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Monday, April 16, 2018

"कर्म हुए बाधित्य" (चर्चा अंक-2942)

सुधि पाठकों!
सोमवार की चर्चा में 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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३०७. 

अँधेरा 

कल रात बहुत बारिश हुई,  
धुल गया ज़र्रा-ज़र्रा,  
चमक उठा पत्ता-पत्ता,  
बह गई राह की धूल,  
निखर गई हर चीज़,  
पर अँधेरा पहले-सा ही रहा... 
कविताएँ पर Onkar 
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सुनो देवी 

तुम तो नहीं हिन्दू या मुसलमान  
फिर कैसे देखती रहीं अन्याय चुपचाप  
क्यों न काली रूप में अवतरित हो 
किया महिषासुर रक्तबीज 
शुम्भ निशुम्भ का नाश .... 
vandana gupta 
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मन रे तू काहे धीर धरे.. 

कुछ दिनों में क्या-क्या भाव 
मन में आते-जाते रहे हैं 
ये कहना चाहूँ तो भी कह नहीं पाऊँगी शायद... 
वो ख़बर पढ़ते हुए दिल दहल गया... 
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सियासती रोटियां 

सियासती रोटियां  
एक नन्हीं बच्ची के 
जिस्म को चूल्हा बनाकर... 
भारतीय नारी परshikha kaushik 
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डर 

Sudha's insights  
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प्रेम नहीं विद्रोह लिखो 

नंगी प्रजातियों की नंगी ज़बान 
थूककर चाट रहे अपने बयान 
चेहरों पर कराकर फेशियल 
खोल ली है बारूद की दुकान... 
Jyoti Khare  
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5 comments:

  1. सुन्दर सोम्वारीय अंक।

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  2. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति

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  3. सदा की तरह सार्थक रचनाओं का संकलन

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  4. सुन्दर चर्चा. मेरी कविता शामिल की. आभार.

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  5. सार्थक प्रस्तुति । मेरी रचना को शामिल करने हेतु सादर आभार । संकलित सभी रचनाएँ बेहतरीन हैं।

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"सब के सब चुप हैं" (चर्चा अंक-3126)

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