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Sunday, May 13, 2018

"माँ के उर में ममता का व्याकरण समाया है" (चर्चा अंक-2969)

मित्रों! 
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक। 

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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"माँ के उर में ममता का व्याकरण समाया है"  

मातृदिवस पर विशेष
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माँ ने वाणी को उच्चारण का ढंग बतलाया है,
माता ने मुझको धरती पर चलना सिखलाया है,
खुद गीले बिस्तर में सोईमुझे सुलाया सूखे में,
माँ के उर में ममता का व्याकरण समाया है,

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शहर 


Rishabh Shukla  
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बेदाम मोहब्बत 

तमाम कोशिशें उन्हें पाने की गोया नाकाम हुई  
रातें कटती हैं करवटों में मेरी तो नींदें हराम हुई... 
मेरी जुबानी पर Sudha Singh 
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यादें:  

जो रहती हैं ताउम्र ताज़ी। 

जज़्बातों को तुम समेट लेना,   
मैं रख लूँगा तुम्हारा मन।  
कि बिखरने न पाये सबंधों की गठरी  
और हाँ, बोझ भी न बनने पाये।  
बना रहे जीवन में हल्कापन... 
अन्तर्गगन पर धीरेन्द्र अस्थाना  
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दोहे -  

बेबस हुआ सुकून 

जंगल कटते ही रहे, सूख गए तालाब  
बंजर होते खेत में, ठूँठ खड़े सैलाब... 
sapne(सपने) पर shashi purwar  
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वह अनजान औरत 

पार्क में सन्नाटा भरता जा रहा था मैं अब अपनी समस्त शक्ति को श्रवणेन्द्रियों की ओर मोड़ कर उनकी बातचीत सुनने का प्रयत्न करने लगा। पार्क की लाइटें एक एक करके जलने लगी थीं। छोटे बच्चे धीरे धीरे जाने लगे पार्क में टहलने आने वाले बुजुर्ग भी अब बाहर की तरफ बढ़ने लगे कुछ युगल जोड़े अभी भी झाड़ियों के झुरमुट में थे लेकिन उनकी आवाज़ बमुश्किल 
एक दूसरे तक पहुँचती होगी इसलिए उनसे कोई शोर नहीं होता... 
कासे कहूँ? पर kavita verma  
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जख्म 

कविता मंच पर Parul Kanan 
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5 comments:

  1. शुभ प्रभात
    आभार
    सादर

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  2. सुन्दर रविवारीय चर्चा अंक। आभार आदरणीय 'उलूक' के सूत्र को भी स्थान देने के लिये।

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  3. मातृृदिवस की आपको व सभी पाठकों को हार्दिक शुभकामनायेंं ! बहुत सुन्दर सूत्रों से सजा हुआ आज का चर्चामंच ! मेरी रचना को स्थान देने के लिए आपका हृदय से बहुत-बहुत धन्यवाद एवं आभार शास्त्री जी ! सादर वन्दे !

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  4. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति

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  5. बहुत अच्छी प्रस्तुति. मेरे सूत्र को स्थान देने के लिए शुक्रिया आदरणीय.

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