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Wednesday, August 02, 2017

गये भगवान छुट्टी पर, कहाँ घंटा बजाते हो; चर्चामंच 2685


गये भगवान छुट्टी पर, कहाँ घंटा बजाते हो। 

रविकर 
गये भगवान छुट्टी पर, कहाँ घंटा बजाते हो।
कहाँ चन्दन लगाया है, कहाँ माला चढ़ाते हो।।

चलो उस पार्क में चलते, जहाँ कुछ वृद्ध आते हैं।
स्वजन सब व्यस्त हैं जिनके, चलो उनको हँसाते हैं।
सुनेंगे बात उनकी हम, कहो क्या साथ आते हो।
गये भगवान छुट्टी पर, कहाँ घंटा बजाते हो।।१।। 

दोहे 

"बरसो अब घनश्याम" 

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’) 

यात्रा अभी शेष है... 

डॉ. कौशलेन्द्रम 

आई तीज हरियाली 

Asha Saxena 

BRIJ GHAT, GARH GANGA 

ब्रजघाट, गंगा में स्नान 

SANDEEP PANWAR 

पेड़ सी होती है स्त्री.....निधि सक्सेना 

yashoda Agrawal 

काला पूरा काला 

सफेद पूरा सफेद 

अब कहीं नहीं दिखेगा 

सुशील कुमार जोशी 

ये मेरी हत्या का समय है 

न कोई पूर्वाभास 
नहीं कोई दुर्भाव 
नहीं बस जानता हूँ 
तलवारों की दुधारी धार को... 
vandana gupta  

शान्ति की खोज 

हिन्दी_ब्लॉगिंग 

पिछले दिनों फेसबुक पर किसी की शेअर की हुई कहानी पढ़ी,मालूम नहीं सच थी या कहानी थी,उसमें बताया था कि एक स्त्री अपने पति की मृत्यु के बाद अपने छोटे से बेटे को कई मुश्किलों का सामना कर के बड़ा करती है,उसकी हर सुविधा का ध्यान रख कर उसे उच्च शिक्षा दिलवाती है बच्चा आगे की पढ़ाई के लिए विदेश जाता है ,वहीं शादी कर लेता है, माँ उसके आने की राह देखती रहती है,लेकिन वो नहीं लौटता,स्त्री के अड़ोसी-पड़ोसी इस बीच उसका खयाल रखते हैं, उसको अपने परिवार का सदस्य मानकर सम्मान देते हैं ,और आखिर में वो बीमार हो जाती है ,बेटे को बीमारी की खबर भी कर दी जाती है, और उसके आने का इंतजार करते हुए स्त्री ... 
मेरे मन की पर अर्चना चावजी 

नदी​ एवं अन्य कविताएं- 

वंदना सहाय 

सुबोध सृजन पर subodh srivastava 
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कार्टून:-  

खुसरो की जंगल वापसी 

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इन आंसुओं को ....।। 

आंसूओ के मोती ,यूँ जाया ना करो , 
ये दौलत है कीमती, यूँ बहाया ना करो... 
kamlesh chander verma  
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आशिक़ी 

आदाब दोस्तो! मैं हूँ आशिक़ शे’र लिखना शाइरों का काम है मैंने तो बस वह लिखा है जो लिखाई आशिक़ी पास होना था हुआ पर कैसे बतलाऊँ मुझे कब कहाँ किस तर्ह कितना आज़माई आशिक़ी 
चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 

भीगती कविता 

Mukesh Kumar Sinha  
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मानवीय समंदर 

मेरी भावनायें...पर रश्मि प्रभा...  
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खाली हो 

डॉ. अपर्णा त्रिपाठी 
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पापा की बदलती भूमिका के लिए  

सोचा जाना ज़रूरी 

परिसंवाद पर डॉ. मोनिका शर्मा  
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कुछ पल 

ऐ जिंदगी कुछ पल ठहर जा 
इठलाने की उम्र अभी बाकी हैं 
शरारतें अभी बहुत करनी बाकी हैं 
माना दहलीज़ बचपन की गुज़र गयी
 पर मुक़ाम बचपने का अब तलक बाकी हैं ... 
RAAGDEVRAN पर MANOJ KAYAL  
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6 comments:

  1. बहुत सुन्दर और पढनीय लिंकों के साथ सार्थक चर्चा।
    आपका आभार आदरणीय रविकर जी।

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  2. सुप्रभात,
    अति सुंदर ब्लॉग चर्चा,
    सादर।

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  3. सुन्दर चर्चा । आभार रविकर जी 'उलूक' के काले सफेद को जगह देने के लिये।

    ReplyDelete
  4. बहुत बढ़िया चर्चा प्रस्तुति

    ReplyDelete
  5. बहुत बढिया चर्चा..
    सादर

    ReplyDelete
  6. बहुत-बहुत आभार।

    ReplyDelete

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