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Sunday, January 14, 2018

"मकर संक्रान्ति " (चर्चा अंक-2848)

मित्रों!
हर्षोंल्लास के पर्व लोहड़ी और मकरसंक्रान्ति की
आप सबको हार्दिक शुभकामनाएँ।
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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अलाव 

Purushottam kumar Sinha  
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न जलता है अब वो आलाव  

मेरे बचपन के दिनों में,  
जब होता था हिमपात,  
जलाकर आधी-रात तक आलाव,  
बैठते थे सब एक साथ.... 
याद आती हैं सबसे अधिक 
पूस-माघ की वो लंबी रातें, 
दादा-दाती की कहानियां, 
बजुरगों की कही सच्ची बातें.... 
अब तो बर्फ के दिनों में भी, 
आलाव नहीं, आग जलती है.... 
kuldeep thakur  
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वसीयत और मरणोपरांत वसीयत 

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   वसीयत एक ऐसा अभिलेख जिसके माध्यम से व्यक्ति अपनी मृत्यु के बाद अपनी संपत्ति की व्यवस्था करता है .भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 3  में वसीयत अर्थात इच्छापत्र की परिभाषा इस प्रकार है - ''वसीयत का अर्थ वसीयतकर्ता का अपनी संपत्ति के सम्बन्ध में अपने अभिप्राय का कानूनी प्रख्यापन है जिसे वह अपनी मृत्यु के पश्चात् लागू किये जाने की इच्छा रखता है .''     वसीयत वह अभिलेख है जिसे आदमी अपने जीवन में कई बार कर सकता है किन्तु वह लागू तभी होती है जब उसे करने वाला आदमी मर जाता है .एक आदमी अपनी संपत्ति की कई बार वसीयत कर सकता है किन्तु जो वसीयत उसके जीवन में सबसे बाद की होती है वही महत्वपूर्ण होती है....
कानूनी ज्ञान पर Shalini Kaushik  
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शीर्षकहीन 

आनन्द वर्धन ओझा 
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देशद्रोही साबित करो  

गैंग माननीयों के पीछे 

           चार माननीयों ने जब लोकतंत्र के लिए खतरे की बात कही तो स्वघोषित कट्टरपंथी और देशद्रोही साबित करो गैंग सक्रिय हो गई है। सोशल मीडिया पर तरह तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं। वह भी तब जबकि सुब्रमण्यम स्वामी जैसे स्पष्टवादी व्यक्ति ने भी कह दिया है कि माननीय की ईमानदारी पर शक नहीं किया जा सकता और उन्होंने विवश होकर ही चौथेखंभे की शरण ली होगी। ऐसी स्थिति में देशद्रोही साबित करो गैंग की सक्रियता वास्तव में खतरनाक संकेत है.... 
चौथाखंभा पर ARUN SATHI 
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अल्फाजों की दुनिया 

बड़ी जादुई हैं अल्फाजों की दुनिया 
दर्द अगर मिल जाये तो  
बिखर जाती हैं रुमानियत की दुनिया ...  
RAAGDEVRAN पर MANOJ KAYAL 
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पीठ, बेंच, डेस्क और चेयर 

इयत्ता पर इष्ट देव सांकृत्यायन 
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दोहा गीत -  

अरुण कुमार निगम 

गूंगे बतलाने चले, देखो गुड़ का स्वादअंधा बाँटे रेवड़ी, रखो कहावत याद।।

हाल हंस का देख कर, मैना बैठी मूकमान मोर का छिन गया, कोयल भूली कूक।।गर्दभ गायन कर रहे, कौवे देते दाद।अंधा बाँटे रेवड़ी, रखो कहावत याद.... 

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7 comments:

  1. शुभ प्रभात
    आभार
    सादर

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  2. सुन्दर चर्चा. मेरी कविता शामिल की. आभार.

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  3. सुंदर चर्चा सार्थक links की, मेरी पोस्ट को इतना अधिक स्थान देने के लिए कोटि कोटि धन्यवाद

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  4. सार्थक चर्चा और सुंदर लिंक्स। मुझे मंच में स्थान देने के लिए आभार ।

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"तालाबों की पंक" (चर्चा अंक-3011)

मित्रों!  रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है।  देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।  (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')   -- ...