समर्थक

Monday, August 28, 2017

"कैसा सिलसिला है" (चर्चा अंक 2710)

मित्रों!
सोमवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

--

ये कैसा सिलसिला है.... 

डॉ. अपर्णा त्रिपाठी  
--
--
--

Who owns the INTERNET ? 

इंटरनेट का मालिक कौन ? 

तो इन सवाल का जबाब साफ है इंटरनेट पर किसी का अधिकार नहीं है यानि इंटरनेट का मालिक कोई नहीं सब एक दूसरे के सहयोग से आप तक इंटरनेट सेवा पहुॅचाते हैं, इसी में सबका फायदा है... 
--

धुंध 

Sudhinama पर sadhana vaid 
--

ब्लॉगिंग की दुनिया में वापसी 

प्रिय पाठकों , सन 2011 नवम्बर में मैंने ब्लॉगिंग करना बंद कर दिया था अब पूरे 6 साल बाद मैं अपने ब्लॉग *नन्हीं कोपल* को नये सिरे से शुरू करने जा रही हूँ । इन बीते हुए सालों में मैंने एम .एससी (ह्यूमन डेवेलपमेंट) बी.एड ,पीजीडीसीए की डिग्री प्राप्त की है । मैं अपने लेखनी के माध्यम से पाठकों को ऐसी जानकारियां देना चाहती हूँ जो सभी पाठकगण के लिए उपयोगी व ज्ञानवर्धक हो , आशा है सभी पाठकों को यह प्रयास पसंद आयेगा । *कोपल कोकास* 
नन्ही कोपल पर कोपल कोकास 
--
--

सिर्फ गर्दन हमारी है - 

मुशिफ भी तुम्हारा है वजीर भी तुम्हारा है
शमशीर भी तुम्हारी है सिर्फ गर्दन हमारी है -
खेल भी तुम्हारा है खिलाड़ी भी तुम्हारे हैं
पत्ते भी तुम्हारे हैं सिर्फ हार ही हमारी है -
मुल्क भी हमारा है ये मिट्टी भी हमारी है
अमन के सिपाही हैं ये किस्मत तुम्हारी है 
udaya veer singh 
--
--

(व्यंग्य रचना)  

वाह रे मैं ...! 

लोग अपने व्यक्तिगत जीवन में किसी महत्वपूर्ण ओहदे को प्राप्त करते हैं , पदोन्नत हो जाते हैं , कोई नई कुर्सी मिल जाती है , किसी ने अपने लेटरपैड के पन्ने पर किसी को किसी संस्था का पदाधिकारी बना दिया , बिल्ली के भाग्य से कोई ईनाम किसी की झोली में टपक पड़ा , तो ऐसे स्वयंभू महान लोग अपने फोटो के साथ अख़बारों में अपनी तारीफ़ खुद छपवाते हैं... 
मेरे दिल की बात पर Swarajya karun 
--

मेरी सोनचिरैया 

चिड़िया दिन भर आँगन में चहकती 
यहाँ वहाँ टहनियों पे 
अपना डेरा जमाती 
कुछ दिनों में नज़र न आती 
पर शायद उसका स्थान 
मेरी बेटी ने ले लिया है 
जब से उसने पायल पहनी 
ठुमक ठुमक के चलती ... 
Akanksha पर Asha Saxena 
--
--

भ्रष्ट वो जिसकी कलई खुल गई है.. 

सबसे पहले उनसे क्षमायाचना जो सचमुच के बाबा हैं. वो इस आलेख के सिलेबस में नहीं हैं. वैसे इतना कहकर अगर इनसे हाथ खड़े करवाये जायें कि बताओ कौन कौन इसके सिलेबस में नहीं हैं तो सभी बाबा हाथ खड़े कर देंगे मगर अगर इनके कर्मों से हाथ उठवाया जाये तो सारे सिलेबस में ही नजर आयेंगे. तो सचमुच के बाबाओं को छोड़ कर बाकी के बचे बाबा दो प्रकार के होते हैं. एक तो वो जिनका पर्दाफाश हो चुका है और दूसरे वो जिनका पर्दाफाश अभी नहीं हुआ है. ठीक वैसे ही जैसे हम नेताओं और अधिकारियों को भ्रष्ट और ईमानदार की श्रेणी में रखते हैं, यहाँ भी सिलेबस के बाहर वाले अपवाद हो सकते हैं, मगर फिर भी, भ्रष्ट वो जिसकी कलई खुल गयी... 
--

'बेअकल लड़की ' :  

कहानी (1) -  

रचना भोला 'यामिनी' 

आदरणीया रचना जी एक बेहद सक्रिय जीवन उल्लास में रची-पगी लेखिका हैं l फेसबुक पर आपके लिखे 'लव नोट्स' धूम मचाये हुए हैं और अभी हाल के जागरण बेस्टसेलर में आपका एक अनुवाद जगह बनाये हुए है l नवोत्पल के लिए आपने चार कहानियां सप्रेम भेजी हैं, इस कड़ी में यह पहली कहानी है l यह कहानी कितनी रियल है और कैसे यह कुछ अब्सट्रैक्ट से समझे जाने वाले पलों की महत्ता उकेरती है, यह देखते ही बनता है... 
नवोत्पल पर Shreesh K. Pathak  

5 comments:

  1. शुभ प्रभात
    आभार
    सादर

    ReplyDelete
  2. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति

    ReplyDelete
  3. सुन्दर चर्चा, सार्थक सूत्र ! मेरी रचना को सम्मिलित करने के लिए आपका हृदय से बहुत-बहुत धन्यवाद एवं आभार शास्त्री जी !

    ReplyDelete
  4. आदरणीय शास्त्री जी क्रांतिस्वर की पोस्ट को लगाने के लिए आभार व धन्यवाद।

    ReplyDelete

"चर्चामंच - हिंदी चिट्ठों का सूत्रधार" पर

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथा सम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin