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Wednesday, June 20, 2018

"क्या होता है प्यार" (चर्चा अंक-3007)

सुधि पाठकों!
बुधवार की चर्चा में 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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दोहे  

"क्या होता है प्यार"  

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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बनावटें हुज़ूर की.....  

ख़याल बेबहर 

वाणी गीत 
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शब्द से ख़ामोशी तक –  

अनकहा मन का (१५) 

सु-मन (Suman Kapoor)  
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यहाँ सब के सर पे सलीब है 

Alaknanda Singh 
मैंने पिता को साइकिल चलाकर  
दफ्तर से लौटते हुए ही देखा,  
कब जाते ?  
ध्यान ही नहीं दिया ... 
Sunehra Ehsaas पर 
Nivedita Dinkar   
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रोज़ियों पर तेरी रज़ा क्या है 

नाम   दिल  से   तेरा  हटा   क्या  है ।
पूछते    लोग   माजरा    क्या    है ।।

नफ़रतें     और      बेसबब     दंगे ।
आपने  मुल्क को  दिया   क्या  है... 
Naveen Mani Tripathi  
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देखना जिस दिन मै चला जाऊंगा 

देखना जिस दिन मै चला जाऊंगा  
लौट कर फिर कभी नहीं आऊँगा... 
Mukesh Srivastava  
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यह क्या किया ? 

हकीकत से कब तक दूरी
उससे मुंह मोड़ा
क्या यह है  सही ?
अंतर मन से सोचना फिर कहना
है यह कहाँ की ईमानदारी
जब मन चाहा खेला  
फिर उससे मुंह फेरा
जिन्दगी के चार दिन
उस पर लुटाए
 बाद में मन भर गया
 तब लौट कर न देखा... 
Akanksha पर Asha Saxena  
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एटलस साईकिल पर योग-  

यात्रा भाग ९:  

सिंदखेड़ राजा- मेहकर 

Niranjan Welankar  
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पहली बरसात 

प्यार पर Rewa tibrewal  
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अंकुर फूटेगा एक दिन पुनः.. 

सुमित जैन 

yashoda Agrawal  
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आखिर, बात क्या थी? 

Muktamandla Agra  

Tuesday, June 19, 2018

"कैसे होंगे पार" (चर्चा अंक-3006)

मित्रों! 
मंगलवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक। 

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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दोहे  

"कैसे होंगे पार"  

बहुत पुरानी है विधादोहों की श्रीमान। 
दोहों में ही निहित हैदुनिया भर का ज्ञान।।

नदिया की धारा प्रबलकैसे होंगे पार।  

नौका की मझधार मेंटूट गयी पतवार।।

जब से मैली हो गयीगंगा जी की धार।  

छल-बल की पतवार सेलोग उतरते पार... 
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Fathers Day पर पढ़िए  

अज्ञेय की कविता –  

चाय पीते हुए 

चाय पीते हुए

मैं अपने पिता के बारे में सोच रहा हूँ।
आप ने कभी

चाय पीते हुए
पिता के बारे में सोचा है... 
Alaknanda Singh  
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पिता का जीवन में महत्व 

संघर्ष का दूसरा नाम है पिता
बचपन से जो हमें सपने दिखाए वो है पिता
ऊँगली पकड़कर जो चलना सिखाये वो है पिता
हमारी जागीर और जमीर है पिता... 
aashaye पर garima  
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शामें जब खुबसूरत होती थी 

आज बंजर जमीन की
घासे पीली थी
धरती सूखी, पर
रातें काली नही थी
उसने बचपन से ही
तारों के आसपास जीने की
आदत डाल रखी थी.... 
हमसफ़र शब्द पर संध्या आर्य 
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बदचलन... 

हरिशंकर परसाई 

एक बाड़ा था। बाड़े में तेरह किराएदार रहते थे। 
मकान मालिक चौधरी साहब पास ही एक बँगले में रहते थे... 
yashoda Agrawal  
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बच्चे ज़मीन कैश सभी कुछ निगल गए ... 

सूरज खिला तो धूप के साए मचल गए
कुछ बर्फ के पहाड़ भी झट-पट पिघल गए

तहजीब मिट गयी है नया दौर आ गया
इन आँधियों के रुख तो कभी के बदल गए.... 
Digamber Naswa  
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किताबों की दुनिया - 182 

नीरज पर नीरज गोस्वामी  
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देश को कैसे विकास की राह पर आगे ले जाएँ  

हमारे देश की सबसे बड़ी और जन्मदाता समस्या है जनसँख्या। १३० + करोड़ की जनसँख्या में जिस तरह निरंतर वृद्धि हो रही है, उससे यह निश्चित लगता है कि अगले ५ वर्षों में हम चीन को पछाड़ कर विश्व के नंबर एक देश हो जायेंगे। लेकिन जिस तरह के हालात हमारे देश में हैं, उससे बढ़ती जनसँख्या अन्य समस्याओं की जन्मदाता बन जाती है। महंगाई , बेरोजगारी , संसाधनों की कमी , प्रदुषण और भ्रष्टाचार इसी की अवैध संतानें हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है। हालाँकि निसंदेह देश का विकास सरकार के हाथ में है, लेकिन सिर्फ सरकार को दोष देना सर्वथा अनुचित है... 
अंतर्मंथन पर डॉ टी एस दराल - 

चर्चा - 3008

आज की चर्चा में आपका हार्दिक स्वागत है योग हमारी सभ्यता, योग हमारी रीत बोगनवेलिया मिट्टी वाले खेत प्यार मोहब्बत बदल गया ...