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Wednesday, October 25, 2017

"प्रीत के विमान पर, सम्पदा सवार है" (चर्चा अंक 2768)

मित्रों!
बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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गीत  

"बुखार ही बुखार है"  

नशा है चढ़ा हुआ, खुमार ही खुमार है।
तन-बदन में आज तो, बुखार ही बुखार है।।

मुश्किलों में हैं सभी, फिर भी धुन में मस्त है,
ताप के प्रकोप से, आज सभी ग्रस्त हैं,
आन-बान, शान-दान, स्वार्थ में शुमार है...
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साँझ ढले बिटिया पढ़ती है-- 

छंद 

मापनीयुक्त मात्रिक छंद - 1.हरिगीतिका- गागालगा गागालगा गागालगा गागालगा 
सूरज उगा ज्यों ही गगन में, कालिमा घटने लगी|मन व्योम के विस्तृत पटल पर, लालिमा बढ़ने लगी||कलकल सरित अपनी लहर में, गीतिका कहती रही|पाषाण वाली राह पर भी, प्रेम से बहती रही|... 

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चिड़िया: खामोशियाँ गुल खिलाती हैं ! 

चिड़िया: खामोशियाँ गुल खिलाती हैं !: 
रात के पुर-असर सन्नाटे में 
जब चुप हो जाती है हवा 
फ़िज़ा भी बेखुदी के आलम में हो जाती है 
खामोश जब ! ठीक उसी लम्हे, 
चटकती हैं अनगिनत कलियाँ... 
आपका ब्लॉग पर Meena Sharma  
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7 comments:

  1. शुभ प्रभात...
    आभार
    सादर

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  2. sundar prastuti .meri post ko sthan dene hetu hardik dhanyawad

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  3. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति

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  4. बेहद सुंदर लिंक्स का संकलन ! मेरी रचना को चर्चामंच पर पाकर बहुत खुशी हो रही है । सादर,सविनय आभार!

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  5. धन्यवाद शास्त्रीजी ----याहां सदैव ही अच्छे लिंक प्रस्तुत होते हैं---

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