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Friday, October 19, 2018

"विजयादशमी विजय का, पावन है त्यौहार" (चर्चा अंक-3122)

मित्रों! 
शुक्रवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक। 

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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दशहरा और रावण दहन 

दशहरे में विजयोत्सव मनाना तो उचित है पर रावण का पुतला जलाना क्या उचित है ? पढ़िए छः मुक्तक 
1. आदि काल से बुरा रावण को जलाया जाता है २८ बुराई पर सत्य की जय, यही बताया जाता है लोभ, मोह, काम, क्रोध, हिंसा, द्वेष ये बुराई हैं जलाने वाले क्या इन सबको जलाया जाता है ? २. बुराई सभी अपने अंदर हैं, उसको जलाओ २७ रावण को बदनाम कर उसका पुतला न जलाओ हर इंसान के मन भीतर छुपा है एक रावण उसे निकालो और सरेआम उसे ही जलाओ ... 
कालीपद "प्रसाद 
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ग़ज़ल  

"नहीं हमको आती हैं ग़ज़लें बनाना"  

(राधातिवारी "राधेगोपाल")

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माँ 


Akanksha पर 
Asha Saxena 
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जीने की वजह 


जीने की वजह
पहले थीं कई
अब जैसे कोई नहीं !
बगिया के रंगीन फूल,
और उनकी मखमली मुलायम पाँखुरियाँ !
फूलों पर मंडराती तितलियाँ,
और उनके रंगबिरंगे सुन्दर पंख... 
Sudhinama पर 
sadhana vaid 
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कहीं मत जाना तुम --  

कविता 


बिनसुने - मन की व्यथा --
दूर कहीं मत जाना तुम !
किसने - कब- कितना सताया -
सब कथा सुन जाना तुम... 


Renu 
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चुप रहने की बारी अब हमारी है 

मेरा विवाह,1976 में, 29 बरस की उम्र में हुआ। मैं, विवाह न करने पर अड़ा हुआ था।उस काल खण्ड के लोक पैमानों के अनुसार मैं आधा बूढ़ा हो चुका था। तब बापू दादा (स्व. बापूलालजी जैन) ने कहा था - ‘तू शादी कर या मत कर। लेकिन याद रखना - काँकर पाथर जो चुगे, उन्हें सतावे काम। घी-शक्कर जो खात हैं, उनकी राखे राम।’ याने, जब अन्न कणों के भ्रम में कंकर-पत्थर चुग जानेवाले पंछियों में भी काम भाव होता है तो स्वादिष्ट, पुष्ट भोजन करनेवाले मनुष्य को तो भगवान ही काम भाव से बचा सकता है। बापू दादा के मुँह से समूचा ‘लोक’ मुझे एक अविराम चैतन्य सत्य का साक्षात्कार करा रहा था... 
एकोऽहम् पर विष्णु बैरागी 
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इन्तजार 


purushottam kumar sinha 
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वक़्त का आलम 

अपने पन का नक़ाब वक़्त रहते बिख़र गया,वक़्त का आलम रहा,  कि  वक़्त रहते सभँल गये,
हर   बार   कि  मिन्नतों  से  भी वो  नहीं लौटे,  इंतज़ार में  हम, वो  दिल कहीं ओर  लगा बैठें... 
Anita Saini 
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जब जागो तभी सबेरा 

आप मुर्गे की बांग से जागते होंगे, हमको तो पड़ोस की जूली जगाती है! जूली का मालिक भोर में चार बजे ही निकल जाता है मॉर्निंग वॉक पर। जूली की मालकिन अपने पति देव के जाने के बाद, गेट बाहर से उटका कर, देर तक कॉलोनी में टहलती रहती हैं और जूली बन्द गेट के भीतर से मालकिन को देख देख कूकियाती रहती है... 
देवेन्द्र पाण्डेय 
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है सजर ये मेरे अपनों का... 

डॉ. आलोक त्रिपाठी 

बड़ा अजीब सा मंझर है 
ये मेरी जिन्दगी की उलझन का 
गहरी ख़ामोशी में डूबा हुआ 
है सजर ये मेरे अपनों का... 
yashoda Agrawal  

8 comments:

  1. शुभ प्रभात
    आभार
    सादर

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  2. शुभ प्रभात आदरणीय

    बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति
    मेरी रचना को स्थान देने हेतु आभार
    सादर

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  3. सुन्दर चर्चा। विजयादशमी की शुभकामनाएं।

    ReplyDelete
  4. सुन्दर लिंक्स

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  5. रावण को हर वर्ष जलाते हैं, फिर भी हर साल पैदा हो जाता है क्यों?

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  6. आदरनीय सर -- सादर प्रणाम | आज के अंक में मेरी रचना को स्थान देने के लिए हार्दिक आभार | दूसरे सभी अंक देखे |कुछ पर टिप्पणियाँ संभव ना हो पायी पर '' एकोहम ' ब्लॉग पर जाकर अत्यंत ख़ुशी हुई और संतोष कुमार चतुर्वेदी जी की कवितायें बहुत ही सराहनीय लगी |नये ब्लॉग जगत से परिचय करवाने के लिए आपको करबद्ध आभार |

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  7. दशहरे के पावन अवसर पर सभी पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं ! आज के चर्चामंच में बहुत ही सुन्दर सूत्रों का संकलन ! मेरी दोनों पोस्ट को सम्मिलित करने के लिए आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार शास्त्री जी ! सादर वन्दे !

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"ईमान बदलते देखे हैं" (चर्चा अंक-3162)

मित्रों!  बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है।    देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।   (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')    -- गीत...