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Friday, May 06, 2016

"फिर वही फुर्सत के रात दिन" (चर्चा अंक-2334)

मित्रों
शुक्रवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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ग़ज़ल 

सहरा की तपिश में हरे जंगल क्यूँ लौटे  
बरसात की ख्वाहिश न थी ,बादल क्यूँ लौटे  
पूछा नहीं की बिना ग़ज़ल क्यूँ लौटे ,  
लेकिन बाज़ार से बिना चावल क्यूँ लौटे... 
कविता-एक कोशिश पर नीलांश 
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ये मोह-मोह के धागे .... 

पुरानी दिल्ली स्टेशन पर उतरते ही राग को ताज़गी का अहसास हुआ। गर्मी अभी आई नहीं थी और सर्दी जाने को थी। यहाँ उसका ननिहाल है, बचपन के बहुत सारे यादगार दिन /महीने बीते हैं। मामा के बेटे की शादी है। मामी ने शादी से पंद्रह दिन पहले आने को कहा तो था पर दस दिन पहले ही पहुंचा जा सका। घर पहुंचे तो बहुत रौनक छाई हुई थी... 
नयी दुनिया+ पर Upasna Siag  
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यादों के पिटारे से 

यादों के पिटारे में झांक के देखा तो मानस पटल पर कुछ वर्ष पहले की तस्वीरें उभरने लगी | मौसम करवट बदल रहा था ,सुहावनी सुबह थी और हल्की ठंडी हवा तन मन को गुदगुदा रही थी | गरमागर्म चाय की चुस्कियों के साथ हाथ में अखबार लिए मै उसे बरामदे में बैठ कर पढने लगी... 
Ocean of Bliss पर Rekha Joshi 
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यहाँ हो रहे बस मौत के सौदे, 
किसकी कितनी ज़िन्दगी है, 
यह खुदा की जगह अब, 
चंद इंसान तय करते है, 
मौत के इस खेल देख हम , 
बस इतनी सी दुआ करते, 
काश हम भी इंसान होते.... 
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सम्मान खरीदने के लिए रहीसी  

और बीमार साथी के लिए गरीबी 

पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया में दो विरोधाभाषी साहित्यिक संवेदनशीलता को देख रहा हूं। पिछले दिनों दुर्ग के सभी समाचार पत्रों में एक समाचार प्रकाशित हुआ जो लगभग चौथाई पेज का समाचार था। जिसमें दुर्ग के पास स्थित एक गांव में वृहद साहित्य सम्मेलन का समाचार, विस्तार से छापा गया था। जिसमें 8 प्रदेशों के साहित्यकारों के दुर्ग आगमन का समाचार था एवं 95 साहित्यकारों को पुरस्कार दिए जाने के संबंध में 
जानकारी दी गई थी... 
आरंभ Aarambha पर संजीव तिवारी 
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 उमड़-घुमड़ कर बादल आये।
घटाटोप अँधियारा लाये।।
काँव-काँव कौआ चिल्लाया।
लू-गरमी का हुआ सफाया।।
 मोटी जल की बूँदें आईं।
आँधी-ओले संग में लाईं।।... 

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