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Wednesday, September 27, 2017

निमंत्रण बिन गई मैके, करें मां बाप अन्देखी-; चर्चामंच 2740


निमंत्रण बिन गई मैके, करें मां बाप अन्देखी-

रविकर 
विधाता छंद
निमंत्रण बिन गई मैके, करें मां बाप अन्देखी।
गई जब यज्ञशाला में, बघारे तब बहन शेखी।
कहीं भी भाग शिव का जब नहीं देखी उमा जाकर।
किया तब दक्ष पुत्री ने कठिन निर्णय कुपित होकर।
स्वयं समिधा सती बनती, हुआ विध्वंस तब रविकर।
उठाकर फिर सती काया, वहां ताँडव करें शंकर।।
प्रलय संभावना दीखे, उमा-तन से शिवा सनके।
सुदर्शन चक्र से टुकड़े करें तब विष्णु उस तन के।।

Untitled 

गजल 

निर्मला कपिला 

कुएँ का मेंढक 

Neha 
--

.....बच बच के, 

बच के कहाँ जाओगे 

एक पुरानी फिल्म, यकीन, का गाना है, "बच बच के, बच के, बच बच के, बच के कहाँ जाओगे" ! जो आज पूरी तरह देश के मध्यम वर्ग पर लागू हो फिर मौंजूं है ! उस गाने के बोलों को बिना जुबान पर लाए, आजमाया जा रहा है, देश के इस शापित वर्ग पर।  देश की जनता समझ तो सब रही है ! फिलहाल चुप है। पर उसकी चुप्पी को अपने हक़ में समझने की भूल भी लगातार की जा रही है। आम-जन के धैर्य की परीक्षा तो ली जा रही है, पर शायद यह सच भुला दिया गया है कि हर चीज की सीमा होती है। नींबू चाहे कितना भी सेहत के लिए मुफीद हो, ज्यादा रस पाने की ललक में अधिक निचोड़ने पर कड़वाहट ही हाथ लगती है.... 
कुछ अलग सा पर गगन शर्मा 

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है ,,,,,,, 

दुष्यंत कुमार 

yashoda Agrawal 

बीएचयू में षडयंत्रकारी तत्वों का जमघट 

Virendra Kumar Sharma 

मुँडेर से गिरी जो तेरी ओढनी अभी-अभी... 

गौतम राजऋषि 

लोकतांत्रिक आचरण को सीखने की जरूरत 

Dr.Aditya Kumar 

मुक्तक 

रविकर 

दोहे

रविकर 

हिदायत 

प्यार पर Rewa tibrewal 

दोहे "हरकत हैं नापाक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 

--

जिन्दगी  

जिन्दगी विवशता में हाथ कैसे मल रही है 
जिन्दगी मनुज से ही मनुजता को छल रही है... 
jai prakash chaturvedi  

5 comments:

  1. शुभ प्रभात
    आभार
    सादर

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  2. बहुत बढिया चर्चा..

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  3. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति

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  4. बिन बुलाए कही भी नही जाना चाहिए चाहे वह फिर मायका ही क्यों न हो! बहुत सुंदर
    मेरी रचना शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, शास्त्री जी।

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