चर्चा मंच पर सप्ताह में तीन दिन (रविवार,मंगलवार और बृहस्पतिवार)

को ही चर्चा होगी।

रविवार के चर्चाकार डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक,

मंगलवार के चर्चाकार

श्री दिनेश चन्द्र गुप्ता रविकर

और बृहस्पतिवार के चर्चाकार श्री दिलबाग विर्क होंगे।

समर्थक

Tuesday, April 25, 2017

"जाने कहाँ गये वो दिन" (चर्चा अंक-2623)

मित्रों 
मंगलवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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एक युगल शिकायती गीत --- 

वरना क्या मैं------ 

कैसे कह दूँ कि अब तुम बदल सी गई 
वरना क्या मैं समझता नहीं बात क्या.. 
आपका ब्लॉग पर आनन्द पाठक 
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मुक्त-ग़ज़ल : 232 -  

मीर के दीवान बिकते हैं ? 

कहीं पर रात में आधी ; सजे अरमान बिकते हैं 
कहीं पर दिन दहाड़े मौत के सामान बिकते हैं ... 
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किसान की आह! 

मैं किसान हूं।
 पेशाब पीना मेरे लिए खराब बात नहीं है। 
जहर पीने से बेहतर है पेशाब पीना। 
जहर पी लिया तो मेरे साथ
 मेरा पूरा परिवार मरेगा 
पर पेशाब पीने से 
केवल आपकी संवेदनाएं मरेंगी। 
मेरा परिवार शायद बच जाए... 
वंदे मातरम् पर abhishek shukla 
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प्लास्टिकासुर--- 

डा श्याम गुप्त 

*धरती दिवस -* 
यूं तो धरती को प्रदूषित करने में सर्वाधिक हाथ हमारे अति-भौतिकतावादी जीवन व्यवहार का है | यहाँ हमारी धरती को कूड़ा घर बनाने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कारक एवं जो प्राप्ति, उपयोग , उपस्थिति एवं समाप्ति के प्रयत्नों से सर्वाधिक प्रदूषण कारक है उस तत्व को निरूपित करती हुई , 
पृथ्वी दिवस पर ....एक अतुकांत काव्य-रचना प्रस्तुत है--- 
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क्या मालूम 

मैं किस ओर चला क्या मालूम ? 
कॊई कहे ले गयी पवन उड़ाकर 
कॊई कहता नदिया के तीर गया
 ज्वाला के संग संग 
दिन -रात जलाया दीप... 
Mera avyakta पर राम किशोर उपाध्याय 
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लाल बत्ती की अभिलाषा - 

अमृता की आत्मकथा रसीदी टिकट में एक वाक्या है कि किसी ने एक एक बार उनका हाथ देख कर कहा कि धन की रेखा बहुत अच्छी है और इमरोज़ का हाथ देख कर कहा की धन की रेखा बहुत मद्धम है .इस पर अमृता हंस दी और उन्होंने कहा की कोई बात नहीं हम दोनों मिल कर एक ही रेखा से काम चला लेंगे .... और इस वाकये के बाद उनके पास एक पोस्ट कार्ड आया जिस पर लिखा था ---- मैं हस्त रेखा का ज्ञान रखती हूँ .... 
कुमाउँनी चेली पर शेफाली पाण्डे  
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क्यों रोये माटी का पूत - 

आँख भरी आंचल खाली है 
भरे गोदाम खाली थाली है... 
udaya veer singh 
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सोचता हूँ के अगर जाऊँगा तो क्या लेकर 

होते फिर शे’र मेरे क़ाफ़िया क्या क्या लेकर 
बात बन जाती लुगत का जो सहारा लेकर 
लिख दिया मैंने अभी एक अजूबा सी हज़ल 
कह दो तो पढ़ दूँ यहाँ नाम ख़ुदा का लेकर ... 
चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 
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दिल के लहू में...... 

डॉ. विजय कुमार सुखवानी 

दिल के लहू में आँखों के पानी में रहते थे 
जब हम माँ बाप की निग़हबानी में रहते थे... 
मेरी धरोहर पर yashoda Agrawal 
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जिंदगी किताब और आखरी पन्ना ... 

क्या सच में जीवन का अन्त नहीं ... 
क्या जीवन निरंतर है ... 
आत्मा के दृष्टिकोण से देखो तो शायद हाँ ... 
पर शरीर के माध्यम से देखो तो ... 
पर क्या दोनों का अस्तित्व है एक दुसरे के बिना ... 
छोड़ो गुणी जनों के समझ की बाते हैं अपने को क्या ... 
अचानक नहीं आता ज़िंदगी की क़िताब का 
आखरी पन्ना हां ... 
Digamber Naswa 
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अमर शहीदॊं कॆ चरणॊं मॆं,,,,, 

नंदनवन मॆं आग लगी है,पता नहीं रखवालॊं का, 
कैसॆ कोई करे भरोसा,कपटी दॆश दलालॊं का... 
kavirajbundeli 
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सीखने की कोई उम्र नहीं होती 

अर्चना चावजी Archana Chaoji 
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सेल पर हैं हम 

साल के पहले दिन का सेल 
साल के अंतिम दिन का सेल 
आज़ादी के जश्न का सेल 
गणतंत्र का सेल 
संविधान दिवस सेल... 
सरोकार पर Arun Roy  
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सुप्रीम कोर्ट का फैसला 

"नौकरी में आरक्षण नहीं मिलेगा" 

Faiyaz Ahmad 
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(१)
जालजगत है देवताकम्प्यूटर भगवान।
शोभा है यह मेज कीऑफिस की है शान।।
ऑफिस की है शानबनाता अनुबन्धों को।
सारे जग में सदाबढ़ाता सम्बन्धों को।।
कह मयंक कविरायअनागत ही आगत है।
सबसे ज्ञानी अब दुनिया में जालजगत है...
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पढ़े-लिखे करते नहीं, पुस्+तक से सम्वाद।
इसीलिए पुस्+तक-दिवस, नहीं किसी को याद।।
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पुस्+तक उपयोगी नहीं, बस्ते का है भार।
बच्चों को कैसे भला, होगा इनसे प्यार।।

दोहे 

"बत्ती नीली-लाल" 

नहीं मिलेगी किसी को, बत्ती नीली-लाल।
अफसरशाही को हुआ, इसका बहुत मलाल।।
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लाल बत्तियों पर लगी, अब भगवा की रोक।।
सत्ता भोग-विलास में, छाया भारी शोक।।
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लालबत्तियाँ पूछतीं, शासन से ये राज़।
इतने दशकों बाद क्यों, गिरी अचानक ग़ाज़।।
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नेताओं का पड़ गया, चेहरा आज सफेद।
पलक झपकते मिट गया, आम-खास का भेद।।
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देखे कब तक चलेगा, यह शाही फरमान।
दशकों की जागीर का, लुटा आज अभिमान।।
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समय-समय की बात है, समय-समय का फेर।
नहीं मिलेगी भोज में, तीतर और बटेर।।
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अच्छा है यह फैसला, भले हुई हो देर।
एक घाट पर पियेंगे, पानी, बकरी-शेर।।
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भारी मन से हो रहा, निर्णय यह स्वीकार।
सजी-धजी इस कार का, उजड़ गया सिंगार।।

Sunday, April 23, 2017

"सूरज अनल बरसा रहा" (चर्चा अंक-2622)

मित्रों 
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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हँसते ही.... 

गिरिजा अरोड़ा 

मुझे नहीं मालूम कैसे 
पर हँसते ही फूल खिल जाते हैं 
दिल मिल जाते हैं 
ग़म के स्तंभ हिल जाते हैं 
रंग छा जाते हैं 
ढंग भा जाते हैं... 
मेरी धरोहर पर yashoda Agrawal 

सामना 

जब सामना होगा तो बात भी हो जाएगी, 
पुरानी अटकी हुई वो रात भी हो जाएगी... 
खामोशियाँ...!!! पर Misra Raahul 
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आम 

नव अंशु पर Amit Kumar 
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तुम तो हार तभी गये थे... 

तुम्हारे लिए मुझे त्याग देना आसान था, 
क्यों की तुम महान बनाना चाहते थे... 
तुम खुद को संयम में, बांध कर जीना चाहते थे, 
क्यों कि तुम इक मिशाल बनाना चाहते थे... 
मुझे नही पता कि, 
तुम्हे तकलीफ हुई थी या नही... 
'आहुति' पर Sushma Verma 
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प्यार किया उनसे तो यह रिश्ता है निभाना 

करते हम प्यार उनको दुश्मन है ज़माना 
ढूंढते रहते नित मिलने का है बहाना... 
Ocean of Bliss पर Rekha Joshi  
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अंगूठा 

अर्चना चावजी Archana Chaoji  
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दाव:-ए-हस्रते-दिल ... 

उलझनों से भरा दिल नहीं चाहिए 
मुफ़्त में कोई मुश्किल नहीं चाहिए... 
Suresh Swapnil 
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दो बूँद का सागर 

अनिल हूँ मैं ... 
मुझे तुम्हारी फैक्ट्री से निकलते 
जहरीले धुएं से क्या काम 
मुझे तो तोड़ देनी है ... 
नफरत और जलन उगलती 
सभी अयाचित चिमनियाँ  
अनल हूँ मैं ....  
Mera avyakta पर 
राम किशोर उपाध्याय 
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देवनागरी - 

ब्राह्मी से उद्भव ले विकसे 
जो देवनागरी के आखऱ, 
अक्षर अक्षरशः सार्थक हैं... 
प्रतिभा सक्सेना 
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मृत्यु 

जीवन का अंतिम उत्सव है मृत्यु 
पत्तियां पीली पड़ जाती हैं 
मरने से पहले... 
सरोकार पर Arun Roy 
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सालासर बालाजी धाम जाएं तो 

तुलसीदेवी सेवासदन को जरूर आजमाएं 

कुछ अलग सा पर गगन शर्मा 
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मंजिल की तलाश में 

मंजिल की तलाश में 
बहुत दूर निकल आये हम... 
vandana gupta 
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सात फेरे 

सात फेरों से शुरू हुआ 
जीवन का ये सफर , 
सात फेरे सात जनम के लिए 
सात वचनों से गढ़े 
सात गांठों मे बंधे... 
प्यार पर Rewa tibrewal 
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वह दुनिया 

जी करता है, 
फिर से संकरी पगडंडियों पर चलूँ, 
लहलहाते धान के खेतों को देखूं, 
फूलों पर पड़ी ओस की बूंदों को छूऊँ, 
ताज़ी ठंडी हवा जी भर के पीऊँ... 
कविताएँ पर Onkar 
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गर्मी आई गर्मी आई 

अर्चना चावजी Archana Chaoji 
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बाल भवन के नन्हें कलाकारों का 

गौरैया के प्रति समर्पण 

गिरीश बिल्लोरे मुकुल 
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बेला के फूल 

स्पर्धा थी सौंदर्य की, मौसम था प्रतिकूल 
सूखे फूल गुलाब के, जीते बेला फूल | 
चली चिलकती धूप में, जब मजदूरन नार 
अलबेली को देख कर, बेला मानें हार... 
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नारी की सुरक्षा में ही 

मानव जाति की सुरक्षा है  

यह मानव जाति का दुर्भाग्य ही है कि एक ओर जहाँ लगभग आधी शताब्दी पूर्व मानव चरण चाँद पर पड़े थे , मंगल गृह पर यान उतर चुके हैं और अंतरिक्ष में भी मनुष्य तैरकर , चलकर , उड़कर वापस धरती पर सफलतापूर्वक उतर चुका है , वहीँ दूसरी ओर आज भी हमारे देश में विवाहित महिलाओं पर न सिर्फ दहेज़ के नाम पर अत्याचार किये जा रहे हैं , बल्कि उन्हें आग में झोंक दिया जाता है। यह मानवीय व्यवहार किसी भी तरह क्षमा के योग्य नहीं है। इन कुकृत्यों के अपराधियों की सज़ा कारावास से बढाकर फांसी कर देना चाहिए... 
अंतर्मंथन पर डॉ टी एस दराल 
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धूप और छाँव 

धूप और छाँव की लुकाछिपी 
कितनी अच्छी लगती है 
धूप में जब थक जाओ 
छाँव शीतलता देती है... 
aashaye पर garima 
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दोहे 

"धरती का त्यौहार" 

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अपना धर्म निभाओगे कब
जग को राह दिखाओगे कब

अभिनव कोई गीत बनाओ,
घूम-घूमकर उसे सुनाओ
स्नेह-सुधा की धार बहाओ
वसुधा को सरसाओगे कब
जग को राह दिखाओगे कब... 
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गीत 

"मैदान बदलते देखे हैं" 

इंसानों की बोली में, ईमान बदलते देखे हैं 
धनवानों की झोली में, सामान बदलते देखे हैं... 
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