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Wednesday, May 02, 2018

"रूप पुराना लगता है" (चर्चा अंक-2958)

सुधि पाठकों!
बुधवार की चर्चा में 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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मजदूर दिवस 

आज मजदूर दिवस है हम न खुद मजदूर हैं और न सीधे इन मजदूरों के संपर्क में हैं। एक काम वाली बाई ही मजदूरों के नाम पर संपर्क में रहती है। अभी कुछ दिन पहले छोटे से काम के लिए एक मजदूर लेकर आये थे पूरे दिन की दिहाड़ी तीन सौ रुपए देकर। उसका काम करने का टालू तरीका देख समझ आ गया कि इसे काम बता कर अंदर नहीं जाया जा सकता। खैर उसे बताया क्या करना है कैसे करना है लेकिन उसकी सुस्त रफ्तार देख कोफ्त होने लगी। फिर मैंने उससे कहा अच्छा तुम तो हमेशा ये काम करते हो तुम बताओ कैसे करें?... 
kavita verma  
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धीरे-धीरे हो जाएगी आदत ज़ख़्म खाने की 

मैं अदना-सा इंसां,  
 सामने ताक़त ज़माने की   
फिर भी ख़्वाहिश है 
, आसमां का चाँद पाने की। 
 कभी हमें भी नज़र उठाकर देखो तुम  
बड़ी तमन्ना है 
 आपसे नज़र मिलाने की । 
Dilbag Virk  at  Sahitya Surbhi 
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नभ के चंदा 

sadhana vaid at 
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क्षणिकाएँ 

(1) झूठ .......
 दिल का थोड़ा थोड़ा टूटना
 मन का थोड़ा थोड़ा गिरना
 जिस्म को थोड़ा थोड़ा मारता है 
लोग झूठ बोलते हैं
 वो अचानक चला गया। .
देवेन्द्र पाण्डेय at 

8 comments:

  1. बेहतरीन लिंक्स एवं प्रस्तुति ...

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  2. सार्थक चर्चा।
    आपका आभार राधा बहन जी।

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  3. शुभ प्रभात सखी
    आभार
    सादर

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  4. सुप्रभात |मेरी रचना शामिल करने के लिए धन्यवाद राधा जी |

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  5. सुन्दर बुधवारीय चर्चा। आभार राधा जी 'उलूक'के सूत्र को भी चर्चा में जगह देने के लिये।

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  6. पठनीय सामग्री से सुसज्जित आज का चर्चामंच ! मेरी रचना को स्थान देने के लिए आपका हृदय से बहुत-बहुत धन्यवाद एवं आभार राधा जी !

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  7. आभार आपका मुझे पुनः स्थान देने के लिए।

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