तर पर पड़ी सलवटों से
अभी अभी तुम्हारे उठ कर जाने का अहसास
अभी तो तुम्हारे बोल भी सुनाई देते हैं
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"धन्यवाद" 

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