चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

समर्थक

Sunday, January 29, 2017

"लोग लावारिस हो रहे हैं" (चर्चा अंक-2586)

मित्रों 
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

-- 
--

बालगीत  

"प्रकाश का पुंज हमारा सूरज" 


पूरब से जो उगता है और पश्चिम में छिप जाता है। 
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।।  
भानु रात और दिन का हमको भेद बताता है।  
रुकता नही कभी भी चलता रहता सदा नियम से,  
दुनिया को नियमित होने का पाठ पढ़ा जाता है।  
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है... 
--
--
--
--
--
--
--

प्रेम 

आज तुम्हारा चित्र हाथ में क्या आया 
गुजरा कल फिर से यादों में जीवन्त हो उठा... 
धीरेन्द्र अस्थाना 
--
--

और नहीं तो! 

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 
--

लाखों सपनों का शहर -  

कोटा. 

Image result for कोटा शहर
जाले पर पुरुषोत्तम पाण्डेय 
--

704 

भारत माँ ने आँखें खोलीं 
(चौपाई 
ज्योत्स्ना प्रदीप 
--

अच्छा तो लगता है 

जब धीरे से कोई कानों में कह जाता है 
प्यार के दो रसीले शब्द... 
--
--
--
--
--
--
--
--
--
--

तू नशे में था - 

*तू नशे में था * 
*तेरे घर की आबरू * 
*नीलाम हो गई -*  
*तू नशे में था *  
*तेरी ड्योढ़ी बदनाम हो गई ... 
udaya veer singh 
--
--
--
--

बदस्तूर...........अच्युत शुक्ल 

मेरे इश्क़ का मसला ये तमाम हुआ, 
मैं तो बदनाम सरेआम हुआ... 
मेरी धरोहर पर yashoda Agrawal 
--

सप्ताहांत नहीं मासांत के लिए फिल्म बनाइये 

कुछ अलग सा पर गगन शर्मा 
--

गुठली 

चूसकर फेंकी गई जामुन की एक गुठली 
नरम मिट्टी में पनाह पा गई, 
नन्ही-सी गुठली से अंकुर फूटा, 
बारिश के पानी ने उसे सींचा, 
हवा ने उसे दुलराया. 
धीरे-धीरे एक पौधा, 
फिर पेड़ बन गई... 
कविताएँ पर Onkar 
--

सबके अपने युद्ध अकेले 

और स्वयं ही लड़ने पड़ते, 
सहने पड़ते, कहने पड़ते, करने पड़ते,  
ह सब कुछ भी, 
जो न चाहे कभी अन्यथा... 
Praveen Pandey 
--

अवमूल्यन किसका हुआ है 

Upchar और प्रयोग 
--

कविता  

"अब बसन्त आने वाला है"  

--

वे जड़े ढूंढ रहे हैं 

गणतंत्र दिवस अपनी उपादेयता बताकर चले गया, मेरे अंदर कई पात्र खलबली मचाने लगे हैं। देश के गण का तन्त्र और देश के मन की जड़े दोनों को खोद-खोदकर ढूंढने का ढोंग कर रही हूँ। जी हाँ हम ढोंग ही करते हैं। देश के प्रतीक के रूप में अपने ध्वज के समक्ष जब सल्यूट करने को हाथ उठते हैं तब उसके तंत्र की ओर ध्यान ही नहीं जाता... 
smt. Ajit Gupta 
--

7 comments:

  1. शुभ प्रभात
    आभार
    सादर

    ReplyDelete
  2. बहुत सुन्दर सूत्रों से सुसज्जित आज का चर्चामंच ! मेरी प्रस्तुति को सम्मिलित करने के लिए आपका हृदय से आभार शास्त्री जी ! धन्यवाद !

    ReplyDelete
  3. बहुत सारे सुन्दर सूत्रों के साथ सजी आज की रविवारीय चर्चा में 'उलूक' के सूत्र 'बधाई है बधाई है बधाई है बधाई है' और 'बिना झंडे के लोग लावारिस हो रहे हैं' को स्थान देने के लिये आभार ।

    ReplyDelete
  4. बहुत सारे सुन्दर सूत्रों से सुसज्जित आज की सुन्दर रविवारीय चर्चा। मेरी रचना "जाड़े अब जा रे" को शामिल करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यबाद शास्त्री जी।

    ReplyDelete
  5. बहुत सुन्दर चर्चा प्रस्तुति
    आभार!

    ReplyDelete
  6. लाजबाव चर्चा प्रस्तुति

    ReplyDelete
  7. बहुत सारे सुन्दर सूत्रों से सुसज्जित आज की सुन्दर रविवारीय चर्चा। मेरी रचना को शामिल करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यबाद शास्त्री जी।

    ReplyDelete

"चर्चामंच - हिंदी चिट्ठों का सूत्रधार" पर

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथा सम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin