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Thursday, October 04, 2018

चर्चा - 3114

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धन्यवाद 
दिलबागसिंह विर्क 

12 comments:

  1. शुभ प्रभात
    आभार
    सादर

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  2. धन्यवाद मेरी रव्हाना शामिल करने के लिए |
    आज बढ़िया सजा चर्चा मंच |

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  3. सुन्दर गुरुवारीय चर्चा। आभार दिलबाग जी 'उलूक' के सूत्र को भी जगह देने के लिये।

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  4. बहुत सुन्दर, सार्थक और संतुलित चर्चा।
    आपका आभार आदरणीय दिलबाग विर्क जी।

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  5. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति

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  6. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति

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  7. शानदार संकलन

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  8. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति

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  9. वक़्त को देता हूँ मौक़ा कि तोड़ डाले मुझे
    सीखना चाहता हूँ, टूटकर जुड़ने का हुनर।

    सीख लो अभी से चलना चिलचिलाती धूप में
    ग़म की वीरान राहों पर, मिलते नहीं शजर।
    साहित्य सुरभि में दिल बाग़ सिंह विर्क की ग़ज़ल नै परवाज़ भर रही है समय के आकाश पर :
    गम के वीराने सफर में और भी हैं तल्खियां ,
    और भी रातें बकाया हौसला न हारो बशर।
    veerubhai1947.blogspot.com
    blog.scientificworld.in
    veerujianand.blogspot.com
    vigyanchakshu.blogspot.com
    veeruji005.blogspot.com

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  10. वक़्त को देता हूँ मौक़ा कि तोड़ डाले मुझे
    सीखना चाहता हूँ, टूटकर जुड़ने का हुनर।

    सीख लो अभी से चलना चिलचिलाती धूप में
    ग़म की वीरान राहों पर, मिलते नहीं शजर।
    साहित्य सुरभि में दिल बाग़ सिंह विर्क की ग़ज़ल नै परवाज़ भर रही है समय के आकाश पर :
    गम के वीराने सफर में और भी हैं तल्खियां ,
    और भी रातें बकाया हौसला न हारो बशर।
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  11. जलने को परवाना आतुर, आशा के दीप जलाओ तो।
    कब से बैठा प्यासा चातुर, गगरी से जल छलकाओ तो।।
    स्वाति नक्षत्र की बूँद कहाँ जो चातक को मिल पाएगी ,
    अब बादल भी नकली नकली रब जाने बरखा आएगी।
    और
    'मास्साहब मत पकड़ो कान ',
    हम पहले से ही हलकान।
    बधाई शास्त्री के लेखन कर्म को नित्य प्रकाशन को।

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  12. शानदार प्रस्तुति ,

    भावनाओ का ये पिटारा गज़ब का हैं

    आभार

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