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Tuesday, January 17, 2017

फिर राह ताके प्रौढ़ माँ पर द्वार पर ओढ़े कफन; चर्चामंच; 2581


"कुछ कहना है"

हरिगीतिका छंद

नौ माह तक माँ राह ताकी आह होंठो में दफन।
दो साल तक दुद्धू पिला शिशु-लात खाई आदतन।
माँ बुद्धि विद्या पुष्टता हित नित्य नव करती जतन ।

फिर राह ताके प्रौढ़ माँ पर द्वार पर ओढ़े कफन।। 

535. तुम भी न बस कमाल हो...

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Kajal Kumar 

4 comments:

  1. बढ़िया सतरंगी चर्चा।
    आपका आभार आदरणीय रविकर जी।

    ReplyDelete
  2. सुन्दर चर्चा प्रस्तुति ..आभार

    ReplyDelete
  3. सर आज की चर्चा बढ़िया है |
    मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार सहित धन्यवाद |

    ReplyDelete

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चर्चा - 2817

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