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Sunday, October 21, 2018

"कल-कल शब्द निनाद" (चर्चा अंक-3131)

मित्रों!  
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है।  
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।  
(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')  
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बेवजह 


कहाँ माँगे थे चाँद और सितारे कभी  
तुम यूँ ही हमसे नज़रें चुराते रहे !

न रही जब ज़ुबानी दुआ और सलाम
बेवजह ख्वाब में आते जाते रहे... 

Sudhinama पर 
sadhana vaid 
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सुन चिड़े हो सावधान 

सुन चिड़े हो सावधान,
बदल गया है अब विधान।
हम दोनों हैं अनुगामी।
नहीं हो तुम मेरे स्वामी।
तुम मुझको नहीं  टोक सकोगे,
अब नहीं मुझको रोक सकोगे... 
Jayanti Prasad Sharma 
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----- ॥ दोहा-द्वादश ८ ॥ ----- 

हरि मेलिते खेवटिया छाँड़ा नहीँ सुभाए |  
जीउ हते हिंसा करे दूजे कवन उपाए ||... 
NEET-NEET पर 
Neetu Singhal  
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नदी, उदासी, इश्क 

Pratibha Katiyar  
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बीत गई सो बात गई,  

नहीं वह   

Metto  

बन जाती है 

Virendra Kumar Sharma 
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आज दशहरा है.....  

55 डेसिबल ध्वनि और  

मदिरापान का त्योहार 

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शब्द...  

राजेन्द्र जोशी 

yashoda Agrawal  
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Saturday, October 20, 2018

"मैं तो प्रयागराज नाम के साथ हूँ" (चर्चा अंक-3130)

मित्रों! 
शनिवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक। 

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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रावण ने सीताहरण को  

मुक्ति का मार्ग बनाया 

मुझे बचपन से ही रामलीला देखने का बड़ा शौक रहा है। आज भी आस-पास जहाँ भी रामलीला का मंचन होता है तो उसे देखने जरूर पहुंचती हूँ। बचपन में तो केवल एक स्वस्थ मनोरंजन के अलावा मन में बहुत कुछ समझ में आता न था, लेकिन आज रामलीला देखते हुए कई पात्रों पर मन विचार मग्न होने लगता है। रामलीला देखकर यह बात सुस्पष्ट है कि इस मृत्युलोक में जिस भी प्राणी ने जन्म लिया है, उसकी मृत्यु सुनिश्चित है, चाहे वह भगवान ही क्यों न हो। एक निश्चित आयु उपरांत सबको इस लोक से गमन करना ही पड़ता है। रावण भी मृत्युलोक का वासी था, इसलिए उसने भी ब्रह्मा जी की तपस्या करके अभय रहने का वरदान तो मांगा ही साथ ही अप्रत्यक्ष रूप से अपनी मुक्ति का कारण भी बता दिया... 
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 दशहरे में हम तुम्हारा पुतला फिर जलाएंगे 

 किन्तु जरा भी भयभीत न होना तुम 
 पुतला ही तो जलेगा न

jagdish kumud 
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विजयादशमी  

मुक्तक 


गुज़ारिश पर सरिता भाटिया  
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राम और रावण की आपबीती,  

रामलीला के बाद 

अब छोड़ो भी पर 

Alaknanda Singh  

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मंदिर-दर-मंदिर 

एक वही तो है
जो बदलता नही
मिलने की लाख कोशिश करने पर भी 
शिकवा नही करता
जमाने से 
संध्या आर्य  
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जरूरत और फर्ज का धर्म  

.... वह दिन और आज का दिन। सूत के कच्चे धागे ने दोनों परिवारों को ऐसा बाँधा कि 2002 की नफरत और नृशसंता शर्मिन्दा होकर उल्टे पाँवों लौट गई। सारे त्यौहार दोनों परिवार मिल कर मनाते हैं। ईद की सिवैयों के लिए केवड़े का सत् कोकिला बेन लाती हैं। होली की पापड़ियाँ महबूब भाई के यहाँ से बन कर आती हैं और मुहर्रम का सोग राणा परिवार मनाता है.... 

एकोऽहम् पर विष्णु बैरागी 

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मैं तो प्रयागराज नाम के साथ हूं 

को कहि सकहि प्रयाग प्रभाउ।
कलुष पुंज कुंजर मृग राउ।।
भरद्वाज मुनि अबहूं बसहिं प्रयागा।
किन्ही राम पद अति अनुरागा।।
याज्ञवल्क्य मुनि परम विवेकी।
भरद्वाज मुनि रखहि पद टेकी।।
'देव दनुज किन्नर नर श्रेनी।
सागर मंज्जई सकल त्रिवेनी...  
Dayanand Pandey 

Friday, October 19, 2018

"विजयादशमी विजय का, पावन है त्यौहार" (चर्चा अंक-3122)

मित्रों! 
शुक्रवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक। 

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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दशहरा और रावण दहन 

दशहरे में विजयोत्सव मनाना तो उचित है पर रावण का पुतला जलाना क्या उचित है ? पढ़िए छः मुक्तक 
1. आदि काल से बुरा रावण को जलाया जाता है २८ बुराई पर सत्य की जय, यही बताया जाता है लोभ, मोह, काम, क्रोध, हिंसा, द्वेष ये बुराई हैं जलाने वाले क्या इन सबको जलाया जाता है ? २. बुराई सभी अपने अंदर हैं, उसको जलाओ २७ रावण को बदनाम कर उसका पुतला न जलाओ हर इंसान के मन भीतर छुपा है एक रावण उसे निकालो और सरेआम उसे ही जलाओ ... 
कालीपद "प्रसाद 
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ग़ज़ल  

"नहीं हमको आती हैं ग़ज़लें बनाना"  

(राधातिवारी "राधेगोपाल")

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माँ 


Akanksha पर 
Asha Saxena 
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जीने की वजह 


जीने की वजह
पहले थीं कई
अब जैसे कोई नहीं !
बगिया के रंगीन फूल,
और उनकी मखमली मुलायम पाँखुरियाँ !
फूलों पर मंडराती तितलियाँ,
और उनके रंगबिरंगे सुन्दर पंख... 
Sudhinama पर 
sadhana vaid 
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कहीं मत जाना तुम --  

कविता 


बिनसुने - मन की व्यथा --
दूर कहीं मत जाना तुम !
किसने - कब- कितना सताया -
सब कथा सुन जाना तुम... 


Renu 
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चुप रहने की बारी अब हमारी है 

मेरा विवाह,1976 में, 29 बरस की उम्र में हुआ। मैं, विवाह न करने पर अड़ा हुआ था।उस काल खण्ड के लोक पैमानों के अनुसार मैं आधा बूढ़ा हो चुका था। तब बापू दादा (स्व. बापूलालजी जैन) ने कहा था - ‘तू शादी कर या मत कर। लेकिन याद रखना - काँकर पाथर जो चुगे, उन्हें सतावे काम। घी-शक्कर जो खात हैं, उनकी राखे राम।’ याने, जब अन्न कणों के भ्रम में कंकर-पत्थर चुग जानेवाले पंछियों में भी काम भाव होता है तो स्वादिष्ट, पुष्ट भोजन करनेवाले मनुष्य को तो भगवान ही काम भाव से बचा सकता है। बापू दादा के मुँह से समूचा ‘लोक’ मुझे एक अविराम चैतन्य सत्य का साक्षात्कार करा रहा था... 
एकोऽहम् पर विष्णु बैरागी 
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इन्तजार 


purushottam kumar sinha 
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वक़्त का आलम 

अपने पन का नक़ाब वक़्त रहते बिख़र गया,वक़्त का आलम रहा,  कि  वक़्त रहते सभँल गये,
हर   बार   कि  मिन्नतों  से  भी वो  नहीं लौटे,  इंतज़ार में  हम, वो  दिल कहीं ओर  लगा बैठें... 
Anita Saini 
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जब जागो तभी सबेरा 

आप मुर्गे की बांग से जागते होंगे, हमको तो पड़ोस की जूली जगाती है! जूली का मालिक भोर में चार बजे ही निकल जाता है मॉर्निंग वॉक पर। जूली की मालकिन अपने पति देव के जाने के बाद, गेट बाहर से उटका कर, देर तक कॉलोनी में टहलती रहती हैं और जूली बन्द गेट के भीतर से मालकिन को देख देख कूकियाती रहती है... 
देवेन्द्र पाण्डेय 
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है सजर ये मेरे अपनों का... 

डॉ. आलोक त्रिपाठी 

बड़ा अजीब सा मंझर है 
ये मेरी जिन्दगी की उलझन का 
गहरी ख़ामोशी में डूबा हुआ 
है सजर ये मेरे अपनों का... 
yashoda Agrawal  

"कल-कल शब्द निनाद" (चर्चा अंक-3131)

मित्रों!   रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है।   देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।   (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')    -- दोहे...