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Tuesday, May 31, 2016

नायरा और रूही ..... कब करेंगी माँ की इज्जत ? चर्चा मंच 2359

सज्जन धर्मेन्द्र 

Asha Saxena 


Manoj Nautiyal 


पूनम श्रीवास्तव 


Priti Surana 


udaya veer singh  


डॉ. अपर्णा त्रिपाठी 


कालीपद "प्रसाद" 


rajeev kumar Kulshrestha 


haresh Kumar 


Krishna Kumar Yadav 


Rajesh Shrivastav 


DrPratibha Sowaty 


Dr.pratibha sowaty 

Monday, May 30, 2016

"संग में काफिला नहीं होता" (चर्चा अंक-2358)

मित्रों
सोमवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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"संग में काफिला नहीं होता" 


बात का ग़र ग़िला नहीं होता
रार का सिलसिला नहीं होता

ग़र न ज़ज़्बात होते सीने में
दिल किसी से मिला नहीं होता

आम में ज़ायका नहीं आता
 वो अगर पिलपिला नहीं होता... 
उच्चारण पर रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 
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जब तक तुम हो ...... 

आइना भी कितना दिलफरेब है 
ये तो बस चेहरा ही देखता है 
नज़रें मेरी तरस बरस कर
हर पल बस तुम्हे देखती हैं 
तुम दिख जाते हो न 
तभी तक ये आँखे देखती हैं... 
झरोख़ा पर निवेदिता श्रीवास्तव 
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चिन्तामणि जोशी की कविताएँ 

चिन्तामणि जोशी चिन्तामणि जोशी जन्म : 3 जुलाई 1967 , ग्राम - बड़ालू, पिथौरागढ (उत्तराखण्ड) शिक्षा : एम. ए. (अंग्रेजी), बी. एड. प्रकाशन : ‘दैनिक जागरण’, ‘अमर उजाला’, ‘कृति ओर’, ‘गाथांतर’, ‘अटूट बंधन’ तथा अन्य हिन्दी की पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, लेख प्रकाशित प्रकाशित पुस्तक : ‘क्षितिज की ओर’ (कविता-संग्रह)- 2013 संपादन : ‘कुमांयू सूर्योदय’ साप्ताहिक -1986 ‘लोक विमर्श’ काव्य स्मारिका- 2015 सम्प्रति : अध्यापन कवि समाज का एक सजग सचेत प्रहरी होता है... 
पहली बार पर Santosh Chaturvedi 
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झूला बाहों का 

दाल पर झूलता बच्चा के लिए चित्र परिणाम
आई छुट्टी गर्मीं की 
कोई काम न धाम 
सड़क नाप बाग़ में पहुंचे 
थी झूले की तलाश... 
Akanksha पर Asha Saxena 
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यहां ड्यूटी पर सोने वाले को  

थप्पड़ पड़ता है ! 

इमारत का रूप तो बदल गया 
पर यहां कार्यरत लोग अभी भी 
बर्टन की मौजूदगी को 
उसके थप्पड़ों के कारण महसूस करते हैं।  
कुछ अलग सा पर गगन शर्मा 
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माइण्ड सेट 

पत्नी घर आज प्यारा बिटवा चला....... यह विदाई गीत बन जाये तो? नहीं पचा पाएंगे ना। हमें तो यही गीत सुनने की आदत है – पी के घर आज प्यारी दुल्हनिया चली.....। इसी सोच से हमारा जीवन बना है। जन्म के साथ ही हमें घुट्टी में ये ही पिलाया गया है और इसे हम कहते हैं माइण्ड सेट। पोस्ट को पढ़ने के लिये ... 
smt. Ajit Gupta 
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एक गजल 

हाथ खाली हैं बिटिया सयानी हो गयी 
राजेश त्रिपाठी मुश्किलें हैं और जाने कितने अजाब हैं। 
जिंदगी की बस इतनी कहानी हो गयी... 
कविता मंच पर Rajesh Tripathi 
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मेट्रो में आज़ादी का सफ़र 

महिलाओं के खिलाफ हिंसा से जुड़ी तमाम खबरों, आंकड़ों, हकीकत के बीच औरतों की आजादी से जुड़ी यह एक सुंदर तस्वीर है। दिल्ली की मेट्रो में सफर करती महिलाओं की तस्वीर। मेट्रो स्टेशन पर तेज कदम के साथ वे दाखिल होती हैं। उनकी चाल में उनका आत्मविश्वास झलकता है। उनकी आंखों में सफलता की चमक है। उन तमाम लड़कियों के चेहरे पढ़िए, कुछ एक को छोड़ दें तो ज्यादातर मजबूत-आत्मनिर्भर लगती हैं। अपने बैग कंधे पर डाले वे आगे बढ़ती हैं। पहले बाजारों में लड़कियां-महिलाएं डरी-सहमी या चौकस सी ज्यादा दिखाई देती थीं। जैसे कभी भी कोई हादसा उनकी तरफ लपकता हुआ आ सकता है। उस सूरत में वह कुछ नहीं कर पाएंगी। उनकी मदद कोई नहीं करने आएगा... 
वर्षा  
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“फूल जंगल में खिले किन के लिए” 

नव सुहागिन या वियोगिन के लिए 
तारे टाँके रात ने किन के लिए 
नीतियों के संग होंगी रीतियाँ 
मैं चली हूँ आस के तिनके लिए... 
वाग्वैभव पर Vandana Ramasingh 
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Sunday, May 29, 2016

मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के दो साल--चर्चा अंक 2357

जय माँ हाटेश्वरी....

सफलता भी फीकी लगती है,
यदि कोई बधाई देने वाला नहीं हो।
 विफलता भी सुंदर लगती है,
 जब आपके साथ कोई अपना खड़ा हो।
तुम पानी जैसे बनो,
जो अपना रास्ता खुद बनाता है।
पत्थर जैसे ना बनो,
जो दूसरों का रास्ता भी रोक लेता है।
जिसका जैसा " चरित्र " होता है,
उसका वैसा ही " मित्र " होता है। 
अब देखिये आज की रविवारीय चर्चा में मेरी पसंद के कुछ चुने हुए लिंक... 
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विविध दोहे "वीरों का बलिदान" 

कितने ही दल हैं यहाँ, एक कुटुम से युक्त। 
होते बारम्बार हैं, नेता वही नियुक्त।। 
देश भक्ति का हो रहा, पग-पग पर अवसान। 
भगत सिंह को आज भी, नहीं मिला है मान। 
याद हमेशा कीजिए, वीरों का बलिदान। 
सीमाओं पर देश की, देते जान जवान। 
पर 
रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 
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प्रेम प्रीत की बात करते, थकते नही व्याख्यान में
जाति धर्म की आड में, व्यवस्था को ही निगल रहा
खो गयी शर्मो हया , सूख गया आँखो का पानी
देख कर सुन्दरी, सुरा, आचरण भी फिसल रहा 
पर 
डॉ. अपर्णा त्रिपाठी 
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बंदिश  नहीं  है  कोई  ग़ज़लगोई  पर  यहां
बस  हमको  मुंतज़िम  की  अदा  रोक  रही  है
मक़्तूल  के  अज़ीज़  परेशां  हैं  दर ब दर
सरकार  क़ातिलों  की  सज़ा  रोक  रही  है 
पर 
Suresh Swapnil 
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शाम गहराने लगती है, कुछ है जो राग अपना गाने लगती है, मैं ढूँढने लगता हूँ ज़िंदगी यहाँ-वहाँ, वह लावारिस, ललचाई निगाहों से - मुझे निहारने लगती है। समझ नहीं
पाता निहितार्थ उसका मैं, आँखें चुरा कर मुक्ति पाता हूँ, मुड़ कर देखता हूँ जो पीछे, आत्मग्लानि से ख़ुद को भरा पाता हूँ। 
पर 
Dr.Mahesh Parimal 
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हम मांगते ही रह गए,परछाइयों का साथ
हर बार अक्स लेकिन , उनके बदल गए ।।
इक रोज टूट जाएगा  , ये प्यार का महल
विश्वाश के कभी जो ,पत्थर पिघल गए ।।
पर
Manoj Nautiyal 
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s400/PM-Narendra-Modi
अगर इन सर्वे और हाल ही में हुए चुनावो के आधार पर बात कही जाए तो निश्चित रूप से नतीजे सरकार के पक्ष में ही जायेंगे और मोदी जी का दो साल का कार्य-काल संतोषजनक
ही कहलायेगा । स्टार्टअप इंडिया और मेक इन इंडिया जैसी योजनाओं से एक नयी आशा जगी है  और इस तरह की योजनाओं में रोजगार की सम्भावनाएं भी दिखती है जिससे और युवाओं
में एक जोश  आया है।  जनधन योजना , मुद्रा बैंक , प्रधानमंत्री फसल विमा योजना, राष्ट्रीय कृषि बाजार और स्वच्छता अभियान आदि एक अच्छी शुरुआत है ।
पर 
Deepak Chaubey 
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अंधेरे में भी मुझे ताकती रहती हैं चिडि़यां
एक द्वीप मेरे भीतर चिडि़यों का
गाता रहता है गीत उजालों के: 
काफी पहले विदा हो गया मेरा घर
नारीयल और केलों के पेड़ो के साथ
सपनों में देखती हूं खिली हुई दोपहर ने
गढ़ दिया है एक स्वच्छंद द्वीप
पर
विजय गौड़ 
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समालोचन पर arun dev 

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चाँद कहता है मुझसे 
आदमी क्या अनोखा जीव है 
उलझन खुद पैदा करता है 
फिर न सोता है, 
और मुझसे बाते करता है रात भर... 

aashaye पर garima 

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गर सोच में तेरी पाकीज़गी है 
इबादत सी तेरी मुहब्बत लगी है 
मेरी बुतपरस्ती का जो नाम दे दो 
मैं क़ाफ़िर नहीं ,वो मेरी बन्दगी है... 

आपका ब्लॉग पर आनन्द पाठक 

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शीश झुका कर ज्यों रोये हैं
देवदार के पेड़
बादल के घर ताक-झाँक


करने की उनको डाँट पड़ी है 

भरी हुई पानी की मटकी

सर से टकरा फूट पड़ी है

सूरज भी तो क्षुब्ध हुआ है

उसका रस्ता रुद्ध हुआ है

दिन भर चिंता में खोये हैं
देवदार के पेड़... 
मानसी पर Manoshi Chatterjee 
मानोशी चटर्जी
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दूसरों से शिक्षा लें भूली-बिसरी यादें पर 
राजेंद्र कुमार 
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२८ मई का दिन आज़ादी के परवानों के नाम
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बुरा भला पर शिवम् मिश्रा
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मोहब्‍बत और कुछ नहीं .... 
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एक रोज़
चखा था वर्जित फल का स्‍वाद
उस दि‍न
पेड़ से झड़ी सुनहरी पत्‍ति‍याें ने
सजाया था अनोखा बि‍स्‍तर
चांद पलकें झपकाकर देख रहा था
रूप-अरूप पर रश्मि शर्मा
आज की चर्चा बस यहीं तक...धन्यवाद। 

Saturday, May 28, 2016

"आस्था को किसी प्रमाण की जरुरत नहीं होती" (चर्चा अंक-2356)

मित्रों
शनिवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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छितराए बादल 


मैंने तुझे बंधक बनाया 
अच्छा किया
नहीं तो तू भाग जाता
बूँद बूँद के लिए तरसाता
बदरा है तू कितना निष्ठुर
आता है चला जाता है
ज़रा भी तरस नहीं खाता... 
Akanksha पर Asha Saxena 
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मुझ जैसे बिजली के खम्बे तो आजकल बहुत कम दिखते हैं. इस महानगर में तो मुझ जैसा खम्बा शायद ही आपको दिखे. आदमी ने अब काफी तरक्की कर ली है. अब आपको दिखेंगे सीमेंट या लोहे के खम्बे. पर मेरी बात और है मुझे विधाता ने एक वृक्ष बनाया था. आदमी ने मुझे बिजली का खम्बा बना दिया. है न कितनी अजीब नियति... 
आपका ब्लॉग पर i b arora 
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भारत कभी सोने की चिड़िया, रत्नों की खान और ज्ञान का सागर कहा जाता था.
लेकिन हमारी जनसंख्या ने खासकर इस पर बड़ा प्रहार किया. विदेशी जो लूट गए सो तो लूट ही गए किंतु जन,संख्या की मार ने हमारे बीच ही होड़ खड़ी कर दी. संसाधनों के आभाव में हम स्वार्थी होते गए. दाने - दाने को तरसता गरीब अपना ईमान खो बैठा. इसी गरीबी और मजबूरी की आड़ में हमारे नेताओं ने भी ईमान बेचकर अपना स्वार्थ साधा.  इस तरह देश का नागरिक और नेता दोनों कौम अपना व्यवहार खो बैठे. उनको अपने व्यवहार की चिंता उनको नहीं होती किंतु अन्यों का वही व्यवहार उन्हें परेशान करता है. ऐसे ही कुछ आदतें लोगों को कलुषित रत्न बनाती हैं. ऐसे ही कुछ वाकए यहाँ उद्धृत किए जा रहे हैं.,,, 
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आज उस पुराने  झूले को देखकर कुछ बातें याद  गयी.. 
कई  बरस गुजरे जब वो नया था.. 
उसकी रस्सियाँ चमकदार थी..  
उनमे आकर्षण था..
उन रस्सियों का हर तागा बिलकुल अलग दिखाई देता था..
उस 'हम' में भी अपने 'अहम' को सम्हाले हुए..

उनमे चिकनाहट थी..और उन्हें पकड़ने का सलीका था... 
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सोच बदलो , देश बदलो -- 

सामने एक शानदार गाड़ी चली जा रही थी। अभी हम उसकी खूबसूरती और शान ओ शौकत की मन ही मन प्रसंशा कर ही रहे थे कि अचानक उसकी एक खिड़की खुली और सड़क पर एक पानी की खाली बोतल फेंक दी गई। बोतल जैसे ही हमारी गाड़ी के पहिया के नीचे आई , एक जोर की आवाज़ आई जैसे टायर फट गया हो। हमने घबराकर गाड़ी साइड में लगाकर देखा तो पाया कि पहिया तो सभी सही थे लेकिन वो बोतल पहिया के नीचे आकर फट गई थी... 
अंतर्मंथन पर डॉ टी एस दराल 
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चुप रहो 

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‘’ममा, आप आधे घंटे से रसोई में हो और टीवी यूँ ही चल रहा है| आप बन्द करके जाया करो|’’
‘’चुप रहो’’
‘’पापा जी, बिना पंखा बन्द किए आप बाहर चले गए| मैम ने कहा है बिजली बचाना चाहिए|’’
‘’चुप रहो’’... 
मधुर गुंजन पर ऋता शेखर मधु 
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महानता के मारे 

यह जो ऊपर शीर्षक है – 
‘’महानता के मारे’’, 
यह इस बात को नहीं बताता कि 
किस महानता की बात हो रही। 
लिखने वाले चाहें तो लिख ही सकते हैं 
संबंधित क्षेत्र- 
क्रिकेटर/ वैज्ञानिक/ लेखक/ कवि/फेसबुकिये, आदि आदि... 
लिखो यहां वहां पर विजय गौड़ 
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आये न मोरे पिया 

रिम झिम रिम झिम 
गरजत बरसत काले मेघा 
आये न मोरे पिया .. 
टप टप टिप टिप 
बरस रही बूंदे बारिश की 
पिया गये परदेस सखी री 
मोहे छोड़ अकेला 
सूना अंगना बिन पिया 
जले जिया 
रिम झिम रिम झिम 
गरजत बरसत काले मेघा 
आये न मोरे पिया ... 
Ocean of Bliss पर Rekha Joshi 
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"सब कुछ अभी ही लिख देगा क्या" (चर्चा अंक-2819)

मित्रों! शनिवार की चर्चा में आपका स्वागत है।  देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक। (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')   -- ...