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Monday, May 14, 2018

"माँ है अनुपम" (चर्चा अंक-2970)

सुधि पाठकों!
सोमवार की चर्चा में 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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राधे श्याम  

(राधा तिवारी ' राधेगोपाल ') 

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अगर तू श्याम बन जाए
तेरी राधा बनूँगी मैं
अगर तू राम बन जाए
तो सीता सी सजूँगी मैं

 तेरी पलकों के साए में
 मुझे रहने दे पल पल पल
तेरी बेचैन रातों में
हँसी  निंदिया  बनूँगी मैं... 
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मेरी दादी --  

मेरी माँ  

सस्मरण - 

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मेरे जन्म के पौने दो साल बाद  ही मेरे छोटे भाई का जन्म  हो गया था | उसी समय मेरी माँ की परेशानी  को देखते हुए  मेरी  दादी  ने मुझे  अपने सानिध्य में ले लिया |सही अर्थों में वे एक तरह से  मेरी  माँ ही बन गई | मैं कुछ बड़ी हुई तो वे मुझे बताती थी कि कैसे मैं जब बहुत छोटी थी तब उनसे  चिपटी  रहती थी | | कई बार तो उन्हें गाँव के लोगों की शव -यात्रा  में भी मुझे साथ ले जाना पड़ा |लोग उनपर हंसते थे कि मेरे कारण उन्होंने अपना बुढ़ापा खराब कर  लिया , पर मेरे दादी ने ऐसी  बातों पर कभी ध्यान नही दिया  और  बहुत  ही स्नेह से   म्रेरा  पालन- पोषण किया | उनके स्नेह की अनेक बाते मुझे याद आती हैं  | उनमे से एक मैं सबके साथ सांझा करना चाहती हूँ... 
मीमांसा --पर Renu  
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हर दोपाया आदम नही 

डॉ. अपर्णा त्रिपाठी  
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फिजूल चाहत में--  

कविता - 

ख़त नही दिल भेजा था -- क्या तुमने अंजाम किया ?  
बेहतर बात ये तुम तक रहती - तुमने चर्चा आम किया... 
क्षितिज पर Renu  
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ना विषय बदलेंगे....।। 

ना विषय बदलेंगे ,ना सरोकार बदलेंगे।  
यही जो चूमते हैं दर,यही 'सरकार' बदलेंगें... 
kamlesh chander verma  
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लोहे का घर - 43 

भारतीय रेल में सफ़र करते करते जिंदगी जीने के लिए जरूरी सभी गुण स्वतः विकसित होने लगते हैं। धैर्य, सहनशीलता, सामंजस्य आदि अगणित गुण हैं जो लोहे के घर में चंद्रकलाओं की तरह खिलते हैं। कष्ट में भी खुश रहने के नए नए तरीके ईजाद होते हैं। कोई तास खेलता है, कोई मोबाइल में लूडो या शतरंज। एक ही मिजाज के चार पांच लोग हैं तो पप्पू, पपलू भी खेल सकते हैं। लोहे का घर एक ऐसा विश्राम स्थल है जहां रहने वाले कोई काम नहीं करते बल्कि आराम से बैठकर काम करने वालों की खिल्ली उड़ाते हैं... 
बेचैन आत्मा पर देवेन्द्र पाण्डेय 
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हिन्दुस्तान को कब्रिस्तान बनाना है  

तो खूब पैदा करो बच्चे 

नमस् से बना है नमाज़ जबकि वन्दे का भी वही अर्थ है जो नमस् का है। लेकिन वन्दे -मातरम कहने से हमारे माशूक को परहेज़ है 'ख़ुद - आ ' करते -करते मुद्द्त हो गई 'ख़ुदा' ख़ुद तो तब आये जब मन में हो ,हृदय गह्वर में हो। ध्यान का कोई कॉन्सेप्ट (अवधारणा ),विचार ,तस्सवुर ही नहीं है इस्लाम में ,अरूप है अल्लाह (ख़ुदा ) भले उसके निन्यानवें (९९ )नाम हों ,कबीर ,अकबर ,अर्रहमान , अर-रहीम ,अलमलिक,अस्सलाम ,..... 
Virendra Kumar Sharma  
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क्या मैं आपको  

'मम्मी' कह कर बुला सकती हूं?


*दिपाली* की गर्भावस्था में उसके ससुराल वाले
 सभी लोग उसका पूरा-पूरा ख्याल रख रहे थे।
 ज्यादा वजन न उठाने देना,पौष्टिक भोजन देना और
 हर तरह से उसे खुश रखना ताकि आने वाले बच्चे पर 
 सकारात्मक असर पडे। दिपाली भी जितना उससे बन पड़ता था
 छोटे-छोटे काम करती रहती थी ताकि सास को ज्यादा काम न करना पड़े।
 दिपाली को हमेशा लगते रहता था कि उसकी 
गर्भावस्था के कारण सास को ज्यादा काम करना पड़ रहा हैं
 और सास को लगता था कि चाह कर भी वो
 बहू को पूरा आराम नहीं दे पा रहीं हैं।
Jyoti Dehliwal at 
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गीत -  

जीवन है या दण्ड मिला है 

जीवन है या दण्ड मिला है 
पग-पग पर प्रतिबंध लगा है 
कारागारों में साँसों का 
आना-जाना बहुत खला है... 
Bhavana Tiwari  
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8 comments:

  1. शुभ प्रभात
    आभार
    सादर

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  2. उम्दा चर्चा। मेरी रचना शामिल करने के लिए धन्यवाद।

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  3. सार्थक लिंकों के साथ सुन्दर चर्चा।
    आपका आभार राधा मैडम बहन जी।

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  4. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति

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  5. आदरणीय राधा जी सादर आभार मेरी दो रचनाएँ दोनों ब्लॉग से ली गयी है | बहुत गौरवान्वित अनुभव कर रही हूँ | सभी लिंक बेहतर हैं | और एक लिंक शायद दो बार गलती से आ गया है | मैंने सभी रचनाएँ पढ़ ली हैं | कुछ नया ही मिलता है इस मंच पर | सभी साथी रचना रचनाकारों को सादर सस्नेह शुभकामनाये आपको भी पुनः सस्नेह आभार |

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  6. अच्छी प्रस्तुति. मेरी रचना को शामिल करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीया राधा जी. सस्नेह

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  7. hamen shamil karne hetu aapka hardik dhnyavad , sundar charcha

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