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Saturday, November 11, 2017

"रोज बस लिखने चला" (चर्चा अंक 2785)

मित्रों!
शनिवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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डाकिया 

डाकिया अब भी आता है बस्तियों में 
थैले में नीरस डाक लेकर, 
पहले आता था 
जज़्बातों से लबालब थैले में 
आशावान सरस डाक लेकर... 
Ravindra Singh Yadav 
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8 comments:

  1. आज के चर्चामंच की इस प्रस्तुति में मेरी रचना को स्थान देकर सम्मनित करने हेतु आभार।
    मौलिक रचनाओं का उत्कृष्ठ संकलन बड़ी ही तन्मयता और लगन के साथ तैयार करने हेतु संपादक महोदय का विशेष आभार तथा समस्त सुधीजनों को बधाई।
    दूर है मंजिल अभी,
    पर थका कहाँ हूँ मैं अभी,
    कारवाँ है साथ मेरे,
    संग चलते रहेंगे हम युँ ही सदा।

    सादर नमन आदरणीय मयंक जी।

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  2. शुभ प्रभात
    आभार
    सादर

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  3. हमेशा की तरह मनभावन चर्चा। सुन्दर सूत्रों के साथ 'उलूक' की बकबक को भी जगह देने के लिये आभार आदारणीय।

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  4. सादर नमन आदरणीय मयंक जी
    आज के चर्चामंच की इस प्रस्तुति में मेरी रचना को स्थान देकर सम्मनित करने हेतु आभार

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  5. चर्चामंच की प्रतिबद्धता को प्रणाम है!

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  6. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति ...

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  7. सभी को बधाई रोचक प्रस्तुतियां

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  8. वाह ! उत्तम ! आदरणीय शास्त्री का अंक संयोजन शानदार है। विभिन्न बिषयों पर भरपूर जानकारी और मन को आल्हादित करती चिंतनशील रचनायें। मेरी रचना "डाकिया" को स्थान मिलने पर गदगद हूँ। चर्चामंच में चयनित रचनाकारों को बधाई एवं शुभकामनाऐं। सादर। आदरणीया साधना दीदी और समीक्षक आदरणीय शास्त्री जी आप दोनों को बधाई एवं शुभकामनाऐं।

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