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Wednesday, November 08, 2017

चढ़े बदन पर जब मदन, बुद्धि भ्रष्ट हो जाय ; चर्चामंच 2782

यद्यपि सहारे बिन जिया वह लाश के ही भेष में- 

रविकर 
तुम रंग गिरगिट सा बदलना छोड़ दो।
परिपक्व फल सा रंग बदलो अब जरा।
जैसे नरम स्वादिष्ट मीठा फल हुआ।
वैसे मधुरता नम्रता विश्वास ला ।। 

वापी 

Purushottam kumar Sinha 

किताबें 

डॉ. अपर्णा त्रिपाठी 

चढ़े बदन पर जब मदन, बुद्धि भ्रष्ट हो जाय 

रविकर 
है भविष्य कपटी बड़ा, दे आश्वासन मात्र। 
वर्तमान से सुख तभी, करते प्राप्त सुपात्र।। 

पत्ते और फूल  

ऋता शेखर 'मधु' 

कविता  

"भूखी गइया कचरा चरती"  

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 


सड़क  किनारे जो भी पाया, 
पेट उसी से यह भरती है। 
मोहनभोग समझकर, 
भूखी गइया कचरा चरती है... 

9 comments:

  1. शुभ प्रभात
    आभार
    सादर

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  2. उम्दा चर्चा। मेरी रचना शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, आदरणीय शास्त्री जी।

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  3. सुंदर प्रस्तुति। मेरी रचना को भी स्थान देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद, आदरणीय शास्त्री जी।

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  4. सबकी रचनाएँ अति उत्तम सबको बधाई

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति रविकर जी।

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  6. सुंदर प्रस्तुति..

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  7. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति

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  8. मेरी पोस्ट को शामिल करने के लिए हार्दिक आभार ... बढ़िया लिनक्स की चर्चा

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  9. sarthak links sanyojan ,meri post ko sthan dene hetu hardik aabhar

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