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Friday, August 03, 2018

"मत घोलो विषघोल" (चर्चा अंक-3052)

मित्रों! 
शुक्रवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक। 
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पाकिस्तानियों ने हमेंं हरा दिया 

पाकिस्तानियों ने हम भारतीयों को हरा दिया। यदि हराया नहीं है तो, कम से कम यह सन्देश तो दे ही दिया है कि हम गलत रास्ते पर चल पड़े हैं। पाकिस्तानी संसद के चुनावों में इस्लामी आतंकी हाफिज सईद का एक भी उम्मीदवार नहीं जीत पाया। हाफिज के निकट सम्बन्धी भी चुनावों में उम्मीदवार थे। उनमें से भी कई नहीं जीत पाया। पाकिस्तान मतदाताओं ने सारी दुनिया को जता दिया कि वे अमनपसन्द कौम हैं और वे धार्मिक आतंकवाद को खारिज, अस्वीकार करते हैं... 
एकोऽहम् पर विष्णु बैरागी 
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ये भी नहीं अरे भाई ये न ये भी नहीं ! 

आज जिस बिंदु पर चर्चा करना चाहता हूँ वो सनातन शब्द नेति नेति या  नयाति नयाति ... अर्थात ये भी नहीं अरे भाई ये न ये भी नहीं ! दिनों से एक बात कहनी थी परन्तु सोचता था कि – संभव है कि आगे आने वाले और बीते समय की यात्रा की जा सकती है. परन्तु वास्तव में यह एक असत्य थ्योरी ही है. जिसे मानवीय मनोरंजन के लिए गढ़ा गया है ... 
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घरों पर लगते निशान! 

बहुत दिनों पहले एक कहानी पढ़ी थी – एक गिलहरी की कहानी। 
सरकार का नुमाइंदा जंगल में जाता है और परिपक्व हो चले पेड़ों पर निशान बनाकर चले आता है। निशान का अर्थ था कि ये पेड़ कटेंगे। एक गिलहरी निशान लगाते आदमी को देखती है और कटते पेड़ के लिये दुखी होती है। उसे लगता है कि मैं कोशिश करूं तो शायद कुछ पेड़ कटने से बच जाएं... 

5 comments:

  1. शुभ प्रभात
    आभार
    सादर

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  2. सुन्दर शुक्रवारीय अंक।

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  3. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति

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  4. कबीरा खड़ा बाज़ार में सबकी चाहे खैर ,

    ना काहू से दोस्ती ना काहू से वैर।

    एक छोर पर राजनीति दूसरे पर समाज नीति और आज का दूषित सामजिक राजनीतिक परिवेश और विशेष तौर पर पर्यावरण चेतना लिए हुए रहते हैं शास्त्री जी के दोहे आप भी इसकी एक बानगी देखिये :

    छात्र और शिक्षक जहाँ, करते उलटे काज।
    फिर कैसे हो पायेगा, उन्नत देश-समाज।।
    गंगा का अस्तित्व है, भारत में अनमोल।
    पावन गंगा-नीर में, मत घोलो विषघोल।।
    जन-गण-मन को भूलकर, भरते खुद का पेट।
    मक्कारों ने कर दिया, भारत मटियामेट।।
    जल अमोल है सम्पदा, मानव अब तो चेत।
    निर्मल जल के पान से, सोना उगलें खेत।।
    खाली पड़ी जमीन पर, बने हुए हैं कक्ष।
    दिखलाई देते नहीं, अब आँगन में वृक्ष।।
    ग्वाले माखन खा रहे, मोहन की ले ओट।
    सरकारी धन की करें, जम कर लूट-खसोट।।
    मूलभूत जिनको नहीं, छन्दों का कुछ ज्ञान।
    लगे बाँटने आज वो, लोगों को सम्मान।।
    veeruji005.blogspot.com

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  5. अदनान कफ़ील साहब यही है अम्मा की छोटी परवाज़

    घर से रसोई में रसोई से घर में ,घर में रसोई रसोई में घर

    माँ यूँ तो कभी मक्का नहीं गई
    वो जाना चाहती थी भी या नहीं
    ये कभी मैं पूछ नहीं सका
    लेकिन मैं इतना भरोसे के साथ कह सकता हूँ कि
    माँ और उसके जैसी तमाम औरतों का क़िबला मक्के में नहीं
    रसोईघर में था…
    ...........।।
    veeruji005.blogspot.com

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"सब के सब चुप हैं" (चर्चा अंक-3126)

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